महाश्वेता देवी की जन्मशती पर: भाषा, शरीर और प्रतिरोध की अनकही कहानियाँ
एक रिक्शा-चालक से लेकर फ्रांसीसी अकादमिक तक, शब्दों और पहचान की लड़ाई कैसे हमारे समय को परिभाषित कर रही है।
कोलकाता की एक सड़क पर रिक्शा खींच रहे मनोरंजन ब्यापारी को तब क्या पता था कि उनकी सवारी उनकी पूरी ज़िंदगी बदल देगी। चश्मे वाली, साड़ी और झोला लिए एक बुज़ुर्ग प्रोफ़ेसर ने उनसे ‘जिजीविषा’ शब्द का मतलब पूछा, फिर आग्रह किया कि वे अपनी पत्रिका ‘बोर्तिका’ के लिए लिखें। उतरने से पहले उन्होंने एक कागज़ के टुकड़े पर अपना पता लिखा और हस्ताक्षर किए: महाश्वेता देवी। यह इस सदी की शुरुआत का वह दौर था जब एक लेखिका ने एक मज़दूर के भीतर छिपे रचनाकार को पहचाना। इस जनवरी में महाश्वेता देवी की जन्मशती है, और उनकी विरासत सिर्फ़ सौ से अधिक किताबों और सैकड़ों कहानियों में नहीं, बल्कि ऐसे अनगिनत क्षणों में बसी है जहाँ उन्होंने हाशिए पर खड़े लोगों को अपनी कहानी खुद कहने का अधिकार दिया।
उनके पोते तथागत भट्टाचार्य के अनुसार, ‘स्तनदायिनी’ (1977) उनकी सबसे सशक्त कृतियों में है। यह कहानी एक गरीब ब्राह्मण महिला जशोदा की है, जो एक धनी परिवार में धाय बनकर अपने परिवार का पेट पालती है। स्तन यहाँ ममता के प्रतीक नहीं, बल्कि एक अर्ध-सामंती और अर्ध-पूंजीवादी समाज में श्रम के औज़ार बन जाते हैं। यह देह को केंद्र में रखकर सत्ता और शोषण को पढ़ने की वही दृष्टि है जो महाश्वेता को पुरुलिया के खेरिया सबर आदिवासियों के बीच ले गई। वहाँ उन्होंने केवल कलम नहीं चलाई; 1998 में बुधन सबर की हिरासत में हुई मौत के बाद वह कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक पहुँचीं और दूसरी पोस्टमार्टम की माँग की। उनके लिए लेखन और सक्रियता कभी अलग-अलग दुनिया नहीं रहे।
यह सवाल कि शब्दों और श्रेणियों पर किसका अधिकार है, आज भी उतना ही जीवंत है। फ्रांस में एक विश्वविद्यालय अध्यापिका ने बताया कि कैसे वे ‘ऑतुर’ (लेखक) कहलाना पसंद करती थीं और ‘ऑत्रिस’ (लेखिका) शब्द को नागवार समझती थीं, जब तक उन्हें एहसास नहीं हुआ कि यह प्रतिरोध केवल आदत की पुकार है। दूसरी ओर, अमेरिकी मानवविज्ञान संघ की अध्यक्ष कैरोलिन एम. राउस ने एक साक्षात्कार में कहा कि यह विचार कि दो जैविक लिंग होते हैं, ‘तथ्यात्मक रूप से ग़लत’ है और उन्हें समझ नहीं आता कि लोग इस पर क्यों अड़े हैं। जब उनसे पूछा गया कि 2022 के एक सर्वेक्षण में 42.4 प्रतिशत फोरेंसिक मानवविज्ञानियों ने लिंग को द्विआधारी क्यों माना, तो उन्होंने इसे ‘रायशुमारी’ करार देकर ख़ारिज कर दिया। यह बहस सिर्फ़ अकादमिक नहीं है; यह उसी गहरी बेचैनी को छूती है जो तब उभरती है जब कोई व्यक्ति अपनी देह और इच्छाओं को नाम देने की कोशिश करता है।
पचास वर्षीया एक महिला ने एक सलाहकार को लिखा कि तलाक के बाद वह कई पुरुषों के साथ संबंध बना रही है और उसे डर है कि कहीं यह नया शौक उसकी पूरी ज़िंदगी न निगल जाए। स्तंभकार शेन ओ’नील ने उत्तर दिया कि ‘बहुत ज़्यादा सेक्स’ जैसी कोई चीज़ नहीं होती, बशर्ते वह बाध्यकारी न बन जाए और सेहत का ध्यान रखा जाए। यह एक व्यक्तिगत प्रश्न है, लेकिन इसकी गूँज उन तमाम संघर्षों में सुनाई देती है जहाँ लोग अपने शरीर और पहचान की परिभाषा खुद गढ़ना चाहते हैं।
महाश्वेता देवी ने एक बार कहा था, ‘मेरी दुनिया दो चीज़ों में बँटी है—ज़रूरी और ग़ैर-ज़रूरी। मुझे सिर्फ़ पहले में दिलचस्पी है।’ शायद यही वजह है कि उनके बाल-साहित्य में एक गाय न्यादोश है जो तली हुई मछली खाती है, सीढ़ियाँ चढ़ती है, गलती से शराब पी लेती है और ब्रिटिश राज के पुलिसवालों को नदी में फेंक देती है। यह एक ऐसी दुनिया की झलक है जहाँ सबसे कमज़ोर प्राणी भी सत्ता के प्रतीकों को उलट सकता है—बिल्कुल वैसे ही जैसे एक रिक्शा-चालक लेखक बन सकता है, एक स्तन श्रम का औज़ार बन सकता है, और एक शब्द ‘ऑत्रिस’ धीरे-धीरे कानों को मीठा लगने लगता है।
| भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रेस | +1.00 | aligned |
|---|---|---|
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | 0.00 | neutral |
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.80 | critical |
| रूसी और सीआईएस प्रेस | +0.20 | neutral |
Mahasweta Devi opened the world with her words, giving voice to the marginalized and fighting for their freedom.
By recounting the rickshaw encounter and her legacy, an image of a literary heroine and activist is built, making her story exemplary.
The controversial dimension of naming battles (such as the debate on inclusive writing and the definition of sex) is absent, which reinforces the harmonious image of Devi's legacy.
The author overcame initial resistance and now accepts 'autrice', recognizing the value of feminization.
By narrating the personal journey, the linguistic change is normalized as a natural evolution.
The broader context of naming struggles, such as Mahasweta Devi's fight for Adivasi rights and the debate on binary sex, is absent, which reduces the political scope of the theme.
The AAA president does not understand the position she dismisses, and her ignorance threatens science.
Using an accusatory tone and scientific authority, the opponent is delegitimized as incompetent.
The personal and literary perspective of naming life, as in the example of Mahasweta Devi and the feminization of language, is omitted, which polarizes the debate without nuance.
The woman should not worry about the amount of sex; what matters is health and happiness.
By reassuring with authority, social anxiety is reduced and the problem is individualized.
The political and cultural dimensions of naming, such as Mahasweta Devi's activism and inclusive writing, are absent, which individualizes the sexual issue.
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