
ईरान युद्धविराम और तेल कीमतों में नरमी के बीच बैंक ऑफ इंग्लैंड ने दरें स्थिर रखीं
अमेरिका-ईरान शांति समझौते और गिरती ऊर्जा कीमतों के चलते ब्रिटिश केंद्रीय बैंक ने लगातार चौथी बार ब्याज दर 3.75% पर रखी, हालांकि दो अधिकारियों ने वृद्धि की वकालत की।
बैंक ऑफ इंग्लैंड ने गुरुवार को अपनी जून मौद्रिक नीति बैठक में बेंचमार्क ब्याज दर को 3.75 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया। यह लगातार चौथी बैठक है जिसमें दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया। मतदान 7-2 से विभाजित रहा, जिसमें मुख्य अर्थशास्त्री ह्यू पिल और बाहरी सदस्य मेगन ग्रीन ने 0.25 प्रतिशत अंक की वृद्धि के पक्ष में मतदान किया। यह निर्णय ऐसे समय आया है जब रविवार को अमेरिका और ईरान के बीच एक रूपरेखा शांति समझौते की घोषणा ने होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति फिर शुरू होने की उम्मीद जगा दी है, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है। ब्रिटिश गवर्नर एंड्रयू बेली ने कहा कि तेल कीमतों में हालिया गिरावट सकारात्मक संकेत है, लेकिन वे अभी भी युद्ध-पूर्व स्तरों से ऊपर हैं।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में, यह कदम अमेरिकी फेडरल रिजर्व के एक दिन पहले लिए गए समान निर्णय के अनुरूप है, जिसने अपनी दर सीमा 3.50-3.75 प्रतिशत पर स्थिर रखी। हालांकि, यूरोपीय सेंट्रल बैंक ने ठीक एक सप्ताह पहले लगभग तीन वर्षों में पहली बार दरें बढ़ाई थीं, जो वैश्विक केंद्रीय बैंकों के बीच नीतिगत विचलन को दर्शाता है। लैटिन अमेरिकी और अरब मीडिया रिपोर्टों में इस बात पर जोर दिया गया कि ईरान संघर्ष के कारण उत्पन्न ऊर्जा मूल्य दबाव अब कम होता दिख रहा है, जिससे ब्रिटेन जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को राहत मिली है। रूसी स्रोतों ने भी नोट किया कि फेड और बीओई दोनों ने अपने दोहरे जनादेश—मूल्य स्थिरता और रोजगार समर्थन—के तहत स्थिरता को प्राथमिकता दी।
ब्रिटेन में मुद्रास्फीति मई में 2.8 प्रतिशत पर स्थिर रही, जो अर्थशास्त्रियों के 3 प्रतिशत तक बढ़ने के अनुमान से कम थी। फिर भी, बैंक को उम्मीद है कि वर्ष की अंतिम तिमाही में यह 3.25 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है, क्योंकि पिछले चार महीनों की ऊंची ऊर्जा कीमतों का विलंबित प्रभाव अभी बाकी है। ब्रिटिश वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि दरों के स्थिर रहने से बंधक ऋणदाताओं को आने वाले सप्ताहों में दरें घटाने का मार्ग प्रशस्त होगा, जिससे गर्मियों में उधारकर्ताओं को राहत मिल सकती है। बार्कलेज जैसे बैंक पहले ही कटौती की घोषणा कर चुके हैं। वहीं, बचतकर्ताओं के लिए यह एक "मूल्यवान अवसर की खिड़की" हो सकती है, क्योंकि जमा दरें अभी भी आकर्षक बनी रह सकती हैं।
दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए, इन घटनाक्रमों के मिश्रित प्रभाव हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य के फिर खुलने की संभावना से कच्चे तेल की कीमतों में नरमी भारत जैसे बड़े तेल आयातक के लिए आयात बिल घटा सकती है और मुद्रास्फीति दबाव को कम कर सकती है। हालांकि, वैश्विक केंद्रीय बैंकों की सतर्क मुद्रा—विशेषकर ईसीबी की दर वृद्धि—यह संकेत देती है कि मुद्रास्फीति का जोखिम पूरी तरह टला नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक भी अपनी आगामी नीति में वैश्विक तेल गतिशीलता और पूंजी प्रवाह को ध्यान में रखेगा। आने वाले महीनों में, यदि ईरान शांति समझौता ठोस रूप लेता है और तेल आपूर्ति सामान्य होती है, तो बैंक ऑफ इंग्लैंड सहित कई केंद्रीय बैंक दरों में कटौती की ओर बढ़ सकते हैं, लेकिन फिलहाल अनिश्चितता बनी हुई है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ब्रिटिश मौद्रिक अधिकारियों ने ब्याज दरों को स्थिर रखा और चेतावनी दी कि हालिया अमेरिका-ईरान संघर्ष विराम से मुद्रास्फीति जल्दी कम नहीं होगी। संघर्ष का आर्थिक प्रभाव दृष्टिकोण को धूमिल कर रहा है और ऊर्जा की कीमतें अभी भी ऊंची हैं।
बैंक ऑफ इंग्लैंड ने चौथी बार दरों को स्थिर रखा, अमेरिकी फेडरल रिजर्व का अनुसरण करते हुए, क्योंकि अमेरिका-ईरान समझौते ने तेल बाजारों को शांत किया। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन गवर्नर ने जोर देकर कहा कि ऊर्जा लागत युद्ध-पूर्व स्तरों से ऊपर बनी हुई है।
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