
अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के तीन न्यायाधीशों ने अमेरिकी प्रतिबंधों के खिलाफ ट्रंप प्रशासन पर मुकदमा दायर किया
कनाडा, युगांडा और बेनिन की न्यायाधीशों ने मैनहट्टन की संघीय अदालत में दायर याचिका में प्रतिबंधों को 'वित्तीय मृत्युदंड' बताते हुए अवैध करार देने की मांग की।
अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) की तीन न्यायाधीशों ने बुधवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, विदेश मंत्री मार्को रुबियो और वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के खिलाफ मैनहट्टन की संघीय अदालत में एक मुकदमा दायर किया। यह याचिका पिछले वर्ष उन पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों को चुनौती देती है, जो इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ 2024 में जारी गिरफ्तारी वारंट और अफगानिस्तान में अमेरिकी बलों पर युद्ध अपराधों की जांच के विरोध में लगाए गए थे। कनाडा की किम्बर्ली प्रोस्ट, युगांडा की सोलोमी बालुंगी बोसा और बेनिन की रेइन एडिलेड सोफी अलापिनी-गांसू ने इन प्रतिबंधों को न्यायिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया है।
न्यायाधीशों की 66 पृष्ठों की कानूनी दलील के अनुसार, ये प्रतिबंध 'अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम' (IEEPA) के तहत राष्ट्रपति के अधिकारों का अतिक्रमण करते हैं और अमेरिकी संविधान के पांचवें संशोधन का उल्लंघन करते हैं। उनका कहना है कि इन उपायों का उद्देश्य न्यायिक निर्णयों के लिए दंडित करना और भविष्य के मामलों में निजी हितों को प्राथमिकता देने के लिए बाध्य करना है। याचिका में इसे 'वित्तीय मृत्युदंड' करार दिया गया है, क्योंकि प्रतिबंधों के कारण न्यायाधीश क्रेडिट कार्ड, बैंकिंग सेवाओं, अमेज़न और गूगल जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, यात्रा बुकिंग और स्वास्थ्य बीमा तक पहुंच खो चुकी हैं। साथ ही, ये प्रतिबंध उनके समक्ष लंबित या भविष्य की किसी भी कार्यवाही में साक्ष्य और दलीलें प्रस्तुत करने पर रोक लगाते हैं।
अमेरिकी प्रशासन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। वाशिंगटन ऐतिहासिक रूप से ICC के अधिकार क्षेत्र को खारिज करता रहा है, क्योंकि अमेरिका, इज़राइल, रूस और चीन रोम संविधि के पक्षकार नहीं हैं। ट्रंप के पहले कार्यकाल (2020) में भी तत्कालीन मुख्य अभियोजक फतोउ बेनसौदा और उनके एक शीर्ष सहयोगी पर अफगानिस्तान जांच को लेकर प्रतिबंध लगाए गए थे। यूरोपीय और अफ्रीकी कूटनीतिक हलकों में इस कदम को अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। दक्षिण एशिया के संदर्भ में, जहाँ भारत और पाकिस्तान जैसे देश भी ICC के सदस्य नहीं हैं, कानूनी विशेषेषज्ञों का मानना है कि यह मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायिक प्रक्रियाओं में बाहरी हस्तक्षेप की सीमाओं पर एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ सकता है।
यह मुकदमा ऐसे समय में आया है जब ICC और प्रमुख शक्तियों के बीच तनाव बढ़ रहा है। अगस्त 2025 में अमेरिका ने चार अन्य उच्च-स्तरीय ICC अधिकारियों पर भी प्रतिबंध लगाए थे। न्यायाधीशों ने अदालत से सभी प्रतिबंधों को अवैध घोषित करने और उन्हें हटाने का आदेश देने की मांग की है। अमेरिकी कानूनी विश्लेषकों के अनुसार, यह मामला कार्यपालिका के प्रतिबंध अधिकारों पर न्यायपालिका की निगरानी की एक महत्वपूर्ण परीक्षा होगी। मामला अब न्यूयॉर्क की संघीय अदालत में विचाराधीन है, और आगामी सुनवाई में ट्रंप प्रशासन से जवाब दाखिल करने की अपेक्षा है। इस मुकदमे का परिणाम न केवल इन न्यायाधीशों के व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं पर अमेरिकी प्रतिबंधों की वैधता की मिसाल भी स्थापित कर सकता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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तीन आईसीसी न्यायाधीशों ने ट्रम्प प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर किया है, जिसमें तर्क दिया गया है कि उन पर लगाए गए प्रतिबंध गैरकानूनी हैं और न्यायेतर दबाव डालने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। यह मामला मैनहट्टन की एक संघीय अदालत में दायर किया गया।
तीनों मजिस्ट्रेट अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके शीर्ष अधिकारियों पर बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ आईसीसी के गिरफ्तारी वारंट के प्रतिशोध में न्यायेतर दबाव डालने का आरोप लगाते हैं। वे प्रतिबंधों को अंतरराष्ट्रीय न्याय की स्वतंत्रता पर हमला बताते हैं।
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