
विश्व कप के विस्तार पर यूएफा प्रमुख की टिप्पणी से आहत 13 देशों ने जारी किया संयुक्त बयान
अफ्रीका, कैरिबियाई और एशियाई फुटबॉल संघों ने यूएफा अध्यक्ष के उस बयान को दृढ़ता से खारिज किया जिसमें 48 टीमों वाले विश्व कप के कई मैचों को 'अरुचिकर' बताया गया था।
फीफा विश्व कप 2026 के पहली बार 48 देशों में विस्तार को लेकर यूरोपीय फुटबॉल संघ (यूएफा) के अध्यक्ष अलेक्सांदर चेफेरिन की एक टिप्पणी ने वैश्विक फुटबॉल जगत में तीखी प्रतिक्रिया भड़का दी है। रविवार को 13 राष्ट्रीय फुटबॉल संघों—जिनमें मोरक्को, सेनेगल, मिस्र, घाना, कोट दिव्वार, दक्षिण अफ्रीका, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, काबो वर्दे, कुरासाओ, उज्बेकिस्तान, हैती और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य शामिल हैं—ने एक संयुक्त विज्ञप्ति जारी कर चेफेरिन के उस बयान की कड़ी निंदा की, जिसमें उन्होंने विस्तारित प्रारूप को 'पूरी तरह से अरुचिकर मैचों की भारी संख्या' वाला बताया था। दक्षिण अफ्रीकी फुटबॉल संघ के समन्वय में जारी इस बयान ने तुरंत ही वैश्विक मीडिया का ध्यान खींचा और यह स्पष्ट कर दिया कि उभरते फुटबॉल राष्ट्र अब अपनी उपलब्धियों को कमतर आंके जाने पर चुप नहीं बैठेंगे।
विज्ञप्ति में इन संघों ने 'गहरी निराशा' और 'सम्मानपूर्वक लेकिन दृढ़ अस्वीकृति' व्यक्त करते हुए कहा कि हमारे देशों के लिए विश्व कप का कोई भी मैच महत्वहीन नहीं होता। काबो वर्दे, कुरासाओ और उज्बेकिस्तान जैसे पहली बार क्वालीफाई करने वाले देशों के लिए यह ऐतिहासिक उपलब्धि और पीढ़ियों के सपने का साकार होना है, जबकि कांगो और हैती जैसे देश लंबे अंतराल के बाद इस वैश्विक मंच पर लौट रहे हैं। बयान में इस बात पर जोर दिया गया कि चेफेरिन की टिप्पणी खिलाड़ियों, कोचों, क्लबों और दुनिया भर के प्रशंसकों के बलिदानों, आकांक्षाओं और प्रयासों को नजरअंदाज करती है। यह पहली बार है जब इतने विविध भौगोलिक क्षेत्रों—अफ्रीका, कैरिबियाई, मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका—के संघों ने एक साथ मिलकर यूरोपीय फुटबॉल प्रतिष्ठान को सीधी चुनौती दी है।
यह विवाद ऐसे समय में उठा है जब संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको में होने वाला यह पहला 48-टीम विश्व कप फुटबॉल के लोकतंत्रीकरण का प्रतीक बन रहा है। चेफेरिन की टिप्पणी मूल रूप से स्लोवेनियाई अखबार डेलो में प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने विस्तार को 'गलती' करार दिया था। यूएफा प्रमुख का यह रुख यूरोपीय फुटबॉल के उस पारंपरिक नजरिए को दर्शाता है जो प्रतिस्पर्धा के अभिजात्यवादी ढांचे को बनाए रखना चाहता है, जबकि अफ्रीकी और एशियाई संघ लंबे समय से अधिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं। दक्षिण एशिया के संदर्भ में देखें तो भारत जैसे देशों के लिए यह बहस बेहद प्रासंगिक है, क्योंकि विस्तारित प्रारूप ही भविष्य में उन्हें विश्व कप के दरवाजे तक पहुंचा सकता है।
इस सामूहिक प्रतिक्रिया ने वैश्विक फुटबॉल शासन में एक नई शक्ति संतुलन की ओर इशारा किया है। अब तक यूरोपीय संघ की आवाज ही निर्णायक मानी जाती थी, लेकिन 13 संघों के इस संयुक्त मोर्चे ने दिखा दिया कि गैर-यूरोपीय देश भी अपनी उपलब्धियों की गरिमा के लिए संगठित हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में फीफा के भीतर महाद्वीपीय संघों के बीच इस तरह के तनाव और बढ़ने की संभावना है, खासकर जब 2026 विश्व कप के दौरान छोटे राष्ट्रों का प्रदर्शन दर्शकों और प्रायोजकों का ध्यान खींचेगा। यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि फुटबॉल अब केवल यूरोप और दक्षिण अमेरिका की परंपरागत शक्तियों का खेल नहीं रहा—यह सचमुच एक वैश्विक खेल बन चुका है, जहां हर भागीदार की कहानी मायने रखती है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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यूईएफए अध्यक्ष की विस्तारित विश्व कप प्रारूप पर आलोचना ने छोटे फुटबॉल देशों की प्रतिक्रिया को भड़का दिया है, जो अब पलटवार कर रहे हैं। यूरोपीय दृष्टिकोण से, विस्तार को संदेह से देखा जाता है और इस विरोध को 'विश्व कप के बौने' देशों की अति-प्रतिक्रिया माना जा रहा है, जिनके मैच कम आकर्षक समझे जाते हैं।
अफ्रीका, कैरिबियन और एशिया की फुटबॉल महासंघों ने यूईएफए अध्यक्ष को कड़ी फटकार लगाई है कि उन्होंने विश्व कप के कई मैचों को 'अरुचिकर' बताया। वे जोर देते हैं कि उनके देशों के लिए हर विश्व कप मुकाबला एक ऐतिहासिक उपलब्धि है और कोई भी खेल महत्वहीन नहीं है। यह संयुक्त बयान यूरोपीय कृपालुता का एक गरिमामय लेकिन दृढ़ अस्वीकार है।
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