
जब एक माँ के वादे ने नबी को चौंका दिया: इस्लाम में प्रतिज्ञा का अटूट बंधन
बांग्लादेश से लेकर ईरान और इंडोनेशिया तक, मुस्लिम समाज एक छोटे से वादे के गहरे आध्यात्मिक अर्थ पर मंथन कर रहे हैं।
मदीना के एक घर में एक माँ ने अपने बेटे अब्दुल्लाह इब्ने आमिर को आवाज़ लगाई, “इधर आओ, तुम्हें कुछ दूँगी।” वहाँ बैठे पैग़म्बर मुहम्मद (स.) ने पूछा, “तुम उसे क्या देने का इरादा रखती हो?” माँ ने कहा, “कुछ खजूर।” इस पर आप (स.) ने फ़रमाया, “अगर तुम कुछ न देने का इरादा रखतीं, तो तुम्हारे नाम एक झूठ लिख दिया जाता।” यह वाक़या, जो बांग्लादेश के एक लेखक ने हाल ही में उद्धृत किया, एक बच्चे को दिए गए मामूली से वादे को आस्था की कसौटी पर तौलता है।
इस्लामी परम्परा में वादा सिर्फ़ सामाजिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि ईश्वर के सामने जवाबदेही का विषय है। क़ुरआन में स्पष्ट कहा गया है, “तुम प्रतिज्ञा पूरी करो, निश्चय ही प्रतिज्ञा के बारे में पूछा जाएगा।” (सूरह बनी इसराईल, 34) बांग्लादेशी विद्वान इस आयत को हवाला देते हुए बताते हैं कि अल्लाह ने स्वयं मनुष्य से उसे रब मानने का वचन लिया और बदले में कृतज्ञता पर नेमतें बढ़ाने का वादा किया। यह पारस्परिकता ईरानी विचारकों के उस आग्रह से भी मेल खाती है जो धार्मिक शिक्षा में ‘ग़ैबी मदद’ यानी अदृश्य सहायता को हाशिए पर डालने को एक बड़ी त्रुटि मानते हैं। उनका कहना है कि जब तक समाज भौतिकवादी पश्चिमी सोच के “दो और दो चार” वाले ढाँचे से बाहर नहीं निकलता, तब तक न तो व्यक्तिगत जीवन सुधरेगा और न ही सामूहिक संघर्ष।
इसी आध्यात्मिक बंधन को संयुक्त अरब अमीरात में एक राष्ट्रीय प्रतिज्ञा का रूप दे दिया गया। हाल ही में जुमे के उपदेश में ‘संघ की प्रतिज्ञा’ (कॉवनेंट ऑफ़ द यूनियन) को याद करते हुए बद्र की लड़ाई से पहले सहाबा के उस दृश्य को ताज़ा किया गया, जब उन्होंने पैग़म्बर से कहा था, “अगर आप हमें इस समंदर में ले जाएँ और इसमें प्रवेश करें, तो हम भी आपके साथ इसमें उतर पड़ेंगे।” ख़ुत्बे में बताया गया कि शेख़ ज़ायद और उनके साथी शासकों ने इसी निष्ठा से संघ की स्थापना की थी, और आज हर नागरिक से अपेक्षा है कि वह अपने परिवार, कार्य और नेतृत्व के प्रति वफ़ादारी निभाए।
ईरानी स्रोतों में युवाओं की आध्यात्मिकता को लेकर एक और दृश्य उभरता है। मशहद के एक बुज़ुर्ग आलिम युवाओं से कहते थे, “इबादत भी जवानों के लिए है, बूढ़ों के लिए नहीं।” उनका इशारा इस ओर था कि युवा हृदय जल्दी नर्म होता है, आँसू जल्दी बहते हैं और ईश्वर से जुड़ाव सहजता से बनता है। यही कारण है कि ईरान में एतिकाफ़, दुआ-ए-कुमैल और अबू हमज़ा जैसी सभाओं में युवाओं की भारी भीड़ जुटती है। इसी संदर्भ में एक वरिष्ठ नेता का कथन उद्धृत किया जाता है कि जब मोमिन का दिल ईमान से भर जाता है, तो वह युद्ध के मैदान में भी आग के गोले की तरह लक्ष्य पर बैठता है।
