
इज़राइली सरकार ने अर्मेनियाई नरसंहार को औपचारिक मान्यता दी, कैबिनेट ने एकमत से प्रस्ताव पारित किया
तुर्की के साथ गहराते कूटनीतिक तनाव के बीच इज़राइल ने ऐतिहासिक कदम उठाया, अब निर्णय को संसद से मंजूरी मिलनी बाक़ी है।
इज़राइल के मंत्रिमंडल ने रविवार को एक प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित करते हुए प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ऑटोमन साम्राज्य द्वारा अर्मेनियाई लोगों के विरुद्ध हिंसा को ‘नरसंहार’ के रूप में मान्यता दे दी। यह फ़ैसला विदेश मंत्री गिदोन सार द्वारा प्रस्तुत किया गया और इसे अभी भी नेसेट (इज़राइली संसद) की मंजूरी की आवश्यकता है। सार ने एक्स पर लिखा कि ‘सही काम करने में कभी देर नहीं होती’, और इज़राइल उन 32 देशों की पंक्ति में शामिल हो गया है जिन्होंने ‘ऐतिहासिक सत्य को स्वीकार कर अपना नैतिक कर्तव्य निभाया है’।
इज़राइली पक्ष के अनुसार, यह कदम तुर्की की ‘खुली शत्रुता और भयावह बयानबाज़ी’ का प्रतिशोध नहीं है, बल्कि एक नैतिक और ऐतिहासिक दायित्व है। सार ने स्पष्ट किया कि तुर्की द्वारा इज़राइल के विरुद्ध फैलाए जा रहे झूठे आख्यान उसे ऐतिहासिक सच्चाई से बचने की छूट नहीं देते। यह निर्णय ऐसे समय आया है जब गाज़ा युद्ध को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इज़राइल पर स्वयं नरसंहार के आरोप लग रहे हैं—जिन्हें इज़राइल सिरे से खारिज करता है। प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने भी पिछले वर्ष व्यक्तिगत रूप से अर्मेनियाई नरसंहार को मान्यता देने की बात कही थी, परंतु सरकारी स्तर पर औपचारिक घोषणा अब पहली बार हुई है।
तुर्की इस मुद्दे पर लगातार विरोधी रुख अपनाता आया है। अंकारा का तर्क है कि 1915-1917 के बीच हुई मौतें युद्धजनित त्रासदी थीं, न कि योजनाबद्ध नरसंहार, और मृतकों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर बताई जाती है। तुर्की ने इज़राइल के इस फ़ैसले पर अभी तक औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन इज़राइली मीडिया और विश्लेषक इसे द्विपक्षीय संबंधों में और गिरावट का कारण मान रहे हैं। राष्ट्रपति रेचेप तईप एर्दोगान के नेतृत्व में तुर्की-इज़राइल संबंध पहले ही अत्यंत तनावपूर्ण हैं, और दोनों नेता एक-दूसरे पर सार्वजनिक रूप से कठोर आरोप लगाते रहे हैं। तुर्की ने इज़राइल के साथ व्यापार को काफ़ी हद तक निलंबित कर दिया है और ख़ुद को हमास के प्रमुख कूटनीतिक समर्थक के रूप में प्रस्तुत किया है।
वैश्विक स्तर पर, 30 से अधिक देश अर्मेनियाई नरसंहार को मान्यता दे चुके हैं, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका (2021 में राष्ट्रपति बाइडन के बयान के बाद), रूस, फ़्रांस, जर्मनी और कनाडा शामिल हैं। यूरोपीय संसद ने भी इस संबंध में प्रस्ताव पारित किया है। इज़राइल का यह क़दम मध्य-पूर्व में बदलते कूटनीतिक समीकरणों का संकेत है, जहाँ पहले अंकारा के साथ सामरिक संबंधों को बनाए रखने के लिए इज़राइल इस विषय पर चुप्पी साधता था। अब प्रस्ताव को नेसेट में मतदान के लिए भेजा जाएगा; इसके पारित होने पर यह क़ानूनी रूप से प्रभावी होगा और इससे तुर्की की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया की संभावना प्रबल है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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Israeli media celebrate the cabinet's unanimous recognition of the Armenian genocide as a historic moral duty and a long-overdue step. The decision is portrayed as a justified stance against historical denial, with some framing it as a pointed message to Turkey amid strained relations. Coverage emphasizes the government's unity and the procedural path to Knesset approval, while noting the symbolic weight for a Jewish state.
Russian sources report the Israeli recognition in a neutral, factual tone, highlighting the official nature of the decision and the foreign minister's statement that it is not an act of retaliation. The coverage notes that the resolution still requires Knesset approval and quotes Israeli officials emphasizing moral obligation. The framing is detached, focusing on the diplomatic process and listing other countries that have recognized the genocide.
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