
जापान ने ब्याज दर 1% तक बढ़ाई, 31 साल का उच्चतम स्तर; ईरान युद्ध और महंगाई पर केंद्रीय बैंक की सख्ती
बैंक ऑफ जापान ने मंगलवार को नीतिगत दर 0.75% से बढ़ाकर 1% कर दी, जो सितंबर 1995 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है, और संकेत दिया कि महंगाई के जोखिमों को देखते हुए दरों में और वृद्धि होगी।
बैंक ऑफ जापान (बीओजे) ने मंगलवार को अपनी अल्पकालिक नीतिगत दर को 0.75 प्रतिशत से बढ़ाकर 1 प्रतिशत कर दिया, जो सितंबर 1995 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। यह निर्णय सात-एक मतों से लिया गया, जिसमें एकमात्र विरोधी मत गवर्नर काज़ुओ उएदा की नियुक्ति वाले बोर्ड सदस्य तोइचिरो असादा का था। उएदा स्वयं लीवर सिस्ट संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती हैं और मतदान में शामिल नहीं हुए, लेकिन उनके डिप्टी शिनिची उचिदा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में आगे की रणनीति स्पष्ट की। यह कदम दिसंबर 2025 के बाद पहली दर वृद्धि है और जापान के दशकों पुराने अपस्फीति विरोधी अति-ढीली मौद्रिक नीति से बाहर निकलने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण प्रस्थान है।
इस वृद्धि के पीछे ईरान युद्ध से उपजा ऊर्जा संकट प्रमुख कारण है। जापान अपनी लगभग सारी तेल और गैस आयात करता है, और हाल के महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल ने आयातित महंगाई को बढ़ावा दिया है। हालाँकि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की रूपरेखा तय होने और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजरानी फिर शुरू होने की खबरों से तेल कीमतों में कुछ नरमी आई है, लेकिन बीओजे के अधिकारियों का मानना है कि मध्यम और दीर्घकालिक महंगाई अनुमान लगातार ऊपर जा रहे हैं, जिससे मूल मुद्रास्फीति के 2 प्रतिशत लक्ष्य से ऊपर निकलने का जोखिम बना हुआ है। कमजोर येन ने भी आयात लागत को और बढ़ाया है। साथ ही, केंद्रीय बैंक ने अगले अप्रैल से सरकारी बॉन्ड खरीद की गति धीमी करने की योजना की घोषणा की, जो मौद्रिक सख्ती के व्यापक रुख को दर्शाता है।
वैश्विक परिदृश्य में यह फैसला यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी) और इंडोनेशिया के केंद्रीय बैंक द्वारा हाल में दरें बढ़ाने के बाद आया है, और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की इस सप्ताह होने वाली बैठक से पहले आया है। जापान का यह कदम दर्शाता है कि विकसित अर्थव्यवस्थाएँ महंगाई से निपटने के लिए एक साथ सख्ती की ओर बढ़ रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि दर वृद्धि के बावजूद निक्केई 225 सूचकांक पहली बार 70,000 अंक के पार पहुँच गया, जो निवेशकों के इस विश्वास को दिखाता है कि जापानी अर्थव्यवस्था अंततः सामान्यीकरण की ओर बढ़ रही है। हालाँकि, 1 प्रतिशत की दर अब भी ईसीबी के 2.25-2.65 प्रतिशत के दायरे से काफी कम है, लेकिन दिशा स्पष्ट है।
डिप्टी गवर्नर उचिदा ने कहा कि कच्चे माल के वैकल्पिक स्रोतों से आपूर्ति सुनिश्चित होने से अर्थव्यवस्था में भारी मंदी का जोखिम घटा है, लेकिन अंतर्निहित मुद्रास्फीति के 2 प्रतिशत लक्ष्य से ऊपर जाने का खतरा बरकरार है। उन्होंने संकेत दिया कि आर्थिक और कीमत स्थितियों के अनुरूप बीओजे दरें बढ़ाना जारी रखेगा। इससे येन में मजबूती आ सकती है, जो वैश्विक कैरी ट्रेड को प्रभावित करेगी। भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए, जहाँ सस्ती येन फंडिंग का उपयोग होता रहा है, यह बदलाव पूंजी प्रवाह में उतार-चढ़ाव ला सकता है। हालाँकि भारत की मजबूत घरेलू बुनियाद और ऊँची विकास दर इस झटके को सहने में सक्षम हो सकती है, लेकिन वैश्विक तरलता में कमी के संकेत रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के लिए भी नीतिगत सोच को प्रभावित कर सकते हैं।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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जापान के केंद्रीय बैंक ने 31 साल में पहली बार ब्याज दर 1% तक बढ़ाई, प्रधानमंत्री ताकाइची की इच्छा के विरुद्ध और अमेरिकी दबाव में। इस कदम का उद्देश्य ऊर्जा व्यवधानों और गिरती मुद्रा से उपजी महंगाई से निपटना है, लेकिन इससे राजनीतिक दरारें और टोक्यो की मौद्रिक नीति पर बाहरी प्रभाव उजागर होता है।
जापान ने ब्याज दर 1% तक बढ़ाई, जो 31 साल में सबसे ऊंची है, इसके पीछे ईरान और लेबनान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध से उपजी तेल की बढ़ती कीमतें हैं। यह कदम मध्य पूर्व में ऊर्जा आपूर्ति बाधाओं से वैश्विक महंगाई के झटके को दर्शाता है, जबकि वाशिंगटन और तेहरान के बीच शांति समझौते की घोषणा भी हुई।
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