
तुर्की में सी-सेक्शन पर सख्ती: 100 से अधिक डॉक्टरों पर जुर्माना, एर्दोआन का 'प्राकृतिक जन्म' पर जोर
राष्ट्रपति एर्दोआन की 'परिवार दशक' पहल के तहत तुर्की ने अनावश्यक सीज़ेरियन प्रसव रोकने के लिए डॉक्टरों पर सख्त कार्रवाई शुरू की है।
तुर्की के स्वास्थ्य मंत्रालय ने 100 से अधिक प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों पर जुर्माना लगाया है, कुछ को निलंबित किया है और अनिवार्य प्रशिक्षण में भेजा है। यह कार्रवाई अप्रैल 2025 से लागू उस नियम के तहत हुई है जिसके अनुसार निजी स्वास्थ्य केंद्रों में बिना चिकित्सीय कारण के सीज़ेरियन (सी-सेक्शन) प्रसव कराने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के 38 देशों में तुर्की में सी-सेक्शन की दर सबसे अधिक है—2023 के आंकड़ों के अनुसार प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर लगभग 615 प्रक्रियाएं। यह कदम गिरती जन्मदर से निपटने और 'प्राकृतिक जन्म' को बढ़ावा देने की व्यापक सरकारी मुहिम का हिस्सा है।
राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन, जो स्वयं एक धर्मनिष्ठ मुस्लिम हैं, ने 'परिवार दशक' नामक पहल शुरू की है जिसका उद्देश्य महिलाओं के प्रसव के तरीकों पर अधिक नियंत्रण स्थापित करना है। सरकार का मानना है कि 'सुविधाजनक' सी-सेक्शन की बढ़ती संख्या न केवल चिकित्सकीय रूप से अनावश्यक है बल्कि जनसांख्यिकीय संतुलन को भी प्रभावित कर रही है। तुर्की मीडिया के अनुसार, स्वास्थ्य मंत्रालय ने उच्च सी-सेक्शन दर वाले डॉक्टरों को चेतावनी जारी करने, अनुशासनात्मक जांच शुरू करने और यहां तक कि सरकारी अस्पतालों में पुनर्प्रशिक्षण के बाद परीक्षा उत्तीर्ण करने की शर्त लगाने जैसे कदम उठाए हैं।
चिकित्सा पेशेवरों का एक वर्ग इस कार्रवाई को समस्या के मूल कारणों को नज़रअंदाज़ करने वाला बताता है। तुर्की मेडिकल एसोसिएशन (टीटीबी) की वरिष्ठ अधिकारी डॉ. आयसे गुलतेकिंगिल के अनुसार, 60 प्रतिशत से अधिक की सी-सेक्शन दर 'संरचनात्मक' समस्या है जो स्वास्थ्य प्रणाली की खामियों को दर्शाती है। कई डॉक्टरों का कहना है कि सी-सेक्शन में केवल 30 मिनट लगते हैं जबकि सामान्य प्रसव में 12 घंटे तक लग सकते हैं, और इससे जटिलताओं पर कानूनी कार्रवाई का जोखिम भी कम होता है। अंताल्या चैंबर ऑफ फिजिशियंस ने बताया कि डॉक्टरों को निलंबन, जांच और प्रसवपूर्व प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में भेजे जाने जैसे उपायों का सामना करना पड़ रहा है।
दक्षिण एशिया के संदर्भ में देखें तो भारत में भी सी-सेक्शन की दर चिंता का विषय रही है, विशेषकर निजी अस्पतालों में। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार भारत में संस्थागत प्रसव में सी-सेक्शन की दर 21.5% है, लेकिन कुछ राज्यों और निजी क्षेत्र में यह 40-50% तक पहुंच जाती है। तुर्की का यह कदम ऐसे समय में आया है जब विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) 10-15% की आदर्श दर की सिफारिश करता है। भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए यह घटनाक्रम एक केस स्टडी हो सकता है कि कैसे सरकारी हस्तक्षेप से चिकित्सा पद्धतियों को प्रभावित किया जा सकता है, हालांकि तुर्की में डॉक्टरों के विरोध से स्पष्ट है कि बिना प्रणालीगत सुधारों के केवल दंडात्मक कार्रवाई विवादास्पद हो सकती है।
आगे की राह में तुर्की सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्राकृतिक प्रसव को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे और कानूनी सुरक्षा उपायों में भी सुधार हो। अगला ध्यान देने योग्य पड़ाव यह होगा कि क्या यह सख्ती वास्तव में सी-सेक्शन दरों को कम कर पाती है और क्या इससे जन्मदर पर कोई सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। साथ ही, चिकित्सा संघों की ओर से संभावित कानूनी चुनौतियां भी इस नीति के भविष्य को आकार दे सकती हैं।
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.40 | critical |
|---|---|---|
| दक्षिण-पूर्व एशियाई प्रेस | 0.00 | neutral |
तुर्की सरकार डॉक्टरों पर जुर्माना और निलंबन लगाकर कथित अत्यधिक सिजेरियन सेक्शन के लिए कार्रवाई कर रही है, पेशेवर कारणों और रोगी सुरक्षा को अनदेखा करते हुए।
'सुविधा' शब्द का उपयोग करके और विरोध को उजागर करके, कथा सरकार को एक नैतिक प्राधिकरण के रूप में प्रस्तुत करती है जो चिकित्सा निर्णय पर जनसांख्यिकीय लक्ष्यों को प्राथमिकता देती है।
डॉक्टरों का तर्क कि सिजेरियन समय-कुशल हैं और कानूनी जोखिम कम करते हैं, को छोड़ दिया गया है, जिससे सरकार की कार्रवाई अधिक मनमानी लगती है।
तुर्की ने सौ से अधिक डॉक्टरों को सिजेरियन सेक्शन के लिए जुर्माना लगाया, जबकि डॉक्टर प्रक्रिया की दक्षता और कानूनी लाभों पर जोर देते हैं। सरकार का अभियान घटती जन्म दर को लक्षित करता है।
बिना टिप्पणी के सरकार की कार्रवाई और डॉक्टरों के तर्क दोनों को प्रस्तुत करके, कथा संघर्ष को निष्प्रभावी करती है और एक संतुलित रिपोर्ट प्रस्तुत करती है।
विवाद और सरकार द्वारा सिजेरियन को 'सुविधा' प्रक्रिया बताने को छोड़ दिया गया है, जिससे कोई आलोचनात्मक ढांचा नहीं बनता।
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