
24 अरब डॉलर के निवेश और रक्षा समझौतों के साथ ब्रिटेन-जापान की नई साझेदारी
प्रधानमंत्री स्टार्मर और ताकाइची की ऐतिहासिक मुलाकात में आर्थिक, तकनीकी और सैन्य सहयोग को अभूतपूर्व स्तर पर ले जाने पर सहमति बनी।
लंदन में रविवार को ब्रिटेन और जापान के बीच 24 अरब डॉलर (18 अरब पाउंड) के निवेश समझौतों और अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान के संयुक्त विकास को गति देने की घोषणा के साथ एक नए युग की शुरुआत हुई। जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर से मिलकर रक्षा, ऊर्जा और उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में गहरी साझेदारी की नींव रखी। यह बैठक फ्रांस में होने वाली जी-7 शिखर बैठक से ठीक पहले हुई, जो वैश्विक आर्थिक और सुरक्षा चुनौतियों के बीच दोनों देशों की बढ़ती नजदीकियों का संकेत है।
समझौतों के तहत जापानी कंपनियाँ ब्रिटेन के बुनियादी ढाँचे और वित्तीय सेवाओं में नौ अरब पाउंड से अधिक निवेश करेंगी, साथ ही अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजनाओं में अतिरिक्त नौ अरब पाउंड तक लगाने की योजना है। इससे ब्रिटेन में दसियों हज़ार नौकरियाँ पैदा होने की उम्मीद है, जो उसकी सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी का काम कर सकती हैं। हालाँकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य-पूर्व में अमेरिका-इज़रायल और ईरान के बीच जारी तनाव का असर ब्रिटेन पर भी पड़ सकता है, लेकिन यह सौदा निवेश के नए रास्ते खोलेगा।
रक्षा सहयोग इस मुलाकात का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू रहा। दोनों पक्षों ने ‘वैश्विक वायु युद्ध कार्यक्रम’ (जीसीएपी) में तेज़ी लाने का फ़ैसला किया, जिसके तहत ब्रिटेन, जापान और इटली मिलकर छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित करेंगे। ताकाइची ने इसे ‘लगभग-गठबंधन’ जैसे संबंध बताते हुए सुरक्षा साझेदारी को नई ऊँचाइयों पर ले जाने की बात कही। हालाँकि, कुछ मीडिया रिपोर्टों में इस कार्यक्रम के बजट को लेकर अनिश्चितता जताई गई है, लेकिन राजनीतिक प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखी।
आर्थिक सुरक्षा और उच्च प्रौद्योगिकी पर भी गहन चर्चा हुई। चीन द्वारा दुर्लभ खनिजों के निर्यात पर नियंत्रण के मद्देनज़र दोनों देश मिलकर महत्त्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं को विस्तार देंगे। साथ ही, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर और क्वांटम कम्प्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में साझा अनुसंधान व निवेश को बढ़ावा दिया जाएगा। यह पहल अमेरिका के नेतृत्व वाले प्रौद्योगिकी गठजोड़ को मज़बूत करने जैसी है, जो भारत जैसे देशों के लिए भी अपनी आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाने का एक मॉडल हो सकती है।
विश्लेषकों के अनुसार, यह साझेदारी भारत-प्रशांत क्षेत्र और यूरोप के बीच रणनीतिक संतुलन को दर्शाती है। जहाँ एक ओर ब्रिटेन ब्रेक्ज़िट के बाद नए आर्थिक सहयोगी तलाश रहा है, वहीं जापान चीन की सैन्य महत्वाकांक्षाओं का मुक़ाबला करने के लिए पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध प्रगाढ़ कर रहा है। दक्षिण एशिया, खासकर भारत के लिए यह घटनाक्रम एक रोचक सबक है कि किस तरह मध्यम शक्तियाँ उभरते भू-राजनैतिक तनावों के बीच अपनी रक्षा और प्रौद्योगिकी क्षमताओं को सुनिश्चित कर सकती हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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लंदन और टोक्यो 24.1 अरब डॉलर के एक समझौते की तैयारी कर रहे हैं जो पूरी तरह से स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं पर केंद्रित है, जिसमें रक्षा जैसे द्विपक्षीय सहयोग के अन्य पहलुओं को शामिल नहीं किया गया है।
जापानी प्रधान मंत्री ने ब्रिटेन के साथ रक्षा संबंधों की प्रशंसा की, लेकिन अगली पीढ़ी के लड़ाकू जेट के वित्तपोषण को लेकर अनिश्चितता सहयोग पर छाया डालती है।
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