
अमेरिका के 250वें स्वतंत्रता दिवस पर सांस्कृतिक संघर्ष और विभाजित आख्यान
फिलाडेल्फिया में दासता-केंद्रित प्रदर्शनी को हटाने के प्रयास और वाशिंगटन में राजकीय मेले की कम उपस्थिति ने राष्ट्रीय पहचान की बहस को जन्म दिया है।
संयुक्त राज्य अमेरिका की स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ के आयोजन राजनीतिक और सांस्कृतिक विवादों के केंद्र में आ गए हैं। फिलाडेल्फिया स्थित पहले राष्ट्रपति भवन में जॉर्ज वाशिंगटन द्वारा रखे गए नौ दासों पर केंद्रित प्रदर्शनी को हटाने के ट्रंप प्रशासन के प्रयास ने नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और शहर प्रशासन के साथ सीधा टकराव पैदा कर दिया है। वहीं, वाशिंगटन के नेशनल मॉल पर आयोजित ‘ग्रेट अमेरिकन स्टेट फेयर’ में कम उपस्थिति की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद प्रशासन को बचाव की मुद्रा में आना पड़ा है।
ट्रंप प्रशासन के अनुसार, फिलाडेल्फिया की प्रदर्शनी ‘विभाजनकारी, नस्ल-केंद्रित विचारधाराओं’ को बढ़ावा देती है और संघीय संग्रहालयों को ‘अमेरिकी जनता की महानता और प्रगति’ पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यह रुख राष्ट्रपति के उस कार्यकारी आदेश पर आधारित है जो ‘अमेरिकी इतिहास में सत्य और विवेक की बहाली’ का लक्ष्य रखता है। दूसरी ओर, प्रदर्शनी के सह-आरंभकर्ता माइकल कोर्ड और स्थानीय कार्यकर्ता इसे ऐतिहासिक सत्य को दबाने का प्रयास बताते हैं। उन्होंने खाली किए गए प्रदर्शनी स्थलों पर ‘हम सत्य को स्वतःसिद्ध मानते हैं’ जैसे संदेश चिपकाकर विरोध जताया है। मेले के संदर्भ में, आयोजकों ने पहले तीन दिनों में 1.5 लाख से अधिक आगंतुकों का दावा किया, जबकि फॉक्स न्यूज के संवाददाताओं ने भी भीड़ की मौजूदगी की पुष्टि की, लेकिन स्वतंत्र पत्रकारों और डेमोक्रेटिक सांसद शॉन कास्टेन ने इसे सामान्य राष्ट्रीय मॉल की भीड़ से कम बताया।
यूरोपीय परिप्रेक्ष्य से, स्विस एनजेडजेड ने इस विवाद को अमेरिकी संस्थापक पिताओं की विरासत पर एक ‘संस्कृति युद्ध’ करार दिया, जबकि फ्रांसीसी ल तां ने प्रश्न उठाया कि क्या अमेरिका अब भी ‘दुनिया में अच्छाई की ताकत’ है। इजरायली हारेत्ज ने संस्थापकों की इस आशंका का विश्लेषण किया कि एक धन-संचालित, मीडिया-प्रभावित व्यवस्था में कोई धूर्त अल्पसंख्यक गुट लोकतंत्र को भीतर से खोखला कर सकता है, और वर्तमान स्थिति को उसी आशंका की प्रतिध्वनि बताया। ब्राजील के मेट्रोपोलिस में प्रकाशित एक टिप्पणी ने जेफरसन के ‘जीवन, स्वतंत्रता और खुशी की खोज’ के आदर्शों और ट्रंप के शासन के बीच ऐतिहासिक विरोधाभास को रेखांकित किया।
अमेरिकी मीडिया में यह विभाजन स्पष्ट दिखा। फॉक्स न्यूज के विश्लेषणों ने छोटे व्यवसायों के पुनरुत्थान, ऊर्जा प्रभुत्व और इजरायल के साथ ‘अनुबंध नहीं, वाचा’ वाले संबंधों को अमेरिकी महानता का प्रमाण बताया। वहीं, सीबीएस न्यूज और बीबीसी ने अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स, फिल्मकार केन बर्न्स और कवि अमांडा गोर्मन जैसी हस्तियों के माध्यम से स्वतंत्रता की नाजुकता और साझा मूल्यों की पहचान के संघर्ष को उजागर किया। बीबीसी की रिपोर्ट में देशभर के आम नागरिकों ने ‘हम अब भी खड़े हैं’ की मिली-जुली भावना व्यक्त की।
ये घटनाक्रम ट्रंप प्रशासन की ‘फ्रीडम250’ पहल के तहत हो रहे हैं, जिसे द्विदलीय कांग्रेसी आदेश वाली ‘अमेरिका250’ समिति के समानांतर खड़ा किया गया है। फिलाडेल्फिया प्रदर्शनी का भविष्य फिलहाल अनिश्चित है, और कार्यकर्ता विरोध जारी रखने की योजना बना रहे हैं। वर्षगांठ के कार्यक्रम पूरे वर्ष चलेंगे, और आगामी चुनावी मौसम में ऐतिहासिक स्मृति और राष्ट्रीय पहचान को लेकर सांस्कृतिक टकराव और तेज होने की संभावना है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
2 संपादकीय समूह · 3 भाषाएँ
The 250th anniversary of the United States was a flop due to Donald Trump's divisive leadership. The celebrations exposed the deep cultural and political rift in the country, betraying the Enlightenment ideals on which the nation was founded. The event was more a showcase of presidential ego than a unifying national celebration.
Donald Trump staged a grandiose but hollow jubilee for the 250th anniversary of the United States, using patriotic pomp to mask deep social divisions. The event was more an image operation than a true celebration of national unity. The cracks in the social fabric emerged despite the splendor.
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