
स्क्रीन में गुम होती गर्मियाँ: डिजिटल युग में अकेलेपन और अर्थ की तलाश
स्वीडन के एक किशोर से लेकर वैश्विक शोध तक, यह कहानी बताती है कि कैसे अत्यधिक जुड़ाव के बावजूद हम अकेलेपन और अर्थहीनता से जूझ रहे हैं।
स्वीडन के सुंडस्वाल शहर में एक 17 वर्षीय अब्दुलकादर तम्मो ने इस गर्मी एक अजीब सी बेचैनी महसूस की। छुट्टियों के दिन बिना किसी यादगार अनुभव के स्क्रीन की चमक में गुम होते जा रहे थे। सुबह देर से उठना, फिर घंटों मोबाइल पर स्क्रॉल करते रहना—यह सिलसिला उसे खोखला लगने लगा। उसने लिखा कि गर्मियाँ वापस नहीं आतीं, और यह अफ़सोस की बात है कि वे सिर्फ़ स्क्रीन टाइम और देर रातों में बदल जाएँ। यह सिर्फ़ एक किशोर की शिकायत नहीं थी; यह एक वैश्विक सच्चाई की गूँज थी।
दुनिया भर में, डिजिटल क्रांति ने हमें अभूतपूर्व रूप से जोड़ दिया है, लेकिन एक गहरा विरोधाभास सामने आया है: अत्यधिक कनेक्टिविटी के बीच अकेलापन महामारी की तरह फैल रहा है। इंडोनेशिया और बांग्लादेश के इस्लामी विद्वान इसे आध्यात्मिक अलार्म कहते हैं—एक संकेत कि आत्मा सृष्टिकर्ता से दूर हो गई है। एक इस्लामी जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, डेटा की चोरी, एल्गोरिदम द्वारा हेरफेर, और सोशल मीडिया पर दिखावे की संस्कृति ने मानसिक स्वास्थ्य को खोखला कर दिया है। वहीं, अमेरिकी मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जेन-ज़ी पीढ़ी इतिहास की सबसे अकेली पीढ़ी है, जो FOMO और सतही ऑनलाइन संबंधों में उलझी हुई है।
इस अदृश्य संकट से निपटने के लिए लोग अनोखे तरीके अपना रहे हैं। कुछ लोग पुराने टीवी शो बार-बार देखते हैं—शिकागो विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, यह मात्र एक्सपोज़र प्रभाव है, जहाँ परिचित कहानियाँ दिमाग को सुकून देती हैं और अनिश्चितता से बचाती हैं। अन्य लोग अपने फोन की नोटिफिकेशन स्थायी रूप से बंद कर देते हैं, ताकि ध्यान भटकने से बच सकें और गहराई से सोच सकें। एक और आम आदत है डबल स्क्रीनिंग—टीवी देखते हुए मोबाइल चलाना—जिसे मनोवैज्ञानिक चिंता और अकेलेपन से बचने का एक तंत्र मानते हैं। लेकिन ये सब अस्थायी राहत हैं; असली सवाल तो अर्थ का है।
इस्लामी शिक्षाएँ कृतज्ञता को अकेलेपन और अर्थहीनता का इलाज बताती हैं। पवित्र कुरआन में वादा है कि शुक्रगुज़ारी से नेमतें बढ़ती हैं। बांग्लादेश से प्रकाशित एक लेख के अनुसार, कृतज्ञता सिर्फ़ एक नैतिक गुण नहीं, बल्कि मानसिक शांति, रिश्तों में मिठास और अहंकार से मुक्ति का ज़रिया है। मनोविज्ञान भी इसकी तस्दीक करता है: जो लोग शुक्रिया कहने या मैं समझता हूँ तुम्हें ऐसा क्यों लगता है जैसे छोटे वाक्यों का इस्तेमाल करते हैं, वे दूसरों को मूल्यवान महसूस कराते हैं और खुद भी गहरे संबंध बनाते हैं। यह भावनात्मक परिपक्वता की निशानी है—जब दूसरों की राय या दिखावे की ज़रूरत आपको परेशान नहीं करती।
अमेरिका की एक माँ ने, जिसके चार बेटे 13 से 20 साल के हैं, हाल ही में एक पारिवारिक छुट्टी मनाई। उसने लिखा कि उसे नहीं पता था कि आखिरी बार उसने उन्हें कहानी सुनाई थी, या आखिरी बार उन्हें गोद में उठाया था। तुर्क्स और काइकोस द्वीपों की उस यात्रा में, कैरिबियाई हवा के झोंकों के बीच, उसने अपने बेटों को एक साथ नाचते और हँसते देखा। उसे एहसास हुआ कि यह शायद आखिरी पारिवारिक छुट्टी हो। यह दृश्य एक सार्वभौमिक सच्चाई को रेखांकित करता है: स्क्रीन की चमक के पार, असली जुड़ाव उन क्षणों में बसता है जो हमेशा के लिए नहीं रहते।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
2 संपादकीय समूह · 1 भाषाएँ
This personal essay reflects on the unnoticed finality of childhood rituals, like the last bedtime story. The author uses nostalgia to highlight how quickly parenting moments pass, urging readers to cherish small acts of presence. The tone is bittersweet, focusing on emotional awareness rather than critiquing technology.
The Southeast Asian bloc frames screen saturation through an Islamic moral lens, warning against the 'dark side' of digital technology. Articles emphasize spiritual emptiness, data privacy, and mental health risks, offering religious guidance to regain presence. The tone is concerned and prescriptive, positioning the issue as a moral and spiritual crisis.
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