
सोमालीलैंड राष्ट्रपति की ऐतिहासिक इज़राइल यात्रा: मान्यता और कूटनीतिक समीकरण
सोमालीलैंड के राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही ने इज़राइल की पहली राजकीय यात्रा की, जो दिसंबर में इज़राइली मान्यता के बाद दोनों के बीच बढ़ते संबंधों का प्रतीक है।
हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका के स्वघोषित गणराज्य सोमालीलैंड के राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही ने रविवार को इज़राइल की ऐतिहासिक राजकीय यात्रा की। यह पहला अवसर है जब सोमालीलैंड के किसी राष्ट्रपति ने किसी दूसरे देश की राजकीय यात्रा की हो। यरुशलम में इज़राइली राष्ट्रपति आइज़क हर्ज़ोग और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मुलाकात के दौरान अब्दुल्लाही ने इसे "विशेष महत्व की यात्रा" बताया और कहा कि पिछले 35 वर्षों में केवल इज़राइल ने ही उनके देश को देखने और मान्यता देने की इच्छा जताई। गौरतलब है कि दिसंबर 2024 में इज़राइल दुनिया का पहला संप्रभु राष्ट्र बना जिसने 1991 में सोमालिया से एकतरफ़ा स्वतंत्रता की घोषणा करने वाले इस क्षेत्र को औपचारिक मान्यता प्रदान की।\n\nसोमालीलैंड की मान्यता की राह आसान नहीं रही है। गृह युद्ध के बाद सोमालिया से अलग हुए इस इलाके ने हालाँकि स्थिर लोकतंत्र और अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण समाज का निर्माण किया, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के किसी भी सदस्य देश ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। इज़राइल के इस कदम ने न केवल सोमालीलैंड को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने की कोशिश की, बल्कि अफ़्रीका के सींग में इज़राइल की कूटनीतिक पकड़ मज़बूत करने की रणनीति को भी उजागर किया। सोमालीलैंड की रणनीतिक स्थिति लाल सागर और अदन की खाड़ी के मुहाने पर होने के कारण व्यापार और सुरक्षा की दृष्टि से बेहद अहम है। इज़राइल की सरकार ने संकेत दिया है कि वह बरबेरा बंदरगाह पर निगरानी चौकी स्थापित करने पर विचार कर सकती है, जो ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में जहाज़रानी को दिए जा रहे ख़तरे के मद्देनज़र महत्वपूर्ण है।\n\nअरब जगत ने इज़राइल के इस क़दम की तीखी आलोचना की है। सोमालिया की केंद्र सरकार ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए कड़ा विरोध जताया है, जबकि मिस्र, सऊदी अरब और अरब लीग ने भी सोमालिया की एकता का समर्थन किया। विश्लेषकों का मानना है कि इज़राइल का यह क़दम अब्राहम समझौते के विस्तार की कोशिशों का हिस्सा है, जो अरब देशों के साथ संबंध सामान्य करने की प्रक्रिया को गति दे चुका है। हालाँकि, सोमालीलैंड एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र है, और इज़राइल के साथ उसके बढ़ते संबंधों से धार्मिक और राजनीतिक संवेदनशीलताएँ भी जुड़ी हैं। इस यात्रा के बाद सोमालीलैंड के भीतर भी मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल सकती हैं, जहाँ विपक्षी दल इसे अंतरराष्ट्रीय अलगाव को तोड़ने का साहसिक प्रयास बता रहे हैं, जबकि कुछ धार्मिक समूह इस्लामी एकता के नाम पर इसका विरोध कर सकते हैं।\n\nदक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए यह घटनाक्रम दोहरी अहमियत रखता है। पहला, हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की बढ़ती सामरिक भूमिका के चलते सोमालीलैंड जैसे इलाकों में स्थिरता और समुद्री सुरक्षा उसके लिए प्राथमिकता है। भारत ने परंपरागत रूप से सोमालिया की एकता का समर्थन किया है, लेकिन साथ ही उसने सोमालीलैंड में बुनियादी ढाँचे और विकास परियोजनाओं में भी हिस्सा लिया है। दूसरा, इज़राइल के साथ भारत के गहरे रणनीतिक संबंधों के मद्देनज़र, नई दिल्ली को हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका में अपनी कूटनीति को संतुलित करना होगा ताकि न तो सोमालिया जैसे पारंपरिक साझेदार नाराज़ हों और न ही इज़राइल-सोमालीलैंड गठजोड़ से पैदा हुए अवसरों को अनदेखा किया जाए। पाकिस्तान, जो इज़राइल को मान्यता नहीं देता, इस पूरे प्रकरण को अरब-इस्लामी दृष्टिकोण से देखेगा और सोमालिया के रुख़ का साथ देगा।\n\nआगे की राह में, यदि इज़राइल की मान्यता के बाद अन्य पश्चिमी या अफ़्रीकी देश सोमालीलैंड को मान्यता देते हैं, तो यह क्षेत्रीय भू-राजनीति को बदल सकता है। हालाँकि, अफ़्रीकी संघ और संयुक्त राष्ट्र फ़िलहाल सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता के पक्ष में हैं। इस यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सोमालीलैंड अपनी अंतरराष्ट्रीय हैसियत के लिए अपरंपरागत रास्ते अपनाने को तैयार है, और इज़राइल अफ़्रीका में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए गैर-पारंपरिक साझेदारों की तलाश में है। दोनों के बीच यह साझेदारी क्षेत्रीय सुरक्षा, समुद्री व्यापार और कूटनीतिक समीकरणों को नया आकार दे सकती है, लेकिन इसके लिए स्थानीय और वैश्विक स्तर पर भारी विरोध का सामना भी करना पड़ेगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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Arab media report the visit as a diplomatic move by a self-declared state seeking recognition, but emphasize that Somaliland is still considered a separatist region by the Arab world. The coverage notes Israel's recognition last December as a breakthrough for Somaliland, yet the framing remains cautious, highlighting the lack of broader international recognition. The tone is observant but implicitly critical of normalization with Israel.
Iranian state media frame the visit as a collaboration between an illegitimate separatist entity and the Zionist regime, using terms like 'occupied territories' to delegitimize Israel. The coverage is brief and accusatory, portraying the meeting as part of Israel's expansionist agenda in the Horn of Africa. The tone is highly critical and ideological, rejecting any form of engagement with Israel.
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