
ईरान युद्ध के बीच ट्रम्प ने शीत युद्धकालीन कानून का सहारा लिया, हथियार उत्पादन बढ़ाने का आदेश
अमेरिकी राष्ट्रपति ने रक्षा उत्पादन अधिनियम लागू कर पेंटागन को निजी कंपनियों के साथ समझौते कर युद्ध सामग्री की कमी दूर करने का निर्देश दिया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ जारी युद्ध के बीच एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए शीत युद्ध काल के 'रक्षा उत्पादन अधिनियम' (डीपीए) को लागू किया है। 11 जून को जारी एक ज्ञापन में ट्रम्प ने रक्षा सचिव पीट हेगसेथ को निजी रक्षा कंपनियों के साथ स्वैच्छिक समझौते करने का अधिकार दिया, ताकि युद्ध में तेज़ी से घट रहे गोला-बारूद, मिसाइलों और अन्य सैन्य उपकरणों के भंडार की भरपाई की जा सके। यह ज्ञापन संघीय रजिस्टर में प्रकाशित हुआ और इसके पीछे मुख्य चिंता 'सीमित उत्पादन क्षमता, कमज़ोर आपूर्ति श्रृंखलाएं और दीर्घकालिक निर्भरताएं' हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा ख़तरा पैदा कर सकती हैं।
अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के साथ संघर्ष में अमेरिकी सेना के गोला-बारूद और उन्नत हथियार प्रणालियों के भंडार तेज़ी से ख़ाली हुए हैं। एनबीसी न्यूज़ ने बताया कि ट्रम्प प्रशासन कांग्रेस पर अतिरिक्त रक्षा ख़र्च को मंज़ूरी देने का दबाव बना रहा है, जबकि सीबीएस ने उत्पादन बाधाओं और आपूर्ति श्रृंखला की कमज़ोरियों को उजागर किया। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने आलोचकों के हवाले से कहा कि युद्ध ने अमेरिकी सैन्य संसाधनों को अत्यधिक खींच लिया है। डीपीए के इस्तेमाल से सरकार निजी क्षेत्र को प्राथमिकता वाले रक्षा उत्पादों के निर्माण के लिए बाध्य कर सकती है, हालांकि ज्ञापन में 'स्वैच्छिक समझौतों' पर ज़ोर दिया गया है।
ब्राज़ील और ईरानी मीडिया ने इस घटनाक्रम को वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य के लिए अहम बताया। सीएनएन ब्रासील ने इसे शीत युद्ध कालीन क़ानून की वापसी करार दिया, जो अमेरिकी सैन्य-औद्योगिक क्षमता की सीमाओं को रेखांकित करता है। वॉइस ऑफ़ अमेरिका की फ़ारसी सेवा ने इस कदम को अमेरिका की 'वैश्विक प्रतिबद्धताओं' के संदर्भ में रखा, जिसमें ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना शामिल है। इस रिपोर्टिंग से स्पष्ट है कि यह युद्ध केवल क्षेत्रीय नहीं रहा, बल्कि अमेरिका के वैश्विक सैन्य दायित्वों और औद्योगिक आधार को चुनौती दे रहा है।
दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए इस घटनाक्रम के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। भारत अमेरिकी रक्षा तकनीक और उपकरणों का एक प्रमुख ख़रीदार है, और अमेरिकी उत्पादन क्षमता पर दबाव से भारत को आपूर्ति में देरी या प्राथमिकता में बदलाव का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, पश्चिम एशिया में लंबे संघर्ष से ऊर्जा बाज़ार अस्थिर हो सकते हैं, जिसका सीधा असर भारत की तेल आयात लागत और आर्थिक स्थिरता पर पड़ेगा। भारत पहले ही ईरान से तेल आयात बंद कर चुका है, लेकिन क्षेत्रीय अस्थिरता वैश्विक क़ीमतों को प्रभावित करती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि डीपीए का इस्तेमाल अमेरिकी युद्ध मशीनरी को गति देने का एक अल्पकालिक उपाय है, लेकिन यह गहरी संरचनात्मक कमज़ोरियों को उजागर करता है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो अमेरिका को अपने सहयोगियों से सैन्य सहायता बढ़ाने या उत्पादन का कुछ हिस्सा विदेशों में स्थानांतरित करने पर विचार करना पड़ सकता है। इससे वैश्विक हथियार व्यापार में नए समीकरण बन सकते हैं और भारत जैसे देशों को अपनी रक्षा आत्मनिर्भरता की रणनीति तेज़ करने की प्रेरणा मिल सकती है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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चीनी प्रेस रक्षा उत्पादन अधिनियम के आह्वान को इस बात का संकेत मानती है कि अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेपों, विशेषकर ईरान युद्ध ने, भंडारों को खतरनाक रूप से खाली कर दिया है, जिससे ट्रम्प को शीत युद्ध काल के आपातकालीन कानून का सहारा लेना पड़ा। इसमें कहा गया है कि तनावग्रस्त संसाधन और उत्पादन अड़चनें वैश्विक हस्तक्षेपों की स्थिरता पर संदेह पैदा कर रही हैं।
अटलांटिक प्रेस इस बात पर जोर देती है कि ट्रम्प रक्षा कंपनियों को तत्काल उत्पादन बढ़ाने के लिए कार्यकारी शक्ति का उपयोग कर रहे हैं, साथ ही ईरान युद्ध से खाली हुए भंडारों को फिर से भरने के लिए सांसदों पर अतिरिक्त धन के लिए दबाव डाल रहे हैं। इस कदम को गोला-बारूद की कमी और नाजुक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर बढ़ती चिंता की प्रतिक्रिया के रूप में चित्रित किया गया है, जिसमें प्रशासन के आक्रामक रुख पर चिंता का स्वर है।
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