
विश्व कप में ईरान-न्यूज़ीलैंड मैच के दौरान इज़रायली झंडा ज़ब्त, फ़लस्तीनी झंडे बरक़रार; टीम पर सख़्त यात्रा पाबंदियों का खुलासा
लॉस एंजिल्स स्टेडियम में सुरक्षाकर्मियों ने एक प्रशंसक का इज़रायली झंडा हटा दिया जबकि पास में फ़लस्तीनी झंडे लहराते रहे; इसी मैच के बाद ईरानी दस्ते को तुरंत अमेरिका छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।
अमेरिका की धरती पर खेले जा रहे फ़ीफ़ा विश्व कप 2026 के पहले ही दौर में एक विवादास्पद घटना ने खेल भावना पर राजनीतिक तनाव की छाया डाल दी। ईरान और न्यूज़ीलैंड के बीच लॉस एंजिल्स के सोफ़ी स्टेडियम में हुए मुक़ाबले के दौरान स्टेडियम सुरक्षाकर्मियों ने एक दर्शक से इज़रायली झंडा ज़ब्त कर लिया, जबकि कुछ ही सीटों की दूरी पर लहरा रहे फ़लस्तीनी झंडों को नहीं छुआ गया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में वह प्रशंसक, जिसने बाद में अपना नाम रॉनी बताया, सुरक्षाकर्मियों से सवाल करता दिखा: “आप उनका झंडा क्यों नहीं हटाते? यह यहूदी-विरोधी भावना लगती है।” सुरक्षा अधिकारियों ने “सुविधा की ओर से सुरक्षा” का हवाला देते हुए केवल इज़रायली ध्वज हटाने पर ज़ोर दिया। इज़रायली और अमेरिकी मीडिया ने इस घटना को नियमों के असमान लागू होने के रूप में रेखांकित किया, जिससे आयोजन की तटस्थता पर सवाल उठे।
खेल के मैदान पर ईरान को 2-2 की बराबरी से संतोष करना पड़ा, जिसे ईरानी मीडिया ने एक चूके हुए अवसर के रूप में देखा। पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी बेहताश फ़रीबा ने कहा कि टीम ने अपनी ग़लतियों की क़ीमत चुकाई और सबसे बुज़ुर्ग दस्ता होने के बावजूद युवा प्रतिभाओं को नज़रअंदाज़ करना समझ से परे है। ईरानी विश्लेषकों ने रक्षापंक्ति की बार-बार की कमज़ोरियों पर उंगली उठाई; कोच अमीर ग़लेनोई के कार्यकाल में 44 मैचों में 46 गोल खाए जा चुके हैं और केवल 19 बार क्लीन शीट रखी गई। हालाँकि, न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ एक अंक लेने के बाद भी उम्मीद बाक़ी है कि बेल्जियम या मिस्र में से किसी एक को हराकर अगले दौर में प्रवेश किया जा सकता है।
इस बराबरी से बड़ी चिंता टीम पर लादी गई असाधारण यात्रा पाबंदियों ने पैदा की। ईरानी फ़िज़ियोथेरेपिस्ट पाउलो अलेक्ज़ांडर आराउज़ो ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि अमेरिकी सरकार ने कारवाँ के लिए समय की इतनी सख़्त सीमाएँ तय कीं कि मैच के तुरंत बाद स्टेडियम और देश छोड़ना अनिवार्य था। नतीजतन, खिलाड़ियों की मरहम-पट्टी और चोटों का उपचार हवाई जहाज़ में मेक्सिको स्थित बेस शिविर लौटते समय करना पड़ा—एक ऐसी प्रक्रिया जो सामान्यतः ड्रेसिंग रूम में होती है। घाना और इतालवी मीडिया ने भी इस पर रिपोर्ट दी, जिसमें कोच ग़लेनोई की निराशा उद्धृत की गई। किसी अन्य टीम को ऐसी शर्तों का सामना नहीं करना पड़ा, जिससे तैयारी और रिकवरी बेहद मुश्किल हो गई।
इन तनावों के बीच, ईरानी प्रशंसकों का जोश किसी राहत से कम नहीं था। सहायक कोच रहमान रज़ाई, जो कभी इटली की सीरी ए में पेरूजा, लिवोर्नो और मेसिना के लिए खेले, ने बताया कि स्टेडियम में 60 हज़ार से अधिक ईरानी समर्थक मौजूद थे और ऐसा लगा जैसे विश्व कप तेहरान में खेला जा रहा हो। उन्होंने ज़ोर देकर कहा, “ईरान विश्व कप का हक़दार है, जनता हमारे साथ है।” यह भारी समर्थन टीम के लिए एक नैतिक बल तो है, लेकिन राजनीतिक रूप से संवेदनशील माहौल में यह दोहरी चुनौती भी खड़ी करता है—एक ओर मैदान पर प्रदर्शन का दबाव, दूसरी ओर कूटनीतिक पाबंदियों का बोझ।
आगे की राह ईरान के लिए आसान नहीं है। बेल्जियम और मिस्र जैसी मज़बूत टीमों के ख़िलाफ़ रक्षापंक्ति की कमज़ोरियों को दुरुस्त करना होगा, वरना ग्रुप चरण से बाहर होने का ख़तरा मँडराएगा। साथ ही, झंडा विवाद ने खेल आयोजनों में राजनीतिक अभिव्यक्ति की सीमाओं पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। अमेरिकी धरती पर ईरान की मौजूदगी पहले ही कूटनीतिक तनाव से घिरी है, और अब सुरक्षा के नाम पर चयनात्मक कार्रवाई ने आलोचकों को यह कहने का मौक़ा दे दिया है कि नियम सबके लिए एक समान नहीं। ईरानी टीम के लिए असली परीक्षा यह होगी कि वह इन बाहरी दबावों से परे हटकर अपना सर्वश्रेष्ठ खेल दिखा पाती है या नहीं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ईरान के विश्व कप पदार्पण पर, स्टीवर्ड्स ने एक इज़राइली झंडा जब्त कर लिया जबकि फिलिस्तीनी झंडे प्रदर्शित रहे। वीडियो में कैद इस घटना ने दोहरे मापदंड के आरोप लगाए और टूर्नामेंट में सुरक्षा और राजनीतिक प्रतीकों के प्रबंधन पर सवाल खड़े किए।
ईरान-न्यूजीलैंड मैच के दौरान, स्टीवर्ड्स ने एक इज़राइली झंडा हटा दिया जबकि पास के फिलिस्तीनी झंडे अछूते रहे। प्रशंसक ने विरोध किया, लेकिन उसे बताया गया कि यह उसकी सुरक्षा के लिए है। यह घटना विश्व कप में इज़राइली प्रतीकों के लिए शत्रुतापूर्ण माहौल को उजागर करती है।
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