
ईरान-अमेरिका समझौते पर लेबनान से इज़रायली वापसी की शर्त, हिंसा जारी
युद्धविराम के बावजूद दक्षिण लेबनान में इज़रायली हमलों में चार लोगों की मौत, ईरान ने इज़रायल को कड़ी चेतावनी दी और अंतिम परमाणु समझौते के लिए सेना वापसी अनिवार्य बताई।
अमेरिका और ईरान के बीच हुए अस्थायी शांति समझौते के कुछ ही घंटों बाद मंगलवार को दक्षिण लेबनान में इज़रायली ड्रोन हमलों में कम से कम चार लोग मारे गए, जिससे पूरे मध्य पूर्व में तनाव फिर से भड़क उठा। ईरान के शीर्ष राजनयिक अब्बास अरागची ने स्पष्ट किया कि यदि इज़रायल लेबनान से अपनी सेना नहीं हटाता तो यह समझौता उल्लंघन माना जाएगा। यह शर्त इज़रायल ने पहले ही खारिज कर दी है, जिससे युद्ध पूरी तीव्रता से फिर शुरू होने का खतरा पैदा हो गया है।
समझौते की विषय-वस्तु सार्वजनिक नहीं की गई है और अलग-अलग पक्षों से विरोधाभासी व्याख्याएं सामने आ रही हैं। ईरानी विदेश मंत्रालय के उपप्रमुख मजीद तख्त-रावांची ने कहा कि ज्ञापन में लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्ध रोकने का प्रावधान है। वहीं अमेरिकी अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि समझौते में इज़रायली वापसी की कोई मांग नहीं है। इस भ्रम के बीच इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने दोहराया कि सेना “जब तक ज़रूरी होगा” दक्षिण लेबनान में रहेगी।
ज़मीनी हकीकत समझौते की नाज़ुकता को उजागर करती है। ईरान के केंद्रीय सैन्य कमान ‘खतम अल-अंबिया’ ने बयान जारी कर कहा कि युद्धविराम की घोषणा के बाद दो दिनों में इज़रायल ने 84 बार संघर्षविराम का उल्लंघन किया। कमान ने चेतावनी दी कि यदि “ज़ायोनी शासन की सेना” दक्षिण लेबनान में आक्रामक कार्रवाइयां नहीं रोकती तो उसे “कठोर जवाब” का सामना करना होगा। दूसरी ओर, इज़रायली सेना ने दावा किया कि उसने हिज़्बुल्लाह द्वारा दागे गए कई रॉकेट रोके और संदिग्ध वाहनों पर हमले किए।
तेहरान और वाशिंगटन के बीच बनी इस सहमति में हिज़्बुल्लाह की भूमिका केंद्रीय बन गई है। हिज़्बुल्लाह के प्रवक्ता ने कहा कि ईरान ने उन्हें आश्वासन दिया है कि जब तक इज़रायली सेना लेबनान से नहीं हटती, कोई अंतिम परमाणु समझौता नहीं होगा। ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाक़र क़ालीबाफ़ ने लेबनानी संसद अध्यक्ष नबीह बेरी से फोन पर कहा कि इज़रायल को कब्ज़े वाले इलाकों से हटना होगा और दक्षिण लेबनान की आबादी को अपने घर लौटने का अधिकार है।
यह गतिरोध केवल लेबनान तक सीमित नहीं है। इसका असर दक्षिण एशिया की ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन पर भी पड़ सकता है। भारत के ईरान और इज़रायल दोनों के साथ गहरे रणनीतिक संबंध हैं, और खाड़ी क्षेत्र में किसी भी बड़े टकराव से तेल आपूर्ति श्रृंखला और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा प्रभावित होगी। विश्लेषकों का मानना है कि यदि ईरान और अमेरिका लेबनान पर एक साझा भाषा नहीं खोज पाते, तो यह अस्थायी समझौता महज़ एक कागज़ी दस्तावेज़ बनकर रह सकता है, और क्षेत्र एक बार फिर व्यापक युद्ध की ओर बढ़ सकता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ईरान इस बात पर जोर देता है कि वाशिंगटन के साथ शांति इजरायल के लेबनान से हटने पर निर्भर है, एक शर्त जिसे इजरायल अस्वीकार करता है, जिससे समझौता विफल होने और पूर्ण पैमाने पर युद्ध फिर से शुरू होने का खतरा है।
इस बात पर अनिश्चितता बनी हुई है कि क्या इजरायल का लेबनान से हटना ईरान-अमेरिका समझौते की सच्ची पूर्व शर्त है; सूत्र परस्पर विरोधी जानकारी दे रहे हैं, जबकि इजरायल का कहना है कि वह जब तक जरूरी होगा रहेगा और नए हमलों की खबरें हैं।
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