
सोमालीलैंड का पहला दूतावास यरुशलम में: इज़राइली सैन्य प्रशिक्षण पर विवाद, बेस की अफवाहों का खंडन
सोमालीलैंड के रक्षा मंत्री ने इज़राइली सैन्य अड्डे की अफवाहों का खंडन किया, लेकिन सुरक्षा प्रशिक्षण की पुष्टि की; हॉर्न ऑफ अफ्रीका में इज़राइल की कूटनीतिक पहुंच और सोमालिया की संप्रभुता पर नए सवाल।
सोमालीलैंड ने सोमवार को पश्चिमी यरुशलम में अपना पहला दूतावास खोला, जो इस अलगाववादी क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक कूटनीतिक कदम है। यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ जब राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही इज़राइल की अपनी पहली आधिकारिक यात्रा पर थे, जहाँ उन्होंने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और राष्ट्रपति इसाक हर्त्सोग से मुलाकात की। इसी दौरान, तेल अवीव में एक व्यापार सम्मेलन के मौके पर सोमालीलैंड के रक्षा मंत्री मोहम्मद यूसुफ अली ने स्पष्ट किया कि उनके देश में कोई इज़राइली सैन्य अड्डा नहीं है और न ही ऐसी कोई बातचीत चल रही है, लेकिन उन्होंने पुष्टि की कि इज़राइल सोमालीलैंड की सेना और पुलिस को प्रशिक्षण दे रहा है। यह बयान उन अटकलों पर विराम लगाने का प्रयास था जो हाल के महीनों में हॉर्न ऑफ अफ्रीका में इज़राइल की सैन्य उपस्थिति को लेकर फैली थीं।
सोमालीलैंड ने 1991 में सोमालिया से अलग होकर एकतरफा स्वतंत्रता की घोषणा की थी, जब सोमालिया गृहयुद्ध में डूब गया था। तब से इस क्षेत्र ने प्रभावी स्वायत्तता, सापेक्ष शांति और स्थिरता बनाए रखी है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इसे कभी मान्यता नहीं दी। पिछले दिसंबर में इज़राइल ऐसा करने वाला पहला देश बना, जिसे सोमालिया ने अपनी संप्रभुता पर "जानबूझकर किया गया हमला" करार दिया। चीन, तुर्की, सऊदी अरब और अरब लीग समेत दर्जनों देशों ने इस मान्यता को खारिज किया है। यरुशलम में दूतावास खोलने का निर्णय और भी संवेदनशील है, क्योंकि यह शहर इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद का केंद्र है और अधिकांश देश अपने मिशन तेल अवीव में रखते हैं।
रणनीतिक रूप से बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य और लाल सागर के निकट स्थित सोमालीलैंड, इज़राइल के लिए सुरक्षा और आर्थिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। इज़राइल कृषि, प्रौद्योगिकी और जल प्रबंधन में निवेश के अवसर तलाश रहा है, जबकि सोमालीलैंड को अपनी अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी साझेदारों की सख्त जरूरत है। हालाँकि, सैन्य प्रशिक्षण की पुष्टि ने अरब जगत और तुर्की में चिंता बढ़ा दी है, जो पहले से ही सोमालिया में सक्रिय हैं—तुर्की का मोगादिशू में एक बड़ा सैन्य अड्डा है और सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात भी सोमाली सरकार के साथ घनिष्ठ संबंध रखते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यद्यपि अभी कोई इज़राइली बेस नहीं है, प्रशिक्षण सहयोग गहराने से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है और सोमालिया में पहले से मौजूद अस्थिरता को और हवा मिल सकती है।
भारत के लिए यह घटनाक्रम कई स्तरों पर प्रासंगिक है। नई दिल्ली परंपरागत रूप से सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन करती रही है और अलगाववादी आंदोलनों को मान्यता देने से बचती है, जो कश्मीर जैसे मुद्दों पर उसकी अपनी नीति से मेल खाता है। भारत के इज़राइल के साथ मजबूत संबंध हैं, लेकिन वह अरब देशों और अफ्रीकी संघ के साथ भी गहरे जुड़ाव रखता है। हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा और जलदस्यु रोधी अभियानों में भारत की सक्रिय भूमिका को देखते हुए, हॉर्न ऑफ अफ्रीका में किसी भी नई सैन्य गतिशीलता पर उसकी निगाह रहेगी। आगे की राह में, सोमालीलैंड को व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने की संभावना कम है, लेकिन इज़राइल का कूटनीतिक समर्थन उसे एक नया मंच प्रदान कर सकता है—साथ ही यह सोमालिया और उसके समर्थकों के लिए एक रणनीतिक चुनौती भी बन सकता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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Somaliland's defense minister confirmed that Israel is training its military and police forces, but dismissed reports of an Israeli base as rumors. The first official visit and embassy opening in Jerusalem underscore deepening ties, with no plans for a permanent military presence.
Somaliland's defense minister said Israel is providing training to its security forces but denied any negotiations for a military base. The breakaway territory is seeking Israeli investment in agriculture and other sectors during the president's first official visit after Israel's recognition.
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