इंडोनेशियाई विद्वान इस पूरी बहस को ‘अदब’ यानी शिष्टाचार के ढाँचे में रखते हैं। सूरह अल-हुजुरात को आधार बनाकर वे बताते हैं कि समाज की बर्बादी ज्ञान की कमी से नहीं, बल्कि अदब के ख़त्म होने से होती है। वे ‘तजरीद’ (दुनिया से कटकर इबादत में लगना) और ‘कस्ब’ (कमाई का प्रयास) के बीच संतुलन को अल्लाह की मर्ज़ी पर छोड़ने की सीख देते हैं। साथ ही, ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ की गवाही और नमाज़ को जन्नत की कुंजी बताने वाली हदीसें इस बात की याद दिलाती हैं कि हर वादे की बुनियाद एक आंतरिक सच्चाई पर टिकी है। अंततः, वह तस्वीर जो सबसे गहराई तक जाती है, वह हज़रत अली (अ.) के दरबार की है: जब उनके भाई अकील ने बैतुलमाल से कुछ अतिरिक्त माँगा, तो उन्होंने पास रखा लोहे का एक टुकड़ा आग में तपाकर उनके सामने कर दिया—यह कहने के लिए कि रिश्तेदारी से बढ़कर अद्ल है, और हर वादे के पीछे एक आग है जो झूठ और बेईमानी को भस्म कर देती है।
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सच्चा विश्वास भौतिक गणनाओं के आगे नहीं झुकता: वादे का बंधन पवित्र है और इसे सभी सांसारिक तर्कों से ऊपर रखकर सम्मानित किया जाना चाहिए।
यह दैवीय तर्क को पश्चिमी भौतिकवादी सोच से विपरीत करता है, इस प्रकरण को इस प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करता है कि सच्ची नैतिकता के लिए उपयोगितावादी विचार को अस्वीकार करना आवश्यक है।
यह ब्लॉक वादों के राजनीतिक या राष्ट्रीय आयामों की किसी भी चर्चा को छोड़ देता है, केवल आध्यात्मिक और भौतिकवाद-विरोधी आलोचना पर ध्यान केंद्रित करता है।
ईश्वर के साथ वाचा राष्ट्र और उसके नेता के साथ वाचा में परिलक्षित होती है: वादा निभाना विश्वास और नागरिकता का कार्य है।
यह धार्मिक वादे और 'कॉवेनेंट ऑफ द यूनियन' के बीच समानता स्थापित करता है, एक भविष्यवाणी के किस्से को राजनीतिक वफादारी के आह्वान में बदल देता है।
यह ब्लॉक भौतिकवाद या आध्यात्मिक संघर्ष की किसी भी आलोचना को छोड़ देता है, इसके बजाय अधिकार की आज्ञाकारिता और राष्ट्रीय एकता पर ध्यान केंद्रित करता है।
वादा एक पवित्र बंधन है जिसके लिए ईश्वर के सामने जवाब देना होगा: हर दिया गया शब्द शाश्वत भार रखता है।
यह एक व्याख्यात्मक दृष्टिकोण का उपयोग करता है, अरबी शब्दों की व्याख्या करता है और राजनीतिक संदर्भों को शामिल किए बिना नैतिक दायित्व स्थापित करने के लिए कुरान की आयतों का हवाला देता है।
यह ब्लॉक राष्ट्रीय एकता या भौतिकवाद-विरोधी आलोचना के किसी भी संदर्भ को छोड़ देता है, पूरी तरह से व्यक्तिगत जवाबदेही पर ध्यान केंद्रित करता है।
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