
एक घंटे की नौकरी और दो अधूरे सपने: दुनिया भर में छिपता रोज़गार संकट
आधिकारिक आँकड़े भले ही बेरोज़गारी कम दिखाएँ, पर तेहरान से मिलान और ब्यूनस आयर्स तक करोड़ों लोग काम, घर और परिवार की चाहत में अदृश्य हो रहे हैं।
तेहरान की एक सुबह, एक युवक अपनी मोटरसाइकिल पर दो सवारियों को एक जगह से दूसरी जगह छोड़ता है। बमुश्किल एक घंटे का काम, मगर सरकारी खाते में वह ‘रोज़गारशुदा’ दर्ज हो जाता है—ठीक उसी तरह जैसे कोई पूर्णकालिक, बीमाकृत कर्मचारी। ईरान इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट यह तस्वीर दिखाती है: जिसके पास पूरे हफ्ते की नौकरी नहीं, पर एक घंटे की आमदनी है, वह बेरोज़गारी दर का हिस्सा नहीं बनता। यही नियम तब लागू होता है जब कोई वर्षों की निराशा के बाद काम ढूँढ़ना छोड़ देता है—वह आँकड़ों से ग़ायब हो जाता है, मानो उसका अस्तित्व ही ख़त्म हो गया।
यह दृश्य अकेला नहीं है। मिलान में एक 38 वर्षीय महिला ने मन ही मन दो बच्चों का सपना बुना था, पर यूनीफ़्पा के 108 हज़ार लोगों पर हुए सर्वेक्षण के अनुसार उसने एक भी जन्म नहीं दिया। बोकोनी विश्वविद्यालय की जनसांख्यिकीविद् लेतिज़िया मेन्कारिनी के हवाले से इल जियोर्नाले बताता है कि घरों का अभाव और आर्थिक अस्थिरता इस पीढ़ी के ‘हाँ’ कहने में सबसे बड़ी रुकावट हैं। वहीं अर्जेंटीना की सामाजिक ऋण वेधशाला (ओडीएसए-यूसीए) के एक हालिया अध्ययन में शोधकर्ता रोब्लेस, जियानेचीनी और लेद्दा ने पाया कि 2010 से 2025 के बीच औपचारिक निजी क्षेत्र सिकुड़ा है, जबकि बिना पंजीकरण वाला स्वरोज़गार और असंगठित काम तेज़ी से बढ़ा है—बेरोज़गारी दर भले ही 7.8% हो, लेकिन नौकरी की गुणवत्ता का क्षरण गहरा है।
ईरान की सरकारी रिपोर्टें बेरोज़गारी 7.5% बताती हैं, पर असलियत यह कि 66 मिलियन कामकाजी आयु वर्ग में से केवल 37% लोग ही किसी न किसी काम में लगे हैं—बाक़ी 40 मिलियन या तो पढ़ रहे हैं, गृहिणी हैं, या फिर इतने मायूस हैं कि नौकरी की तलाश ही छोड़ चुके हैं। इनमें लगभग 20 मिलियन महिलाएँ ‘गृहिणी’ के खाँचे में समा दी गई हैं, भले ही पिछले एक दशक से ईरानी विश्वविद्यालयों में पुरुषों से अधिक महिलाएँ दाख़िल हो रही हों। तीन साल पहले की जनगणना में 3.7 मिलियन ऐसे लोग भी मिले जो किसी श्रेणी में नहीं आते थे—न नौकरी, न पढ़ाई, न रिटायरमेंट, न ही नौकरी खोजने की इच्छा। वे परिवारों के भीतर कहीं अदृश्य बैठे हैं।
दुनिया की निगाहें अब इस खामोश संकट की ओर मुड़ रही हैं। अर्जेंटीना का एल दिया अख़बार बताता है कि ब्यूनस आयर्स प्रांत, ख़ासकर उत्तरी और दक्षिणी कोनूरबानो के औद्योगिक गलियारे, 2023 के बाद से 85 हज़ार से अधिक औपचारिक नौकरियाँ खो चुके हैं—देश भर की कुल क्षति का एक-चौथाई। नोबेल विजेता डेरॉन असमोग्लू के नेतृत्व में हुए एक वैश्विक अध्ययन की ओर इशारा करते हुए आम्बितो फ़िनान्सिएरो बताता है कि पिछले 70 सालों में जन्मदर गिरने के बावज़ूद प्रति श्रमिक सकल घरेलू उत्पाद बढ़ा है, क्योंकि कंपनियाँ तकनीक अपनाकर श्रमिकों की कमी की भरपाई कर रही हैं। लेकिन यह तकनीकी लाभ उन लाखों लोगों तक नहीं पहुँच पाता जो अनिश्चितता के दलदल में धँसे हैं।
तेहरान, मिलान और ब्यूनस आयर्स—तीनों शहर एक ही कथा कहते हैं: आधिकारिक आँकड़ों के पीछे इच्छाओं और वास्तविकता के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है। मोटरसाइकिल वाले उस युवक का एक घंटा, मिलान की उस महिला के अधूरे दो सपने, और ईरान के 40 मिलियन अदृश्य लोग—ये सब मिलकर एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं जहाँ नौकरी, घर और परिवार की बुनियादी शर्तें आपस में ऐसे गुँथ गई हैं कि कोई भी कड़ी टूटती है तो पूरी ज़िंदगी अटक जाती है।
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.20 | neutral |
|---|---|---|
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | −0.60 | critical |
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.50 | critical |
Young Europeans see their aspirations denied due to lack of housing and stable jobs, while global initiatives offer hope for the future.
Constructs a global narrative that ties the local problem to a perspective of universal empowerment, using the authority of UNFPA to legitimize optimism.
It does not mention hidden unemployment in Iran or structural labor precarity in Argentina, focusing instead on global data and Italian housing issues.
Economic policies fail to create decent work, hiding precarity behind deceptive official statistics.
Systematically contrasts official macroeconomic data with microeconomic indicators to expose the distortion of labor reality.
It does not address the global context of population aging or the Iranian situation, limiting itself to domestic Argentine critique.
The Iranian regime hides the true scale of unemployment through statistical manipulation, condemning youth to inactivity.
Dismantles official figures by revealing the very low activity rate, attributing the discrepancy to deliberate omission.
It does not consider global youth empowerment initiatives nor analyses on Latin American precarity.
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