
होर्मुज खुला, ईरान वार्ता में ट्रंप का 'ताकत की स्थिति' का दावा; जब्त संपत्तियों पर नई रार
युद्धविराम और परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत के बीच ट्रंप प्रशासन ने ईरान की जब्त संपत्तियों से अमेरिकी कृषि उत्पाद खरीदने की योजना बनाई है, जिसका तेहरान विरोध कर रहा है।
अमेरिका और ईरान के बीच हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (एमओयू) के बाद तीन महीने से अधिक समय से जारी सैन्य टकराव थम गया है और होर्मुज जलडमरूमध्य को यातायात के लिए फिर से खोल दिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में किसानों के साथ रात्रिभोज के दौरान कहा कि वाशिंगटन 'शुद्ध ताकत की स्थिति' से बातचीत कर रहा है और तेहरान यह जानता है। उन्होंने दावा किया कि ईरान एक समझौता करना चाहता है और अमेरिका ने उसे 'बुरी तरह परास्त' किया है। इसी कार्यक्रम में ट्रंप ने यह भी घोषणा की कि जल्द ही ईरान की उन जब्त संपत्तियों का इस्तेमाल अमेरिकी किसानों से गेहूं, मक्का और सोयाबीन खरीदने में किया जाएगा, जो प्रतिबंधों में ढील के तहत अनफ्रीज़ की जा रही हैं। हालांकि, ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर कलीबाफ ने स्पष्ट किया कि तेहरान अपनी अनब्लॉक होने वाली राशि को अमेरिकी उत्पादों पर खर्च नहीं करना चाहता।
अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, 18 जून को हस्ताक्षरित 14-सूत्रीय एमओयू के तहत सभी मोर्चों पर शत्रुता रोक दी गई है, लेबनान में भी युद्धविराम लागू है, और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटा ली गई है। व्हाइट हाउस का कहना है कि इसका लक्ष्य एक दीर्घकालिक व्यापक शांति समझौता है। इसी कड़ी में 30 जून से स्विट्ज़रलैंड में तकनीकी स्तर की वार्ता शुरू होगी, जिसमें ईरान के संचित संवर्धित यूरेनियम भंडार का मुद्दा प्रमुख होगा। अमेरिकी पक्ष ने ईरान से यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह त्यागने की मांग की है, जबकि तेहरान अप्रत्यक्ष वार्ता प्रारूप पर ज़ोर देता रहा है और ओमान की मध्यस्थता में कई बैठकें हुई हैं। अमेरिकी प्रशासन के भीतर ही इस एमओयू की विश्वसनीयता को लेकर मतभेद हैं: विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री ने ईरान की रियायत देने की इच्छा पर संदेह जताया है, जबकि ट्रंप के अन्य सलाहकारों ने दस्तावेज़ का समर्थन किया।
होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना वैश्विक ऊर्जा बाज़ार के लिए तत्काल राहत लेकर आया है। ट्रंप के अनुसार, एक ही दिन में 1.9 करोड़ बैरल तेल का निर्यात हुआ, जो अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा है। भारत जैसे प्रमुख कच्चे तेल आयातक के लिए यह मार्ग महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसकी अधिकांश आपूर्ति इसी जलडमरूमध्य से होकर गुज़रती है। दूसरी ओर, ईरान ने जलडमरूमध्य पर अपनी संप्रभुता का दावा करते हुए इसे ओमान के साथ मिलकर प्रबंधित करने और जहाज़ों से शुल्क वसूलने की मंशा जताई है। एमओयू का एक बड़ा हिस्सा 'सज्जन समझौतों' पर आधारित है, जिनका विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिससे इसकी स्थायित्व पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।
परमाणु मुद्दे पर, एमओयू में ईरान ने यह प्रतिबद्धता जताई है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा और अपना संवर्धित यूरेनियम अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) को सौंप देगा। यह 2015 के संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) से भिन्न है, जिसमें संवर्धन की सीमा 3.67 प्रतिशत और भंडार 300 किलोग्राम तय की गई थी, साथ ही सेंट्रीफ्यूजों की संख्या भी सीमित की गई थी। 2018 में अमेरिका के जेसीपीओए से हटने के बाद ईरान ने ये सीमाएं तोड़ दीं और 60 प्रतिशत तक संवर्धन कर लिया। पश्चिमी विश्लेषकों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन अगर जेसीपीओए से बेहतर समझौता करना चाहता है तो उसे ईरान से ऐसी रियायतें लेनी होंगी जो उसने अब तक नहीं दी हैं।
फिलहाल 60 दिनों की वार्ता अवधि जारी है और 30 जून से तकनीकी बैठकें शुरू होंगी। अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेटिक सदस्यों ने युद्ध पर रोक लगाने वाला प्रस्ताव पारित किया है, जिसे कुछ रिपब्लिकनों का भी समर्थन मिला, लेकिन ट्रंप ने इसकी आलोचना की है। व्हाइट हाउस ने अतिरिक्त 87.6 अरब डॉलर के व्यय की मांग की है, जिसे लेकर कांग्रेस में सहमति नहीं बन पाई है। ईरानी मीडिया के अनुसार, तेहरान को दो किश्तों में 12 अरब डॉलर मिलने की बात कही गई है, लेकिन ट्रंप ने कहा कि अभी तक कोई राशि नहीं दी गई है। यह समझौता अस्थायी राहत प्रदान करता है, लेकिन यदि संवर्धन और प्रतिबंधों जैसे मुख्य मुद्दों पर सहमति नहीं बनी तो सैन्य टकराव की वापसी की आशंका बनी रहेगी।
| अरब खाड़ी प्रेस | −0.30 | critical |
|---|---|---|
| रूसी और सीआईएस प्रेस | 0.00 | neutral |
We in the Gulf condemn Iranian provocations and back American resolve to defend freedom of the seas.
It builds a regional 'us' against an Iranian 'them,' linking US firmness to international legitimacy.
We observe global dynamics without aligning, focusing on our internal priorities and technological sovereignty.
The Iran dossier is minimized by shifting attention to national issues, presenting Russia as a disinterested external actor.
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