
विश्व कप 2026: VAR अधिकारी के विवादास्पद हाथ के इशारे पर फीफा जांच, हटाने की मांग
जर्मनी-कुराकाओ मैच के दौरान ऑस्ट्रेलियाई रेफरी शॉन इवांस द्वारा किए गए 'व्हाइट पावर' प्रतीक जैसे इशारे ने फीफा को स्पष्टीकरण मांगने पर मजबूर किया, भेदभाव-विरोधी संगठन फेयर ने उन्हें टूर्नामेंट से हटाने की अपील की।
फीफा विश्व कप 2026 में एक नया विवाद उस समय खड़ा हो गया जब जर्मनी और कुराकाओ के बीच ह्यूस्टन में खेले गए मैच के प्रसारण के दौरान वीडियो असिस्टेंट रेफरी (VAR) टीम के ऑस्ट्रेलियाई अधिकारी शॉन इवांस ने अपने दाहिने हाथ से एक ऐसा इशारा किया जिसे कुछ लोग श्वेत वर्चस्ववादी प्रतीक मानते हैं। डलास स्थित VAR केंद्र से आई तस्वीर में इवांस ने अंगूठे और तर्जनी से गोला बनाकर बाकी तीन उंगलियां फैला रखी थीं—पारंपरिक 'ओके' संकेत, जिसे हाल के वर्षों में दक्षिणपंथी चरमपंथियों ने 'व्हाइट पावर' के संदेश के रूप में अपना लिया है। फीफा की भेदभाव-विरोधी निगरानी साझेदार फेयर नेटवर्क ने तुरंत इवांस को टूर्नामेंट से हटाने की मांग की, जबकि फीफा ने स्वयं जांच शुरू करते हुए अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा है।
यूरोपीय मीडिया में यह मामला इशारे की अस्पष्टता पर केंद्रित रहा। जर्मन अखबारों ने लिखा कि टीवी कमेंट्री ने इसे अनदेखा कर दिया, लेकिन सोशल मीडिया पर मिनटों में सवाल उठने लगे—क्या यह मज़ाक था या नस्लवादी संदेश? इटली और स्पेन के समाचार आउटलेट्स ने फेयर नेटवर्क की प्रतिक्रिया को प्रमुखता दी। वहीं अमेरिकी यहूदी-विरोधी मानहानि लीग (ADL) ने 2019 में ही इस इशारे को घृणा प्रतीकों की सूची में शामिल कर दिया था, हालांकि यह भी कहा कि हर संदर्भ में इसका वही अर्थ नहीं होता। अरब और एशियाई मीडिया ने इस घटना को नस्लवाद के खिलाफ फीफा की नीतियों की कसौटी बताया। भारत और दक्षिण एशिया के संदर्भ में यह प्रतीक विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि 2019 की क्राइस्टचर्च मस्जिद गोलीबारी के आरोपी ने अदालत में यही इशारा किया था, जिसने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया था।
इवांस के करीबी सूत्रों ने किसी भी विचारधारा से इनकार करते हुए इसे अनैच्छिक हरकत या दोस्तों के बीच प्रचलित 'सर्कल गेम' शरारत बताया है। फिर भी, फीफा के सामने एक कठिन चुनौती है: एक ओर जीरो-टॉलरेंस की नीति को बनाए रखना, दूसरी ओर बिना ठोस सबूत के किसी अधिकारी के करियर को नुकसान न पहुंचाना। प्रसारण में दिखे आठ सेकंड के इस दृश्य ने खेल प्रशासन में प्रतीकों की व्याख्या और इरादे के आकलन की जटिलता को उजागर कर दिया है।
यह विवाद ऐसे समय आया है जब अमेरिका की मेज़बानी में हो रहे इस विश्व कप में सामाजिक संवेदनशीलता पहले से चरम पर है। कुछ ही दिन पहले एक अन्य रेफरी को अमेरिका से निर्वासित किए जाने की घटना ने भी सुर्खियां बटोरी थीं। फीफा के लिए यह मामला उसकी भेदभाव-विरोधी प्रतिबद्धता की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया है। फेयर नेटवर्क जैसे संगठन स्पष्ट संदेश चाहते हैं कि नस्लवादी प्रतीकों की कोई जगह नहीं है, चाहे इरादा कुछ भी रहा हो।
आगे देखें तो फीफा का फैसला पूरे टूर्नामेंट के लिए मिसाल कायम करेगा। यदि इवांस को हटाया जाता है, तो यह कड़ा संदेश होगा कि मैदान के बाहर का आचरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि जांच लंबी खिंचती है या मामला ठंडे बस्ते में जाता है, तो आलोचक इसे फीफा की दोहरी नीति करार देंगे। भारत जैसे उभरते फुटबॉल बाजारों में प्रशंसक इस घटनाक्रम पर बारीकी से नज़र रखे हुए हैं, क्योंकि खेल की वैश्विक छवि और समावेशिता का वादा दांव पर है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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एक ऑस्ट्रेलियाई वीडियो सहायक रेफरी पर लाइव प्रसारण के दौरान एक हाथ का इशारा करने का आरोप लगा है, जिसे श्वेत वर्चस्ववादी प्रतीक से जोड़ा गया है। इस घटना ने यूरोपीय मीडिया में जबरदस्त आक्रोश पैदा कर दिया है और फीफा से तुरंत कार्रवाई की मांग उठ रही है।
एक ऑस्ट्रेलियाई रेफरी पर विश्व कप के प्रसारण के दौरान 'व्हाइट पावर' का इशारा करने का आरोप लगा, लेकिन एंग्लो-अमेरिकी मीडिया ने इस चिन्ह के दोहरे अर्थ पर प्रकाश डाला — परंपरागत रूप से यह 'ओके' है और हाल में कट्टरपंथियों ने इसे अपनाया। खबरों में भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय तथ्य और प्रतीक के इतिहास पर ध्यान दिया गया।
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