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क्रेमलिन ने जी7 शिखर सम्मेलन में ज़ेलेंस्की से मिलने के निमंत्रण को किया खारिज, मास्को में बातचीत का दोहराया प्रस्ताव

रूस ने स्पष्ट किया कि उसे कोई आधिकारिक निमंत्रण नहीं मिला, जबकि यूक्रेनी राष्ट्रपति ने फ्रांस में जी7 बैठक के दौरान सीधी वार्ता का सुझाव दिया था।

क्रेमलिन ने सोमवार को स्पष्ट किया कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की से मिलने का कोई आधिकारिक निमंत्रण नहीं मिला। प्रेस सचिव दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि मॉस्को और कीव के बीच औपचारिक संवाद के चैनल मौजूद नहीं हैं, और यदि ज़ेलेंस्की गंभीरता से बातचीत करना चाहते हैं तो वे हमेशा मास्को आ सकते हैं, जहाँ उनका स्वागत किया जाएगा। यह बयान यूक्रेनी पक्ष द्वारा फ्रांस में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान द्विपक्षीय वार्ता के प्रस्ताव के बाद आया।

यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने पहले कहा था कि उन्होंने पुतिन को एवियां-ले-बेन में 15 से 17 जून के बीच होने वाली जी7 बैठक के मौके पर मिलने का सुझाव दिया था, लेकिन रूस की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने इस पहल को “मेगाफोन डिप्लोमेसी” करार देते हुए कहा कि ज़ेलेंस्की का खुला पत्र भी अशिष्ट शैली में लिखा गया था। लावरोव के अनुसार, यूक्रेनी नेतृत्व वास्तविक कूटनीति के बजाय सार्वजनिक मंचों से संदेश देने की रणनीति अपना रहा है, जो गंभीर संवाद की संभावना को कमज़ोर करता है।

यह पूरा प्रकरण रूस-यूक्रेन संघर्ष में गहरी कूटनीतिक खाई को दर्शाता है। मॉस्को बार-बार कह चुका है कि वार्ता का रास्ता तभी खुलेगा जब कीव “ज़मीनी हकीकत” को स्वीकार करेगा, जबकि यूक्रेन पश्चिमी मंचों पर अपनी शर्तों पर चर्चा चाहता है। क्रेमलिन का यह रुख कि ज़ेलेंस्की को मास्को आना होगा, रूस की कूटनीतिक श्रेष्ठता की भावना को दर्शाता है और साथ ही पश्चिमी देशों की मध्यस्थता को दरकिनार करने की कोशिश है। फ्रांसीसी मीडिया के अनुसार, जी7 के मेज़बान राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी इस वार्ता की संभावना पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की, जिससे यह स्पष्ट है कि पश्चिमी गठबंधन इस पहल को लेकर सतर्क है।

भारत और दक्षिण एशिया के लिए यह गतिरोध कई मायनों में महत्वपूर्ण है। भारत ने लगातार संवाद और कूटनीति का समर्थन किया है, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों पक्षों से बातचीत की पेशकश की है। लेकिन जब तक मॉस्को और कीव के बीच सीधे संवाद का कोई भरोसेमंद ढांचा नहीं बनता, भारत जैसे तटस्थ मध्यस्थों की भूमिका सीमित रहेगी। इसके अलावा, लंबे संघर्ष से वैश्विक ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं पर दबाव बना रहेगा, जिसका सीधा असर दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक दोनों पक्ष अपनी पूर्व शर्तों पर अड़े रहेंगे, शांति वार्ता की कोई ठोस पहल सफल नहीं हो सकती।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 1 भाषाएँ

44%
लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa russa e CSIStampa europea continentale
Stampa russa e CSI/ stato
scetticismoironiapaternalismo

क्रेमलिन ने ज़ेलेंस्की के G7 निमंत्रण को अनौपचारिक बताकर खारिज कर दिया और दोहराया कि मॉस्को गंभीर बातचीत के लिए यूक्रेनी नेता का स्वागत करने को तैयार है। कीव की कूटनीति को नाटकीय और सारहीन बताया गया, जबकि रूसी प्रस्ताव को ज़िम्मेदार वार्ता का एकमात्र ठोस रास्ता बताया गया।

Stampa europea continentale/ est_europea
distaccopragmatismo

क्रेमलिन ने कहा कि पुतिन को ज़ेलेंस्की से G7 शिखर सम्मेलन के लिए कोई आधिकारिक निमंत्रण नहीं मिला, और मॉस्को तथा कीव के बीच सीधे आधिकारिक माध्यमों की कमी पर ध्यान दिलाया। रिपोर्ट वर्णनात्मक है, केवल खंडन और रूसी राजधानी में बैठक के वैकल्पिक प्रस्ताव को दर्ज करती है।

