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ट्रंप का नेतन्याहू पर तीखा हमला: 'इज़रायल दो घंटे नहीं टिकता', ईरान पर तल्खी

अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान समझौते के बाद नेतन्याहू को 'बहुत मुश्किल' बताकर उनकी आलोचना की और लेबनान हमले पर भड़कते हुए कहा कि इज़रायल को आभारी होना चाहिए।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर अभूतपूर्व तीखा हमला करते हुए उन्हें “बहुत मुश्किल इंसान” बताया और कहा कि यदि ईरान के पास परमाणु हथियार होता तो इज़रायल “दो घंटे भी नहीं टिकता।” यह बयान उस समय आया जब ट्रंप ने ईरान के साथ हाल में हुए शांति समझौते का बचाव करते हुए नेतन्याहू को याद दिलाया कि उन्हें अमेरिका का आभारी होना चाहिए।

दरअसल, ट्रंप की नाराज़गी तब भड़की जब इज़रायल ने रविवार 14 जून को लेबनान पर हमला कर दिया, ऐसा कदम जो अमेरिका की स्पष्ट मनाही के बावजूद उठाया गया। एक अन्य साक्षात्कार में ट्रंप ने अपशब्दों का इस्तेमाल करते हुए पूछा, “बीबी को वो हमला करने की क्या ज़रूरत थी? मैं गुस्से में था। उसमें ज़रा भी समझदारी नहीं है।” यह हमला ईरान के साथ जारी नाज़ुक वार्ता के ठीक उसी मोड़ पर हुआ जब एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर होने वाले थे, जिससे पूरी प्रक्रिया पटरी से उतरने का ख़तरा पैदा हो गया। ट्रंप ने साफ़ कहा कि लेबनान में इज़रायल के और हमले नहीं होने चाहिए, लेकिन साथ ही हिज़्बुल्लाह को भी इज़रायल पर हमला बंद करना होगा, तभी एक स्थायी शांति की शुरुआत हो सकती है।

इस विवाद के बीच ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सराहना की, जिन्होंने होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकेबंदी के दौरान तनाव बढ़ाने से परहेज़ किया और समझौते के लिए रचनात्मक भूमिका निभाई। यह प्रशंसा नेतन्याहू के प्रति बढ़ती उपेक्षा को और रेखांकित करती है। एक ओर जहाँ ट्रंप मास्को और बीजिंग को शांति का साझीदार बता रहे हैं, वहीं इज़रायल के सबसे करीबी सहयोगी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना अमेरिकी कूटनीति के प्राथमिकता बदलाव का स्पष्ट संकेत है।

यह तल्खी भारत जैसे देशों के लिए बहुस्तरीय संकेत लेकर आई है, जो इज़रायल और ईरान दोनों के साथ गहरे रिश्ते रखता है। अमेरिका-ईरान समझौता यदि सफल होता है तो खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम होगा, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार बंदरगाह परियोजना को स्थिरता मिलेगी। लेकिन यदि नेतन्याहू एकतरफा सैन्य कार्रवाई जारी रखते हैं और ईरान के साथ समझौता टूटता है, तो व्यापक संघर्ष की आशंका दक्षिण एशिया के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर सकती है—अफ़ग़ानिस्तान से मध्य एशिया तक कनेक्टिविटी के सपने फिर अधूरे रह सकते हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का यह सख्त रुख महज़ आवेश नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में नए शक्ति संतुलन की ओर इशारा है। पिछले कुछ हफ़्तों में दोनों नेताओं के बीच बढ़ती दूरी ने उस “विशेष रिश्ते” को हिलाकर रख दिया है जो दशकों से अमेरिका-इज़रायल गठबंधन की रीढ़ रहा है। आने वाले दिन बताएँगे कि क्या नेतन्याहू इस दबाव में झुककर शांति प्रक्रिया को स्वीकार करेंगे, या फिर टकराव की राह चुनकर क्षेत्र को एक नई अस्थिरता की ओर धकेल देंगे। दुनिया की निगाहें अब तेहरान और तेल अवीव—दोनों पर टिकी हैं।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

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लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
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ईरान के साथ शांति समझौते के बाद ट्रम्प ने नेतन्याहू की कड़ी आलोचना करते हुए उन्हें बहुत मुश्किल इंसान बताया और कहा कि इज़राइल को आभारी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि 14 जून रविवार को लेबनान पर इज़राइली हमला संवेदनशील वार्ता के दौरान हुआ और ऐसा नहीं होना चाहिए था। अगर ईरान के पास परमाणु हथियार होता तो इज़राइल दो घंटे भी नहीं टिकता।

Stampa europea continentale
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ट्रम्प और नेतन्याहू का रिश्ता गहरे अविश्वास के दौर में पहुँच गया है, अमेरिकी राष्ट्रपति ने निजी तौर पर गुस्से में भद्दी गालियाँ दीं। ट्रम्प ने कहा कि वे इस बात से बहुत नाराज़ थे कि नेतन्याहू ने बिना सूझबूझ के लेबनान पर हमला कर दिया और उन्होंने साफ शब्दों में यह बात बता दी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर अमेरिका ने ईरान पर कार्रवाई नहीं की होती तो इज़राइल का वजूद ही नहीं होता।

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ट्रंप का नेतन्याहू पर तीखा हमला: 'इज़रायल दो घंटे नहीं टिकता', ईरान पर तल्खी

अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान समझौते के बाद नेतन्याहू को 'बहुत मुश्किल' बताकर उनकी आलोचना की और लेबनान हमले पर भड़कते हुए कहा कि इज़रायल को आभारी होना चाहिए।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर अभूतपूर्व तीखा हमला करते हुए उन्हें “बहुत मुश्किल इंसान” बताया और कहा कि यदि ईरान के पास परमाणु हथियार होता तो इज़रायल “दो घंटे भी नहीं टिकता।” यह बयान उस समय आया जब ट्रंप ने ईरान के साथ हाल में हुए शांति समझौते का बचाव करते हुए नेतन्याहू को याद दिलाया कि उन्हें अमेरिका का आभारी होना चाहिए।

दरअसल, ट्रंप की नाराज़गी तब भड़की जब इज़रायल ने रविवार 14 जून को लेबनान पर हमला कर दिया, ऐसा कदम जो अमेरिका की स्पष्ट मनाही के बावजूद उठाया गया। एक अन्य साक्षात्कार में ट्रंप ने अपशब्दों का इस्तेमाल करते हुए पूछा, “बीबी को वो हमला करने की क्या ज़रूरत थी? मैं गुस्से में था। उसमें ज़रा भी समझदारी नहीं है।” यह हमला ईरान के साथ जारी नाज़ुक वार्ता के ठीक उसी मोड़ पर हुआ जब एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर होने वाले थे, जिससे पूरी प्रक्रिया पटरी से उतरने का ख़तरा पैदा हो गया। ट्रंप ने साफ़ कहा कि लेबनान में इज़रायल के और हमले नहीं होने चाहिए, लेकिन साथ ही हिज़्बुल्लाह को भी इज़रायल पर हमला बंद करना होगा, तभी एक स्थायी शांति की शुरुआत हो सकती है।

इस विवाद के बीच ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सराहना की, जिन्होंने होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकेबंदी के दौरान तनाव बढ़ाने से परहेज़ किया और समझौते के लिए रचनात्मक भूमिका निभाई। यह प्रशंसा नेतन्याहू के प्रति बढ़ती उपेक्षा को और रेखांकित करती है। एक ओर जहाँ ट्रंप मास्को और बीजिंग को शांति का साझीदार बता रहे हैं, वहीं इज़रायल के सबसे करीबी सहयोगी को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना अमेरिकी कूटनीति के प्राथमिकता बदलाव का स्पष्ट संकेत है।

यह तल्खी भारत जैसे देशों के लिए बहुस्तरीय संकेत लेकर आई है, जो इज़रायल और ईरान दोनों के साथ गहरे रिश्ते रखता है। अमेरिका-ईरान समझौता यदि सफल होता है तो खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम होगा, जिससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार बंदरगाह परियोजना को स्थिरता मिलेगी। लेकिन यदि नेतन्याहू एकतरफा सैन्य कार्रवाई जारी रखते हैं और ईरान के साथ समझौता टूटता है, तो व्यापक संघर्ष की आशंका दक्षिण एशिया के लिए नई चुनौतियाँ खड़ी कर सकती है—अफ़ग़ानिस्तान से मध्य एशिया तक कनेक्टिविटी के सपने फिर अधूरे रह सकते हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का यह सख्त रुख महज़ आवेश नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में नए शक्ति संतुलन की ओर इशारा है। पिछले कुछ हफ़्तों में दोनों नेताओं के बीच बढ़ती दूरी ने उस “विशेष रिश्ते” को हिलाकर रख दिया है जो दशकों से अमेरिका-इज़रायल गठबंधन की रीढ़ रहा है। आने वाले दिन बताएँगे कि क्या नेतन्याहू इस दबाव में झुककर शांति प्रक्रिया को स्वीकार करेंगे, या फिर टकराव की राह चुनकर क्षेत्र को एक नई अस्थिरता की ओर धकेल देंगे। दुनिया की निगाहें अब तेहरान और तेल अवीव—दोनों पर टिकी हैं।

स्रोतों में मतभेद

भूराजनीति · 3 स्रोत · 3 भाषाएँ

0%कम

स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

निंदक100%

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 3 भाषाएँ

लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa latinoamericanaStampa europea continentale
Stampa latinoamericana
indignazioneurgenza

ईरान के साथ शांति समझौते के बाद ट्रम्प ने नेतन्याहू की कड़ी आलोचना करते हुए उन्हें बहुत मुश्किल इंसान बताया और कहा कि इज़राइल को आभारी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि 14 जून रविवार को लेबनान पर इज़राइली हमला संवेदनशील वार्ता के दौरान हुआ और ऐसा नहीं होना चाहिए था। अगर ईरान के पास परमाणु हथियार होता तो इज़राइल दो घंटे भी नहीं टिकता।

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ट्रम्प और नेतन्याहू का रिश्ता गहरे अविश्वास के दौर में पहुँच गया है, अमेरिकी राष्ट्रपति ने निजी तौर पर गुस्से में भद्दी गालियाँ दीं। ट्रम्प ने कहा कि वे इस बात से बहुत नाराज़ थे कि नेतन्याहू ने बिना सूझबूझ के लेबनान पर हमला कर दिया और उन्होंने साफ शब्दों में यह बात बता दी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर अमेरिका ने ईरान पर कार्रवाई नहीं की होती तो इज़राइल का वजूद ही नहीं होता।

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