
फ्रांस ने 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया, यूरोपीय संघ में पहला कदम
फ्रांस की संसद ने मंगलवार को एक कानून पारित कर 15 वर्ष से कम आयु के नागरिकों के लिए सोशल मीडिया तक पहुंच पर रोक लगा दी, जिससे वह यूरोपीय संघ में ऐसा करने वाला पहला देश बन गया।
फ्रांस की संसद ने 21 जुलाई को एक विधेयक को अंतिम मंजूरी दे दी, जो 15 साल से कम उम्र के बच्चों और किशोरों के सोशल मीडिया खाते बनाने और उनका उपयोग करने पर प्रतिबंध लगाता है। सीनेट में 243-2 और नेशनल असेंबली में 279-81 के मतों से पारित यह कानून दो चरणों में लागू होगा: 1 सितंबर 2026 से नए खाते नहीं खोले जा सकेंगे, और 1 जनवरी 2027 तक पहले से मौजूद सभी खाते बंद कर दिए जाएंगे। इसके साथ ही हाई स्कूलों में मोबाइल फोन के उपयोग पर भी पाबंदी लगा दी गई है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इसे “बच्चों और किशोरों की सुरक्षा की दिशा में यूरोप का नेतृत्व” करार दिया है।
फ्रांस सरकार के अनुसार, यह कदम बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के हानिकारक प्रभावों—जैसे आत्म-सम्मान में कमी, साइबर बुलिंग, और आत्महत्या से जुड़ी सामग्री के संपर्क—को देखते हुए उठाया गया है। डिजिटल मामलों की मंत्री ऐन ले हेनान्फ ने कहा कि प्लेटफ़ॉर्मों को आयु सत्यापन के लिए तकनीकी समाधान खुद खोजने होंगे, और सरकार का मानना है कि ऐसे उपकरण पहले से मौजूद हैं। दूसरी ओर, वामपंथी दलों और कुछ सीनेटरों ने इस कानून की व्यवहार्यता, गोपनीयता पर इसके प्रभाव, और संवैधानिकता पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि अनिवार्य आयु सत्यापन ऑनलाइन गुमनामी को समाप्त कर सकता है और इसे लागू करना कठिन होगा। यूरोपीय आयोग ने भी संकेत दिया है कि राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह के प्रतिबंध यूरोपीय संघ के डिजिटल सेवा अधिनियम (DSA) से टकरा सकते हैं, हालांकि फ्रांस ने विधेयक के अंतिम प्रारूप में सामंजस्य स्थापित करने का दावा किया है।
वैश्विक स्तर पर, ऑस्ट्रेलिया दिसंबर 2025 में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला देश बन चुका है, लेकिन वहां के ई-सेफ्टी आयोग के अनुसार, प्रतिबंध के बावजूद 10 में से 7 बच्चों की किसी न किसी रूप में पहुंच बनी हुई है। ब्रिटेन ने भी 16 साल से कम आयु के लिए प्रतिबंध और 16-17 साल के किशोरों के लिए रात 12 से सुबह 6 बजे तक डिफ़ॉल्ट कर्फ्यू की घोषणा की है। स्पेन, ग्रीस, डेनमार्क, इटली और पोलैंड समेत कई यूरोपीय देश इसी तरह के कानून पर विचार कर रहे हैं। यूरोपीय आयोग ने स्वयं एक आयु सत्यापन ऐप का परीक्षण शुरू किया है और आगामी सितंबर में पूरे संघ के लिए एक समान कानून प्रस्तावित करने की योजना है।
दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत में, बच्चों के स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया की लत को लेकर चिंता बढ़ रही है, लेकिन अभी तक कोई राष्ट्रीय प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। इंडोनेशिया के पश्चिम जावा प्रांत में एक क्षेत्रीय विधेयक पर चर्चा चल रही है, जो इस वैश्विक लहर का हिस्सा है। फ्रांस का कानून अब संवैधानिक परिषद की समीक्षा के लिए भेजा जाएगा; यदि उसे मंजूरी मिलती है, तो यह सितंबर से नए खातों के लिए प्रभावी होगा और जनवरी 2027 तक सभी मौजूदा खातों पर लागू होगा। इस बीच, यूरोपीय संघ स्तर पर एक समान कानून का मसौदा गर्मियों के बाद आने की उम्मीद है, जो पूरे महाद्वीप में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा की दिशा तय कर सकता है।
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | +0.80 | aligned |
|---|---|---|
| अरब लेवांत-मगरिब प्रेस | 0.00 | neutral |
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | +0.20 | neutral |
France leads Europe with a historic ban for under-15s, a necessary step after alarming reports on social media's harmful effects.
By repeatedly calling France 'first in the EU' and quoting the digital minister's celebratory statement, the narrative creates a sense of inevitable progress and European leadership.
The bloc omits any mention of internal political opposition or the fact that the law still required final votes in both chambers at the time of reporting.
France advances a law to protect minors, a procedural step still awaiting final parliamentary approval.
By detailing the commission stages and the need for final votes, the narrative presents the law as a technical, inevitable process rather than a political choice.
The bloc omits the celebratory tone and the personal involvement of President Macron, as well as the specific report on harms.
France enacts a historic law but not without internal controversy, marking a step forward in social media regulation.
By acknowledging both the historic ambition and the internal disagreements, the narrative creates a balanced, credible account that avoids pure celebration or criticism.
The bloc omits the fact that France is the first EU country to pass such a law, downplaying the pioneering aspect.
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