
रामल्लाह के पास इज़रायली कार्रवाई में 15 वर्षीय फ़लस्तीनी किशोर की मौत, जाँच शुरू
पश्चिमी तट पर बढ़ती हिंसा के बीच सोमवार को अल-बीरेह में सेना की गोली से अमीर जाबेर की मौत, बी'तसेलम रिपोर्ट में बच्चों की मौतों पर चिंता जताई गई।
इज़रायली सेना ने सोमवार को पश्चिमी तट के रामल्लाह के समीप अल-बीरेह शहर में एक अभियान के दौरान 15 वर्षीय फ़लस्तीनी किशोर अमीर अहमद जवाद जाबेर को गोली मार दी, जिससे उसकी मौत हो गई। फ़लस्तीनी स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, पूर्वी यरुशलम निवासी जाबेर के सिर और सीने में गोली लगी थी। इज़रायली मीडिया रिपोर्टों के हवाले से सेना ने कहा कि ऑपरेशन के दौरान पथराव की घटना हुई, जिसके बाद सैनिकों ने गोली चलाई और मामले की जाँच की जा रही है।
फ़लस्तीनी रेड क्रिसेंट ने बताया कि किशोर को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया। रामल्लाह और अल-बीरेह की गवर्नर लैला घन्नाम ने इस घटना को “दिनदहाड़े स्पष्ट हत्या” करार देते हुए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की चुप्पी पर सवाल उठाए। इस बीच, इज़रायली मानवाधिकार संगठन बी'तसेलम की 29 जून को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, 7 अक्टूबर 2023 से 7 जून 2026 के बीच पश्चिमी तट पर इज़रायली बलों द्वारा 235 फ़लस्तीनी बच्चे मारे गए, जिनमें से 54 की मौत अकेले 2025 में हुई। रिपोर्ट में कहा गया कि मारे गए 54 नाबालिगों में से केवल दो के पास आग्नेयास्त्र थे और कम से कम 21 किसी झड़प में शामिल नहीं थे।
पश्चिमी तट पर हिंसा में अक्टूबर 2023 में गाज़ा युद्ध शुरू होने के बाद से भारी वृद्धि हुई है। फ़लस्तीनी प्राधिकरण के आँकड़ों पर आधारित एएफ़पी की गणना के अनुसार, इस अवधि में कम से कम 1,085 फ़लस्तीनी इज़रायली सैनिकों या बसने वालों द्वारा मारे गए, जबकि इज़रायली पक्ष में 46 लोगों की जान गई। बी'तसेलम ने अपनी रिपोर्ट में इज़रायली सेना द्वारा 2021 के अंत में संलग्नता नियमों में ढील दिए जाने का हवाला दिया, जिसके तहत भागते हुए पथराव करने वालों पर भी घातक बल के प्रयोग की अनुमति दे दी गई। सेना के सेंट्रल कमांड प्रमुख जनरल अवि ब्लूथ ने सार्वजनिक रूप से कहा कि “हम 1967 के बाद से इस तरह नहीं मार रहे” और दावा किया कि मरने वालों में 96 प्रतिशत आतंकी गतिविधियों में शामिल थे, जिसे बी'तसेलम ने “बेशर्म झूठ” बताया।
इस घटना ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान पश्चिमी तट की स्थिति की ओर खींचा है, जहाँ इज़रायली कब्ज़े के तहत लगभग 30 लाख फ़लस्तीनी रहते हैं। भारत समेत दक्षिण एशियाई देशों के लिए यह मुद्दा कूटनीतिक रूप से संवेदनशील है, क्योंकि यह क्षेत्रीय स्थिरता और मानवाधिकारों से जुड़ा है। फ़िलहाल, इज़रायली सेना ने जाँच की बात कही है, लेकिन बी'तसेलम के अनुसार अक्टूबर 2023 के बाद से किसी भी सैनिक के ख़िलाफ़ अभियोग नहीं लगाया गया है। आगे की कानूनी प्रक्रिया पर अभी कोई स्पष्टता नहीं है।
| इज़राइली प्रेस | −0.20 | neutral |
|---|---|---|
| अरब लेवांत-मगरिब प्रेस | −0.80 | critical |
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | 0.00 | neutral |
The Israeli defense forces are conducting a thorough investigation; Palestinian accusations are unfounded.
Institutionalizing the investigation projects due process and deflects accusations of arbitrary violence.
Omits Palestinian testimonies describing the killing as premeditated and unprovoked.
Israeli forces executed a Palestinian boy; the investigation is a sham.
Moralizing the event as an execution invokes international law and condemnation, turning the victim into a symbol of oppression.
Omits the fact that the Israeli military has launched an investigation and that no official conclusions have been reached.
The incident is under investigation; both sides have conflicting accounts.
Balancing both narratives creates an appearance of objectivity without taking a stance.
Omits the specific context of the Israeli security operation and the allegations of summary execution.
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