
ईरान-अमेरिका शांति समझौते पर इज़रायल की लेबनान वापसी बनी नई शर्त
तेहरान ने स्पष्ट किया कि इज़रायली सेना का दक्षिणी लेबनान से हटना समझौते के लिए अनिवार्य है, जिसे इज़रायल ने खारिज कर दिया, जिससे युद्धविराम की उम्मीदों पर संकट गहराया।
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने के लिए बनी सहमति की रूपरेखा पर इज़रायल की लेबनान में सैन्य उपस्थिति भारी सवालिया निशान बन गई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची और वार्ताकार मोहम्मद बाक़र क़ालीबाफ़ ने अलग-अलग बयानों में ज़ोर देकर कहा कि जब तक इज़रायली सेनाएं दक्षिणी लेबनान के कब्ज़े वाले इलाकों से नहीं हटतीं, तब तक युद्ध पूरी तरह समाप्त नहीं माना जाएगा। यह शर्त ऐसे समय आई है जब वाशिंगटन और तेहरान एक अस्थायी समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन इज़रायल ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी सुरक्षा सुनिश्चित होने तक दक्षिणी लेबनान में बना रहेगा।
यह विवाद उस व्यापक संघर्ष की जटिलता को दर्शाता है जो फरवरी में अमेरिका और ईरान के बीच सीधे सैन्य टकराव से शुरू हुआ था। इज़रायल, हालांकि इस समझौते का पक्षकार नहीं है, लेकिन उसने अमेरिकी हमलों में शामिल होने के बाद ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह के खिलाफ लेबनान में तीन महीने का व्यापक हवाई और ज़मीनी अभियान चलाया, जिसमें उसने दक्षिणी लेबनान के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया। हालांकि अमेरिका-ईरान समझौता ज्ञापन के बाद लड़ाई में कमी आई है, लेकिन मंगलवार को भी इज़रायली ड्रोन हमलों में लेबनान में चार लोग मारे गए। अमेरिकी अधिकारियों ने पृष्ठभूमि में बताया कि समझौते में इज़रायली वापसी की कोई शर्त शामिल नहीं है, जबकि ईरानी पक्ष इसे समझौते का उल्लंघन मान रहा है।
लेबनान स्थित हिज़्बुल्लाह ने भी ईरान के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि जब तक इज़रायली सेना दक्षिणी लेबनान से नहीं हटती, तब तक तेहरान अंतिम परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करेगा। यह बयान इस बात का संकेत है कि ईरान का प्रभाव क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ गहराई से जुड़ा है और वह लेबनान के मुद्दे को केवल एक द्विपक्षीय मामला नहीं मानता। दूसरी ओर, इज़रायल का कहना है कि वह हिज़्बुल्लाह के खतरे को स्थायी रूप से समाप्त करने तक पीछे नहीं हटेगा, जिससे समझौते की व्याख्या को लेकर गतिरोध गहरा गया है।
भारत के लिए यह स्थिति कई स्तरों पर चिंताजनक है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं को अस्थिर कर सकता है, क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरत का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है। साथ ही, लेबनान और खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी कामगार रहते हैं, जिनकी सुरक्षा किसी भी नए युद्ध से खतरे में पड़ सकती है। भारत के इज़रायल और ईरान दोनों के साथ मज़बूत रणनीतिक संबंध हैं, और वह लेबनान में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना (यूनिफ़िल) में लंबे समय से योगदानकर्ता रहा है, ऐसे में नई दिल्ली के लिए संतुलित कूटनीति की चुनौती और बढ़ जाएगी।
आगे का रास्ता अनिश्चित है। यदि ईरान अपनी शर्त पर अड़ा रहता है और इज़रायल पीछे नहीं हटता, तो अस्थायी समझौता टूट सकता है और पूर्ण पैमाने का युद्ध फिर शुरू हो सकता है। इससे न केवल लेबनान में मानवीय संकट गहराएगा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता फैलने का खतरा है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका को इज़रायल और ईरान दोनों के साथ पर्दे के पीछे गहन कूटनीति करनी होगी, ताकि समझौते की अस्पष्ट शर्तों को स्पष्ट किया जा सके और एक ऐसा ढांचा तैयार हो जो क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं को संबोधित करते हुए स्थायी शांति की नींव रख सके।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ईरान का कहना है कि अमेरिका के साथ शांति समझौते में इज़रायल को अधिकृत लेबनानी क्षेत्रों से हटना होगा। इज़रायल ने यह शर्त ठुकरा दी है, जिससे समझौता ख़तरे में पड़ गया है और पूर्ण युद्ध फिर शुरू हो सकता है। दक्षिणी लेबनान पर इज़रायल का कब्ज़ा अब भी गुप्त समझौते का उल्लंघन माना जा रहा है।
ईरान शांति समझौते के लिए इज़रायल की लेबनान से वापसी को शर्त बताता है, लेकिन इज़रायल का कहना है कि वह जब तक ज़रूरी होगा रुकेगा। अमेरिका-ईरान समझौते की सामग्री अभी सार्वजनिक नहीं हुई है और विभिन्न सूत्रों से वापसी की शर्त को लेकर विरोधाभासी जानकारी मिल रही है। इस बीच दक्षिणी लेबनान में नए इज़रायली हमलों की ख़बरें हैं।
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