
जर्मनी ने कॉमर्जबैंक के लिए यूनिक्रेडिट का प्रस्ताव ठुकराया, आक्रामक रणनीति पर उठे सवाल
बर्लिन ने इतालवी बैंक के शेयर स्वैप प्रस्ताव को अनुपयुक्त बताते हुए खारिज कर दिया, जबकि फ्रैंकफर्ट अभियोजन कार्यालय ने बाजार हेरफेर की प्रारंभिक जांच शुरू की।
जर्मनी की वित्तीय एजेंसी ने मंगलवार को औपचारिक रूप से यूनिक्रेडिट के कॉमर्जबैंक अधिग्रहण प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, जिससे महीनों से चल रही इस कड़ी टक्कर में एक निर्णायक मोड़ आ गया है। बर्लिन सरकार ने इतालवी बैंक के शेयर स्वैप ऑफर को आर्थिक रूप से अव्यावहारिक बताया, क्योंकि इसमें कॉमर्जबैंक के मौजूदा शेयर मूल्य के मुकाबले पर्याप्त प्रीमियम नहीं दिया गया था। दिलचस्प बात यह है कि प्रस्ताव के अंतिम दिन कॉमर्जबैंक का शेयर 36.60 यूरो पर आ गया, जबकि यूनिक्रेडिट का विनिमय प्रस्ताव 0.485 शेयर प्रति कॉमर्जबैंक शेयर के हिसाब से 37.25 यूरो के बराबर था—यानी ऑफर अचानक आकर्षक हो गया था। इसके बावजूद, जर्मन सरकार ने अपनी 12 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने से इनकार कर दिया और यूनिक्रेडिट के 'आक्रामक दृष्टिकोण' पर चिंता जताई।
इस बीच, फ्रैंकफर्ट अभियोजन कार्यालय ने यूनिक्रेडिट के सार्वजनिक विनिमय प्रस्ताव के संदर्भ में संभावित बाजार हेरफेर की प्रारंभिक जांच शुरू कर दी है। यह कदम कॉमर्जबैंक की कर्मचारी परिषद की शिकायत के बाद उठाया गया, जिसमें बाजार को दी गई सूचनाओं में कथित त्रुटियों का मुद्दा उठाया गया था। यूनिक्रेडिट ने अपनी हिस्सेदारी लगातार बढ़ाई है—भौतिक निपटान वाले डेरिवेटिव्स सहित कुल हिस्सेदारी 41.9 प्रतिशत तक पहुंच गई है, और प्रस्ताव की स्वीकार्यता दर बढ़कर 11.91 प्रतिशत हो गई है। लेकिन कानूनी जांच ने इस अधिग्रहण अभियान को नई अनिश्चितता में डाल दिया है।
जर्मन पक्ष का प्रतिरोध केवल मूल्यांकन तक सीमित नहीं है। बर्लिन सरकार ने स्पष्ट किया कि कॉमर्जबैंक जर्मन अर्थव्यवस्था, खासकर मित्तेलश्टांट यानी छोटे और मझोले उद्यमों के वित्तपोषण में 'महत्वपूर्ण भूमिका' निभाता है। यह बैंक फ्रैंकफर्ट को वित्तीय केंद्र के रूप में बनाए रखने के लिए भी अहम है। यही कारण है कि 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान हासिल की गई सरकारी हिस्सेदारी को अब रणनीतिक संपत्ति के रूप में देखा जा रहा है। जर्मनी का यह रुख यूरोपीय संघ के भीतर सीमापार बैंकिंग समेकन की चुनौतियों को रेखांकित करता है, जहां राष्ट्रीय हित अक्सर बाजार तर्क पर भारी पड़ते हैं।
वैश्विक नजरिए से देखें तो यह प्रकरण यूरोपीय बैंकिंग क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और नियामकीय बाधाओं का प्रतीक है। भारत और दक्षिण एशिया के लिए इसका प्रत्यक्ष प्रभाव सीमित है, लेकिन यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि रणनीतिक वित्तीय संस्थानों के विदेशी अधिग्रहण कितने जटिल हो सकते हैं। यदि यूनिक्रेडिट अपनी रणनीति में संशोधन करता है या जांच के नतीजे उसके पक्ष में आते हैं, तो यह सौदा यूरोपीय बैंकिंग परिदृश्य को बदल सकता है। लेकिन फिलहाल, बर्लिन की स्पष्ट अस्वीकृति और कानूनी जांच ने इस अधिग्रहण की राह में बड़ी बाधाएं खड़ी कर दी हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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जर्मनी ने कॉमर्जबैंक के लिए यूनिक्रेडिट के प्रस्ताव को औपचारिक रूप से अस्वीकार कर दिया, अपर्याप्त प्रीमियम और आक्रामक रणनीति का हवाला दिया। राज्य, जिसके पास 2008 के संकट के दौरान खरीदी गई 12% हिस्सेदारी है, प्रस्ताव की समय सीमा समाप्त होने पर भी अडिग है। दोनों बैंक महीनों से चली आ रही लड़ाई में उलझे हैं।
बर्लिन ने यूनिक्रेडिट के विनिमय प्रस्ताव को आर्थिक रूप से अव्यवहार्य बताकर खारिज कर दिया और सीईओ एंड्रिया ओरसेल के आक्रामक रवैये की आलोचना की। फ्रैंकफर्ट अभियोजकों ने इस बोली से जुड़े संभावित बाजार हेरफेर की प्रारंभिक जांच शुरू कर दी है। जर्मन सरकार कॉमर्जबैंक की स्वतंत्रता पर जोर देती है, इसे मिटलस्टैंड और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के वित्तपोषण के लिए महत्वपूर्ण मानती है।
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