
अगले दौर की अमेरिका-ईरान वार्ता 11 जुलाई को इस्लामाबाद में होने की संभावना
सूत्रों के अनुसार, इस वार्ता में प्रतिबंधों, जमी हुई संपत्तियों और परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा होगी; ईरानी दल का ऐलान खुमैनी के अंतिम संस्कार के बाद होगा।
अमेरिका और ईरान के बीच अगले दौर की वार्ता 11 जुलाई को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित होने की संभावना है। यह बैठक दोनों देशों के बीच पिछले महीने हुए 14-सूत्रीय समझौता ज्ञापन के बाद हो रही है, जिसमें पश्चिम एशिया में शांति बहाली का खाका तैयार किया गया था। यह वार्ता ईरान के सर्वोच्च नेता अली खुमैनी के फरवरी में संयुक्त अमेरिकी-इजरायली हवाई हमले में मारे जाने के बाद कई दिनों तक चले राजकीय अंतिम संस्कार के कारण विलंबित हुई।
सऊदी अरब के स्वामित्व वाली अल अरबिया और पाकिस्तानी समाचार पत्र द नेशन के अनुसार, इस वार्ता के एजेंडे में अमेरिकी प्रतिबंध, ईरान की जब्त संपत्तियों की रिहाई और ईरान का परमाणु कार्यक्रम शामिल हैं। पाकिस्तानी राजनयिक सूत्रों के हवाले से डॉन की रिपोर्ट में कहा गया है कि इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और लेबनान में युद्धविराम बनाए रखने पर भी चर्चा होगी। अरब मीडिया के अनुसार, ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि उनके प्रतिनिधिमंडल की संरचना और स्तर का निर्णय 9 जुलाई को अंतिम संस्कार समारोह समाप्त होने के बाद किया जाएगा।
राजनयिक पृष्ठभूमि में इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन ने एक व्यापक समझौते के लिए 60 दिन की समय-सीमा तय की थी। 21 जून को स्विट्जरलैंड में हुई तकनीकी वार्ता में, जिसकी अध्यक्षता ईरानी उप विदेश मंत्री गरीबाबादी ने की, कार्यान्वयन तंत्र पर सहमति बनी। कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने ईरानी और अमेरिकी वार्ताकारों के साथ अलग-अलग बैठकों में "सकारात्मक प्रगति" की पुष्टि की। हालाँकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दोहा में हुई पिछली तकनीकी चर्चाओं को "बहुत अच्छा" बताया, लेकिन अमेरिकी अधिकारियों ने जब्त संपत्तियों की आंशिक रिहाई पर हुई कथित समझ पर विवाद किया।
क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से, ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को समुद्री यातायात के लिए फिर से खोल दिया है और अपने नियंत्रण का दावा किया है। आगामी तकनीकी वार्ता के बाद जुलाई के तीसरे सप्ताह में दोहा में उच्च-स्तरीय सीधी बातचीत होने की उम्मीद है। पाकिस्तानी और कतरी मध्यस्थों की शटल कूटनीति जारी है, जिससे संवेदनशील मुद्दों पर सहमति बनाने के प्रयास हो रहे हैं। क्षेत्रीय विशेषज्ञों के अनुसार, इस्लामाबाद बैठक के नतीजे व्यापक संबंध सामान्यीकरण और पश्चिम एशिया में शांति की दिशा तय कर सकते हैं।
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.40 | critical |
|---|---|---|
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | −0.10 | neutral |
| रूसी और सीआईएस प्रेस | 0.00 | neutral |
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | +0.50 | aligned |
Iran warns the West: no negotiations will stop our resolve to control the Strait of Hormuz. The talks are just a facade.
A direct threat (the Hormuz blockade) is amplified to create urgency and force Europe to take sides, while diplomatic aspects are downplayed.
It omits the June 18 MOU and the mediating role of Pakistan and Qatar, which are mentioned in Indian and Iranian sources.
Iran presents itself as a responsible party following diplomatic procedures, awaiting the delegation choice after national mourning.
It normalizes the negotiations as a technical, legitimate process, depersonalizing decisions and deferring them to ritual deadlines (funerals).
It makes no mention of the pasdaran warning on the Strait of Hormuz, present in European sources.
Russia observes as a disinterested mediator: the talks are a technical matter, logistical details matter more than tensions.
It adopts a diplomatic chronicle tone, listing options and sources, to present Russia as an impartial, informed observer.
It omits the Hormuz threats and the active mediating role of Pakistan, present in European and Indian sources respectively.
Pakistan and Qatar are the true architects of détente: the US-Iran dialogue advances thanks to their mediation, and the whole world will benefit.
It emphasizes the positive role of mediators (Pakistan, Qatar) and universalizes the outcome as a 'common good', turning a bilateral event into a regional success.
It does not mention the Hormuz threat or the possibility of failure, present in European and Iranian sources.
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