
अमेरिकी हिरासत में मौतों पर संयुक्त राष्ट्र की जांच की मांग, टीपीएस समाप्ति से निर्वासन का रास्ता साफ
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने हाईती और सीरिया के प्रवासियों की अस्थायी संरक्षण स्थिति समाप्त करने की अनुमति दी, जबकि संयुक्त राष्ट्र ने आप्रवासन हिरासत में बढ़ती मौतों की स्वतंत्र जांच का आह्वान किया और मलेशिया में पांच साल में 465 प्रवासी मौतों का खुलासा हुआ।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने पिछले सप्ताह एक विभाजित फैसले में ट्रंप प्रशासन को हाईती और सीरिया के सैकड़ों-हजारों प्रवासियों की अस्थायी संरक्षित स्थिति (टीपीएस) समाप्त करने की अनुमति दे दी। इसके तत्काल परिणामस्वरूप इन समुदायों पर सामूहिक निर्वासन का खतरा मंडराने लगा है। होमलैंड सिक्योरिटी सचिव मार्कवेन मोलेन के अनुसार, टीपीएस कभी स्थायी समाधान नहीं था और प्रभावित लोग या तो अन्य वीज़ा के लिए आवेदन कर सकते हैं या फिर स्वदेश लौटने के लिए प्रति व्यक्ति लगभग 2,100 डॉलर की सहायता ले सकते हैं। अमेरिकी विदेश विभाग ने हाईती के लिए ‘यात्रा न करें’ की स्तर-4 चेतावनी जारी कर रखी है, लेकिन मोलेन का कहना है कि यह चेतावनी अमेरिकी नागरिकों के लिए है, हाईतीवासियों के लिए नहीं।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने इसी बीच अमेरिकी आप्रवासन एवं सीमा शुल्क प्रवर्तन (आईसीई) की हिरासत में हुई मौतों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और प्रभावी जांच की मांग की है। उनके कार्यालय के अनुसार, इस वर्ष अब तक कम से कम 19 और 2025 में कुल 33 मौतें दर्ज की गई हैं। दूसरी ओर, ओहायो के रिपब्लिकन गवर्नर माइक डीवाइन ने सीएनएन को बताया कि हाईतीवासियों की वापसी सुरक्षित नहीं है और उनके हटाए जाने से राज्य की अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। फॉक्स न्यूज़ की मेज़बान टॉमी लैरेन ने सोशल मीडिया पर नाराज़गी जताई कि बड़े पैमाने पर निर्वासन नहीं हो रहे, और चेतावनी दी कि नवंबर के मध्यावधि चुनावों में रूढ़िवादी मतदाता घर बैठ सकते हैं।
अमेरिकी आप्रवासन अदालत प्रणाली पर भी दबाव बढ़ा है। ला होर्नाडा में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, न्यायाधीशों को प्रतिदिन 100 मामले निपटाने पड़ रहे हैं और शरण स्वीकृति दर पिछले प्रशासन के दो में से एक से गिरकर अब तीन में से एक रह गई है। 150 से अधिक न्यायाधीशों को ‘अत्यधिक नरम’ मानते हुए हटाया जा चुका है। इस बीच, मलेशिया के गृह मंत्री सैफुद्दीन नसूशन इस्माइल ने संसद में बताया कि 2021 से अब तक देश के आप्रवासन डिपो में 465 मौतें हुई हैं, जो कुल 3,49,856 प्रवेशों का 0.13 प्रतिशत है। इनमें 12 बच्चे भी शामिल हैं। सर्वाधिक मौतें फिलीपींस (222), इंडोनेशिया (109) और म्यांमार (61) के नागरिकों की हुईं, जबकि शेष 73 मामलों में बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान समेत कई दक्षिण एशियाई देशों के प्रवासी शामिल हैं।
मलेशियाई सरकार के अनुसार, मौतों के प्रमुख कारण सेप्सिस, श्वसन रोग, हृदय रोग और एचआईवी/एड्स जैसी संक्रामक बीमारियां रहीं। प्रशासन ने डिपो प्रबंधन में सुधार के तहत प्रवेश पर स्वास्थ्य जांच, नियमित चिकित्सकीय निगरानी, संक्रामक रोगियों को अलग रखने और साप्ताहिक बाहरी मनोरंजन जैसे कदम उठाए हैं। दक्षिण एशिया के संदर्भ में, यह घटनाक्रम गंतव्य देशों में बढ़ती कठोर आप्रवासन नीतियों और हिरासत केंद्रों की स्थितियों को रेखांकित करता है, जिसका सीधा प्रभाव भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों के प्रवासी श्रमिकों पर पड़ता है।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद निर्वासन उड़ानें शुरू होने की उम्मीद है, हालांकि सटीक समय-सारिणी स्पष्ट नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की जांच की मांग से वैश्विक दबाव बढ़ सकता है, जबकि मलेशिया में सुधारों के बावजूद मौतों का सिलसिला जारी है। आप्रवासन अधिकार समूहों का कहना है कि ये घटनाएं विश्वभर में मानवीय संरक्षण के कमज़ोर पड़ने और प्रवर्तन-प्रथम दृष्टिकोण की ओर बदलाव का संकेत हैं।
| दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस | −0.80 | critical |
|---|---|---|
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | 0.00 | neutral |
We are outraged by the Malaysian government's inaction. Every death is a preventable tragedy: the system must be radically reformed.
The article piles up dramatic figures (465 deaths, 12 children) and uses moral duty language to turn a statistic into a political accusation.
There is no room for deaths in detention centers when Wimbledon and US politics dominate.
Total absence of coverage signals a hierarchy of priorities where Southeast Asian immigration is irrelevant.
Completely missing are references to detention deaths, temporary protection policies, and the global context of migration pressure.
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