
सिएटल की सिहरन: VAR का वो फ़ैसला, सीमा पर थकान और ईरान के सुनहरे दौर का अंत
ईरानी फ़ुटबॉल टीम विश्व कप से बिना हारे बाहर हुई, लेकिन एक सेंटीमीटर के ऑफ़साइड, पेनल्टी चूक और अभूतपूर्व प्रशासनिक बाधाओं ने उसके अभियान को गणितीय बर्बादी में बदल दिया।
सिएटल स्टेडियम की भीगती घास पर ईरान का विश्व कप सफ़र उस पल ख़त्म हुआ जब शोजा ख़लीलज़ादेह का अंतिम क्षणों का गोल VAR ने ऑफ़साइड करार दिया। इसके बाद शनिवार को बाहरी नतीजों का इंतज़ार एक धीमी गणितीय फांसी बन गया। पहले क्रोएशिया ने घाना से हार टाली, फिर कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य ने उज़्बेकिस्तान को हराया, और अंततः ऑस्ट्रिया-अल्जीरिया मैच के इंजरी टाइम में एक ऑस्ट्रियाई बराबरी के गोल ने ईरान की आख़िरी उम्मीद भी ख़त्म कर दी। तीन मैचों में तीन ड्रॉ—न्यूज़ीलैंड, मिस्र और एक अन्य टीम के ख़िलाफ़—टीम मेली को अपराजित रहने के बावजूद ग्रुप से आगे नहीं ले जा सके।
मैदान पर क़िस्मत बार-बार ईरान के ख़िलाफ़ रही। कप्तान मेहदी तरेमी ने मिस्र के ख़िलाफ़ पेनल्टी लेने से पहले अपनी भौंहें ठीक कीं—एक ऐसा हाव-भाव जिसे ईरानी मीडिया ने एकाग्रता की कमी बताया—और गोलकीपर मुस्तफ़ा शोबीर ने उनका शॉट रोक दिया। सईद एज़तोलाही का ज़ोरदार हेडर क्रॉसबार से टकराया। कोच अमीर ग़लेनोई ने बाद में कहा, “कुछ सेंटीमीटर, पाँच, दस, तीस सेंटीमीटर—एक मीटर भी नहीं—इन गोलों को रद्द कर दिया गया।” ईरानी विश्लेषकों ने रणनीति पर भी सवाल उठाए: मिस्र के ख़िलाफ़ आख़िरी दस मिनट में जब टीम ने खुलकर हमला किया तो विपक्षी बॉक्स में दबाव बना, लेकिन अलीरेज़ा जहानबख़्श को 90वें मिनट में उतारना और मेहदी क़ायदी को पूरी तरह बाहर रखना कायरतापूर्ण फ़ैसले करार दिए गए।
इस अभियान की सबसे बड़ी कहानी मैदान के बाहर लिखी गई। पूरी ईरानी टीम को मेक्सिको के तिहुआना शहर में बेस कैंप बनाने पर मजबूर होना पड़ा और हर मैच से ठीक एक दिन पहले ही अमेरिकी सीमा पार करने की अनुमति मिली। खिलाड़ियों को घंटों की सुरक्षा जांच और थकाऊ सीमा यात्राएं झेलनी पड़ीं। जर्मन अख़बार फ़्रैंकफ़ुर्टर आलगेमाइने ने फ़ीफ़ा की “मूल ज़िम्मेदारी में विफलता” की ओर इशारा करते हुए लिखा कि टीम के फ़िज़ियोथेरेपिस्ट को बस या विमान में ही खिलाड़ियों का इलाज करना पड़ा। कप्तान तरेमी ने सादा शब्दों में कहा, “यह उचित नहीं है,” और बताया कि फ़ीफ़ा अध्यक्ष ने पहले मैच के बाद समस्याएं सुलझाने का वादा किया था, लेकिन “असल में फ़ीफ़ा ने कुछ नहीं किया।” भारतीय मीडिया ने इस पूरे प्रकरण को “राजनीतिक अलगाव और प्रशासनिक निर्वासन” की संज्ञा दी।
ईरानी फ़ुटबॉल के भीतर से आवाज़ें और तीखी थीं। पूर्व प्रशासक अमीर आबेदीनी ने कहा कि फ़ेडरेशन ने कोई ठोस योजना नहीं बनाई और “हम अपनी ग़लतियों को देखने के बजाय ज़मीन-आसमान को दोष देते हैं।” उन्होंने यह भी याद दिलाया कि आठ साल के युद्ध के दौरान भी ईरान ने खेल जारी रखा था, लेकिन इस बार संगठनात्मक स्तर पर चूक हुई। गोल गोहर के कोच मेहदी तारतार ने भी माना कि टीम को ग्रुप से आगे बढ़ना चाहिए था और मिस्र के ख़िलाफ़ देर से हमला करना महंगा पड़ा।
यह विश्व कप संभवतः ईरान की स्वर्णिम पीढ़ी का अंतिम वैश्विक मंच था। तरेमी, जहानबख़्श और ख़लीलज़ादेह जैसे खिलाड़ी अब करियर के ढलान पर हैं। अगला ठोस खेल लक्ष्य एशियाई कप है, जहाँ टीम को धीरे-धीरे युवा खिलाड़ियों को शामिल करना होगा—एक ऐसा बदलाव जिसे तारतार के शब्दों में “एक बार में नहीं, बल्कि क़दम-दर-क़दम” अंजाम देना होगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
2 संपादकीय समूह · 1 भाषाएँ
Iran was eliminated from the World Cup without a single defeat, a testament to the team's strength. However, controversial VAR decisions and logistical issues prevented advancement. The team showed character but was betrayed by external factors.
Iran's World Cup elimination, despite being unbeaten, is yet another failure of the regime. Poor logistics and indecision doomed the team. The regime uses the team as propaganda, but the reality is different.
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