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रूस ने स्पष्ट किया कि उसे कोई आधिकारिक निमंत्रण नहीं मिला, जबकि यूक्रेनी राष्ट्रपति ने फ्रांस में जी7 बैठक के दौरान सीधी वार्ता का सुझाव दिया था।

क्रेमलिन ने सोमवार को स्पष्ट किया कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की से मिलने का कोई आधिकारिक निमंत्रण नहीं मिला। प्रेस सचिव दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि मॉस्को और कीव के बीच औपचारिक संवाद के चैनल मौजूद नहीं हैं, और यदि ज़ेलेंस्की गंभीरता से बातचीत करना चाहते हैं तो वे हमेशा मास्को आ सकते हैं, जहाँ उनका स्वागत किया जाएगा। यह बयान यूक्रेनी पक्ष द्वारा फ्रांस में आयोजित जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान द्विपक्षीय वार्ता के प्रस्ताव के बाद आया।

यूक्रेनी राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने पहले कहा था कि उन्होंने पुतिन को एवियां-ले-बेन में 15 से 17 जून के बीच होने वाली जी7 बैठक के मौके पर मिलने का सुझाव दिया था, लेकिन रूस की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने इस पहल को “मेगाफोन डिप्लोमेसी” करार देते हुए कहा कि ज़ेलेंस्की का खुला पत्र भी अशिष्ट शैली में लिखा गया था। लावरोव के अनुसार, यूक्रेनी नेतृत्व वास्तविक कूटनीति के बजाय सार्वजनिक मंचों से संदेश देने की रणनीति अपना रहा है, जो गंभीर संवाद की संभावना को कमज़ोर करता है।

यह पूरा प्रकरण रूस-यूक्रेन संघर्ष में गहरी कूटनीतिक खाई को दर्शाता है। मॉस्को बार-बार कह चुका है कि वार्ता का रास्ता तभी खुलेगा जब कीव “ज़मीनी हकीकत” को स्वीकार करेगा, जबकि यूक्रेन पश्चिमी मंचों पर अपनी शर्तों पर चर्चा चाहता है। क्रेमलिन का यह रुख कि ज़ेलेंस्की को मास्को आना होगा, रूस की कूटनीतिक श्रेष्ठता की भावना को दर्शाता है और साथ ही पश्चिमी देशों की मध्यस्थता को दरकिनार करने की कोशिश है। फ्रांसीसी मीडिया के अनुसार, जी7 के मेज़बान राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी इस वार्ता की संभावना पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की, जिससे यह स्पष्ट है कि पश्चिमी गठबंधन इस पहल को लेकर सतर्क है।

भारत और दक्षिण एशिया के लिए यह गतिरोध कई मायनों में महत्वपूर्ण है। भारत ने लगातार संवाद और कूटनीति का समर्थन किया है, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों पक्षों से बातचीत की पेशकश की है। लेकिन जब तक मॉस्को और कीव के बीच सीधे संवाद का कोई भरोसेमंद ढांचा नहीं बनता, भारत जैसे तटस्थ मध्यस्थों की भूमिका सीमित रहेगी। इसके अलावा, लंबे संघर्ष से वैश्विक ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं पर दबाव बना रहेगा, जिसका सीधा असर दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक दोनों पक्ष अपनी पूर्व शर्तों पर अड़े रहेंगे, शांति वार्ता की कोई ठोस पहल सफल नहीं हो सकती।

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क्रेमलिन ने ज़ेलेंस्की के G7 निमंत्रण को अनौपचारिक बताकर खारिज कर दिया और दोहराया कि मॉस्को गंभीर बातचीत के लिए यूक्रेनी नेता का स्वागत करने को तैयार है। कीव की कूटनीति को नाटकीय और सारहीन बताया गया, जबकि रूसी प्रस्ताव को ज़िम्मेदार वार्ता का एकमात्र ठोस रास्ता बताया गया।

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क्रेमलिन ने कहा कि पुतिन को ज़ेलेंस्की से G7 शिखर सम्मेलन के लिए कोई आधिकारिक निमंत्रण नहीं मिला, और मॉस्को तथा कीव के बीच सीधे आधिकारिक माध्यमों की कमी पर ध्यान दिलाया। रिपोर्ट वर्णनात्मक है, केवल खंडन और रूसी राजधानी में बैठक के वैकल्पिक प्रस्ताव को दर्ज करती है।

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