
ट्रंप का नया रुख: ईरान समझौते का दूसरा चरण ‘आसान’, लेकिन अमेरिकी निवेश नहीं करेगा
जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान कतर के अमीर के साथ बैठक में ट्रंप ने ईरान पर शासन बदलने की कोशिशों की विफलता स्वीकारी और परमाणु रोकथाम को प्राथमिकता बताई।
फ्रांस के एवियां-ले-बां में जारी जी-7 शिखर सम्मेलन के इतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल-थानी की मुलाकात ने ईरान समझौते को लेकर कई नई परतें खोल दीं। ट्रंप ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि ईरान में शासन बदलने की कोशिशें हुईं, लेकिन वे नाकाम रहीं। उन्होंने कहा कि अब तेहरान के साथ जो समझौता हुआ है, वह दूसरे चरण में प्रवेश कर रहा है और यह चरण पहले से “आसान” होगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों पक्षों के बीच हाल ही में एक प्रारंभिक सहमति-पत्र पर हस्ताक्षर हुए हैं, जिसके तहत तकनीकी वार्ता, वित्तीय राहत के उपाय और हरमुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने जैसे मुद्दों पर चर्चा होनी है।
ट्रंप ने स्पष्ट किया कि वाशिंगटन का मुख्य लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है, और यदि तेहरान ने ऐसा प्रयास किया तो “जहन्नुम टूट पड़ेगा।” उन्होंने यह भी खुलासा किया कि अमेरिका ने ईरान में परमाणु धूल वाले एक स्थल को नष्ट किया था और वह ईरान का संवर्धित यूरेनियम अपने कब्जे में लेना चाहता है। इसके बावजूद, ट्रंप ने मौजूदा ईरानी नेतृत्व को “अत्यंत तर्कसंगत” और पिछली सरकारों से अधिक बुद्धिमान बताया, जो अपने देश की मदद चाहते हैं। यह लहजा उस राष्ट्रपति के लिए उल्लेखनीय है जो कभी “अधिकतम दबाव” की नीति पर चल रहा था।
आर्थिक पक्ष पर ट्रंप का रुख सख्त रहा: “हम ईरान में कोई पैसा निवेश नहीं करेंगे।” उन्होंने बताया कि 300 अरब डॉलर का पुनर्निर्माण कोष खाड़ी देशों द्वारा वित्तपोषित होगा, जिससे अमेरिकी सहयोगियों की यह चिंता दूर हो सके कि तेहरान को सीधे अमेरिकी धन मिल सकता है। कतर के अमीर ने इस मंच पर दोहा और वाशिंगटन के बीच व्यापारिक साझेदारी को एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक तक पहुंचाने की संभावना जताई और ईरान-अमेरिका समझौते को “बहुत महत्वपूर्ण” बताते हुए कहा कि अभी कई बारीकियां सुलझानी बाकी हैं। कतर की मध्यस्थता की ट्रंप ने मुक्तकंठ से प्रशंसा की और उसे “साहसी” कदम बताया।
क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य से देखें तो यह समझौता मध्य-पूर्व की व्यापक शांति प्रक्रिया से जुड़ता जा रहा है। ट्रंप ने लेबनान संघर्ष को “छोटा” बताया और इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से किसी मोहभंग से इनकार किया, हालांकि उन्होंने इज़राइल पर लेबनान के प्रति जवाबदेही तय करने का दबाव भी डाला। सीरिया के संदर्भ में भी नए दृष्टिकोण के संकेत मिले। यह सब एक ऐसे क्षेत्रीय ढांचे की ओर इशारा करता है जिसमें ईरान को आर्थिक प्रोत्साहन और सुरक्षा गारंटी देकर उसके परमाणु कार्यक्रम को सीमित किया जाए, जबकि खाड़ी देश आर्थिक इंजन की भूमिका निभाएं।
दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए इस घटनाक्रम के दोहरे आयाम हैं। एक ओर, हरमुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने और क्षेत्रीय तनाव में कमी से ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाएं स्थिर होंगी और कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव घटेगा। दूसरी ओर, यदि ईरान परमाणु हथियार मुक्त रहता है और पश्चिम के साथ आर्थिक जुड़ाव बढ़ता है, तो चाबहार बंदरगाह जैसी भारत की रणनीतिक परियोजनाओं को नई गति मिल सकती है। हालांकि, ट्रंप का यह रुख कितना स्थायी होगा, यह आगामी तकनीकी वार्ताओं और अमेरिकी घरेलू राजनीति पर निर्भर करेगा। फिलहाल, यह स्पष्ट है कि शासन बदलने की नाकाम कोशिशों के बाद वाशिंगटन ने व्यावहारिक कूटनीति का रास्ता चुना है, जहां ईरान का आर्थिक पुनर्निर्माण खाड़ी देश करेंगे और अमेरिका अपनी जेब बंद रखेगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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अमेरिकी राष्ट्रपति, जिन्हें एक आतंकवादी नेता के रूप में वर्णित किया गया, ने स्वीकार किया कि ईरानी सरकार को उखाड़ फेंकने के प्रयास विफल रहे। जबकि वह एक निष्पक्ष समझौते की बात करते हैं और किसी भी अमेरिकी निवेश से इनकार करते हैं, तेहरान दोहराता है कि उसकी परमाणु गतिविधियाँ शांतिपूर्ण हैं, जैसा कि अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों और एक धार्मिक आदेश द्वारा पुष्टि की गई है।
G7 शिखर सम्मेलन से, अमेरिकी राष्ट्रपति ने कई संदेश दिए, इस बात पर जोर देते हुए कि परमाणु समझौते का मुख्य उद्देश्य ईरान को बम प्राप्त करने से रोकना है। उन्होंने तेहरान के वर्तमान नेतृत्व को तर्कसंगत और चतुर बताते हुए प्रशंसा की, जबकि चेतावनी दी कि हथियार बनाने का कोई भी प्रयास विनाशकारी परिणाम लाएगा।
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