
चीन में खुदरा बिक्री में मई में पहली गिरावट, निर्यात उछाल से वैश्विक तनाव गहराया
उपभोक्ता मांग घटने और संपत्ति कीमतों में लगातार गिरावट के बीच औद्योगिक उत्पादन बढ़ा, लेकिन सस्ते चीनी निर्यात ने यूरोप और एशिया में संरक्षणवादी चिंताओं को हवा दी है।
चीन की अर्थव्यवस्था से मई में मिश्रित संकेत आए, जहाँ एक ओर खुदरा बिक्री में दिसंबर 2022 के बाद पहली बार गिरावट दर्ज की गई, वहीं औद्योगिक उत्पादन उम्मीद से बेहतर रहा। राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार, उपभोक्ता खर्च में सालाना 0.6 प्रतिशत की कमी आई, जो अप्रैल के 0.2 प्रतिशत वृद्धि से उलट था और विश्लेषकों के शून्य वृद्धि के अनुमान से भी कमज़ोर। ऑटोमोबाइल बिक्री में 16.1 प्रतिशत की भारी गिरावट और टिकाऊ वस्तुओं की मांग में सुस्ती ने इस संकुचन को गहरा किया। इसके विपरीत, औद्योगिक उत्पादन 4.5 प्रतिशत बढ़ा, जो अप्रैल के 4.1 प्रतिशत से अधिक था और 4.3 प्रतिशत के पूर्वानुमान को पार कर गया। कंप्यूटर व संचार उपकरण क्षेत्र में 17 प्रतिशत की छलांग और ऑटोमोबाइल विनिर्माण में 8.3 प्रतिशत की वृद्धि ने इस बढ़त को संभव बनाया।
हालाँकि, आवास बाज़ार की कमज़ोरी घरेलू मांग पर भारी पड़ रही है। 70 प्रमुख शहरों में नए आवासीय संपत्तियों की कीमतों में मई में मासिक आधार पर 0.2 प्रतिशत और सालाना 3.6 प्रतिशत की गिरावट आई, जिससे लगातार गिरावट का सिलसिला जारी रहा। 70 में से 67 शहरों में साल-दर-साल कीमतें घटीं, जो संपत्ति संकट की गहराई को दर्शाता है। निवेश के मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक रही: पहले पाँच महीनों में स्थायी परिसंपत्ति निवेश में 4.1 प्रतिशत का संकुचन हुआ, जो उम्मीद से कहीं अधिक खराब रहा।
यह घरेलू कमज़ोरी ऐसे समय में सामने आई है जब पश्चिमी देश चीन के औद्योगिक विस्तार को लेकर पहले से ही सतर्क हैं। अमेरिकी शुल्कों के कारण चीनी निर्यात अब यूरोप और एशिया की ओर मुड़ गया है, जिसे ‘चीन शॉक 2.0’ कहा जा रहा है। यूरोपीय बाज़ारों में सस्ते चीनी इस्पात, इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर उपकरणों की बाढ़ से वहाँ के कारखानों की नौकरियों पर ख़तरा मंडरा रहा है। हालाँकि चीन का तर्क है कि उसके लौह-इस्पात क्षेत्र में क्षमता उपयोग दर 78-79 प्रतिशत है, जो यूरोपीय संघ के मानकों में सामान्य मानी जाती है, लेकिन पश्चिमी आलोचक इसे ‘अतिक्षमता’ करार देकर संरक्षणवादी क़दमों को जायज़ ठहरा रहे हैं।
दक्षिण एशिया और भारत के लिए यह दोहरी चुनौती है। चीन के सस्ते निर्यात अब पारंपरिक अमेरिकी बाज़ार की बजाय एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की ओर मुड़ने से भारत जैसे देशों में विनिर्माण क्षेत्र पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं, चीन की घरेलू मांग में सुस्ती से वैश्विक कच्चे माल की कीमतों पर असर पड़ सकता है, जो भारत जैसे आयातक देशों के लिए राहत लेकिन निर्यातकों के लिए चिंता का विषय है। भारत को अपनी ‘मेक इन इंडिया’ पहल को मज़बूत करते हुए व्यापार विविधीकरण पर ध्यान देना होगा।
आगे की राह अनिश्चित है। चीन को उपभोक्ता विश्वास बहाल करने के लिए राजकोषीय प्रोत्साहन की ज़रूरत होगी, लेकिन निर्यात पर बढ़ती निर्भरता वैश्विक व्यापार तनाव को और भड़का सकती है। जी-7 देशों की हालिया बैठक में यूरोपीय अर्थव्यवस्था की सुरक्षा की चिंता प्रमुख रही। यदि यूरोपीय संघ भी अमेरिकी रास्ते पर चलते हुए शुल्क बढ़ाता है, तो वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ और बिखर सकती हैं। हरित ऊर्जा परिवर्तन की रफ़्तार भी प्रभावित होगी, क्योंकि सस्ते चीनी उपकरणों के बिना विकासशील देशों के लिए स्वच्छ प्रौद्योगिकियाँ महँगी हो जाएँगी। ऐसे में भारत समेत उभरती अर्थव्यवस्थाओं को संतुलन साधते हुए अपने घरेलू बाज़ारों को मज़बूत करने की रणनीति अपनानी होगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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चीन में मई में खुदरा बिक्री अप्रत्याशित रूप से गिर गई, जो 2022 के अंत के बाद पहली बार हुआ, जिससे घरेलू मांग में गिरावट गहराई और अर्थव्यवस्था की निर्यात पर बढ़ती निर्भरता उजागर हुई। उपभोक्ता खर्च और निवेश में सुस्ती, लगातार संपत्ति संकट के साथ, वैश्विक विकास के लिए जोखिम पैदा करती है और चीन के निर्यात इंजन के तेज होने से व्यापार तनाव बढ़ाती है।
चीनी 'अतिक्षमता' की पश्चिमी कथा एक संरक्षणवादी धुआँधार है जो चीन के प्रतिस्पर्धी हरित प्रौद्योगिकी निर्यात के खिलाफ बाधाओं को उचित ठहराने के लिए बनाई गई है। आधिकारिक आंकड़े दिखाते हैं कि लौह धातु क्षेत्र में क्षमता उपयोग सामान्य सीमा के भीतर है, और चीन की निर्यात ताकत दक्षता और नवाचार को दर्शाती है, बाजार विकृति नहीं। ऐसे आरोप केवल वैश्विक ऊर्जा संक्रमण को धीमा करते हैं और विकासशील देशों के लिए टिकाऊ प्रौद्योगिकियों को अप्राप्य बनाते हैं।
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