
जर्मनी में एएफडी का अधिवेशन: विरोध-प्रदर्शनों के बीच नेतृत्व पुनर्निर्वाचित, राज्य चुनावों पर नज़र
थुरिंगिया में एएफडी के राष्ट्रीय अधिवेशन में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं, जबकि पार्टी ने सितंबर के राज्य चुनावों से पहले अपनी आर्थिक और प्रवासन नीतियों को दोहराया।
जर्मनी की अति-दक्षिणपंथी पार्टी ‘आल्टरनेटिव फॉर जर्मनी’ (एएफडी) ने 4-5 जुलाई, 2026 को एरफर्ट, थुरिंगिया में अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में एलिस वाइडल (81.3% मत) और टीनो क्रुपाला (लगभग 70%) को सह-अध्यक्ष पद पर पुनर्निर्वाचित किया। क्रुपाला का मत प्रतिशत 2024 के 82.7% से गिर गया, जिसे पार्टी के भीतर बदलते समीकरणों का संकेत माना जा रहा है। अधिवेशन 1926 में इसी तिथि पर वाइमर में हुए नाज़ी पार्टी के अधिवेशन की शताब्दी पर आयोजित हुआ, जिसके विरोध में एरफर्ट में लगभग 31,000 प्रदर्शनकारी एकत्र हुए और कई स्थानों पर पुलिस से झड़पें हुईं।
एएफडी नेतृत्व ने अधिवेशन में जर्मन अर्थव्यवस्था के पतन की तस्वीर खींचते हुए “कठोर खर्च में कटौती” और “विदेशियों को सामाजिक लाभों की जगह वस्तुगत सहायता” देने की घोषणा की। वाइडल ने कहा कि सरकार ने “देश को दिवालिया बना दिया है” और यूक्रेन में “सौ अरब यूरो बर्बाद” किए गए हैं; उन्होंने प्रवासियों को “कड़ाई से निर्वासित” करने का वादा किया। इसके विपरीत, रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने चेतावनी दी कि यदि एएफडी किसी राज्य में सरकार बनाती है तो केंद्र सरकार उस राज्य के मंत्रियों को वर्गीकृत सूचनाएं देने से रोक सकती है, क्योंकि इससे देश की सुरक्षा को ख़तरा हो सकता है।
पार्टी के भीतर थुरिंगिया के प्रभावशाली नेता ब्योर्न होके के करीबी स्टीफन मोलर को 76% मतों से उपाध्यक्ष चुना गया। मोलर ने कट्टरपंथ की बात को खारिज करते हुए कहा कि मतदाता “हर प्रवासी को देश छोड़ने” के लिए नहीं कह रहे, लेकिन पार्टी मंच से ‘लाखों की संख्या में वापसी’ के नारे तीव्र होते रहे। विश्लेषकों के अनुसार, मोलर की नियुक्ति संघीय कार्यसमिति में होके के प्रभाव को संस्थागत करती है, जिससे आंतरिक खुफिया एजेंसी (बीएफवी) द्वारा पार्टी को ‘चरमपंथी’ करार दिए जाने के बावजूद उसकी रणनीति में बदलाव की संभावना नहीं है।
पूर्वी जर्मनी में एएफडी को मिल रहा जनसमर्थन आर्थिक असंतोष और पारंपरिक दलों से मोहभंग से प्रेरित बताया जाता है। सितंबर में साक्सोनी-आनहाल्ट और मेक्लेनबुर्ग-फोर्पोमर्न राज्यों में होने वाले चुनावों में पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलने की संभावना है। इस बीच, अन्य दलों द्वारा खड़ी ‘ब्रांडमाउअर’ (अग्नि-दीवार) नीति अब तक एएफडी के उदय को नहीं रोक पाई है। एरफर्ट में प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने 48 आपराधिक मामले दर्ज किए और सड़क अवरोधों को हटाने के लिए बल प्रयोग किया।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि सितंबर के चुनाव न केवल पूर्वी राज्यों की सत्ता का निर्धारण करेंगे, बल्कि 2027 के संघीय चुनावों के लिए एएफडी की ‘लंबी यात्रा’ की दिशा भी तय करेंगे। पार्टी ने पहले राज्य और फिर संघ में सरकार बनाने की इच्छा दोहराई है। केंद्र सरकार की ओर से वर्गीकृत सूचनाओं को रोकने की चेतावनी से संघीय ढांचे के भीतर संभावित संवैधानिक संघर्ष के संकेत मिलते हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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The AfD tries to rebrand as a moderate party ready to govern, but the European press exposes its extremist nature: leaders convicted for using Nazi slogans, ties to the radical wing, and a congress date evoking the Nazi past. Economic promises are seen as a facade for an ethno-nationalist agenda, while massive protests highlight civil society's resistance. The party is portrayed as a threat to German democracy.
The AfD congress was scheduled on the same day as the centenary of a Nazi party meeting, a choice seen as an alarming historical continuity. Mass protests with police clashes underscore the threat the party poses. The Latin American press denounces the rise of the far-right in Germany as a global danger.
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