
ब्रासीलिया से नई दिल्ली तक: इंद्रधनुषी परचम और अस्मिता की जंग
ब्राज़ील की राजधानी में झंडा दिखाने पर हुई कार्रवाई से लेकर भारत में ट्रांसजेंडर विधेयक पर उठे सवाल तक—दुनिया भर में अस्मिता की लड़ाई एक डोर से बंधी है।
ब्रासीलिया में कांग्रेस के सामने घास के मैदान पर एक बड़ा इंद्रधनुषी झंडा फहराया गया—पचास मीटर लंबा, रंग-बिरंगी धारियों वाला। 28 जून, अंतरराष्ट्रीय गर्व दिवस की सुबह, क़रीब बीस कार्यकर्ता चुपचाप अपनी पहचान का प्रतीक फैला रहे थे। अचानक पुलिस की गाड़ियाँ आईं। कार्यकर्ताओं के अनुसार पुलिस ने बिना औचित्य बताए कार्रवाई की, जबकि समूह ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन की पूर्व-सूचना दी थी। मिशेल प्लातिनी ने बताया कि उनके साथी घुटनों पर बैठ गए और हाथ खड़े कर दिखाया कि वे निहत्थे हैं। यह दृश्य एक साथ प्रतिरोध और भेद्यता का प्रतीक बन गया—इंद्रधनुष के रंग और सत्ता की वर्दी आमने-सामने।
यह तारीख़ 1969 में न्यूयॉर्क के स्टोनवॉल इन बार में हुई उस रात को याद करती है जब समलैंगिक समुदाय ने पहली बार पुलिसिया दमन का सामूहिक विरोध किया। तभी से दुनिया भर में गर्व यात्राएँ निकलने लगीं—सेलिब्रेशन भी, जंग का ऐलान भी। कार्यकर्ता गिल्बर्ट बेकर ने 1978 में पहला इंद्रधनुषी झंडा बनाया, जिसकी छः रंगीन पट्टियाँ जीवन, स्वास्थ्य, धूप, प्रकृति, शांति और आत्मा का प्रतिनिधित्व करती हैं। अर्जेंटीना में यह दिन नवंबर में मनाया जाता है, क्योंकि 1967 में ‘नूएस्त्रो मुंदो’ नामक लैटिन अमेरिका का पहला समलैंगिक संगठन बना था। ब्राज़ील में गर्व यात्राएँ सड़कों पर संगीत और नारों के साथ निकलती हैं, लेकिन वहाँ भी समानता के लिए अब भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता है—संसद में क़ानून कम ही बन पाए हैं।
भारत में इस साल का गर्व दिवस एक नए विवाद के बीच आया है। मार्च 2026 में संसद से पारित ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक’ ने परिभाषा को सीमित कर दिया है। इसमें केवल किन्नर, हिजड़ा, अरवानी, जोगता आदि सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों को ही ट्रांसजेंडर माना गया है और ‘स्व-अनुभूत लिंग पहचान’ का अधिकार हटा दिया गया। साथ ही, इंटरसेक्स व्यक्तियों को भी इसी श्रेणी में डाला गया है—जबकि चिकित्सकीय और मानवाधिकार संगठन दोनों को अलग रखने की सलाह देते हैं। विधेयक में ज़िला मजिस्ट्रेट की सरल प्रक्रिया को एक मुख्य चिकित्सा अधिकारी की अध्यक्षता वाले बोर्ड से बदल दिया गया है, जिससे प्रक्रिया जटिल और चिकित्सीय नियंत्रण वाली हो गई है। आलोचकों का कहना है कि इससे इंटरसेक्स शिशुओं पर ग़ैर-ज़रूरी सर्जरी रोकने का मौक़ा खो गया और ट्रांसजेंडर समुदाय को नौकरशाही पिंजरे में डाल दिया गया। ब्राज़ील की तरह भारत में भी विधायिका के बजाय न्यायपालिका ने बड़े अधिकार दिए हैं—जैसे समलैंगिक विवाह और एलजीबीटी समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा को अपराध घोषित करना। लेकिन अब यह विधेयक उस दिशा में उलटा क़दम माना जा रहा है।
इन क़ानूनी संघर्षों के बीच सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ समुदाय को जोड़ती हैं। ब्राज़ील में ‘पाजुबा’ नामक गुप्त भाषा कभी ट्रांसजेंडर महिलाओं ने सड़कों पर आत्मरक्षा के लिए विकसित की थी; आज यह गीतों और सोशल मीडिया पर आम है। पाब्लो विटार जैसे ड्रैग आर्टिस्ट और लिंकर जैसी ट्रांस गायिका ने लैटिन ग्रैमी जीते हैं। भारत में भी संगीत और सिनेमा ने कई आइकन दिए हैं—रेडियो पर बजते क्लासिक से लेकर स्वतंत्र कलाकारों तक। हालाँकि, यह ख़ुशी मानसिक स्वास्थ्य की कीमत पर नहीं आती। विशेषज्ञ बताते हैं कि सामाजिक भेदभाव और पारिवारिक अस्वीकृति के कारण इस समुदाय में अवसाद और चिंता अधिक है। ब्राज़ील में इस साल के पहले तीन महीनों में ही 50 एलजीबीटीक्यूआईए+ लोगों की हिंसक मौतें दर्ज हुईं; भारत में इंटरसेक्स शिशुओं की हत्याएँ और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के प्रति हिंसा लगातार हो रही है।
ब्रासीलिया के उस घास के मैदान पर घुटनों पर बैठे कार्यकर्ताओं ने पुलिस को बताया कि उनका झंडा “हिंसाओं के जवाब में हमारा गर्व” है। यह वाक्य सार्वभौमिक है। चाहे न्यूयॉर्क की गलियाँ हों या नई दिल्ली की सड़कें, इंद्रधनुषी रंग एक साथ जश्न और विद्रोह का इज़हार करते हैं। और जब भी कोई इसे फहराने की कोशिश करता है—तो उसे याद दिलाया जाता है कि अस्मिता का आग्रह अब भी एक राजनीतिक क्रिया है, जिसे हर 28 जून को गर्व के साथ दोहराना लाज़िमी है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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News from the Latin American bloc tells of a pride that is suppressed, with police preventing the display of the rainbow flag at the Brazilian Congress. However, celebratory articles also prevail, highlighting the community's resilience, iconic LGBTQ+ artists, and brand support. The overall tone is denunciation for the act of censorship, but also vindication and celebration of achievements and visibility.
The Sub-Saharan African bloc offers a different perspective, focusing on the hidden reality of intersex people, with calls for greater transparency and informed consent. There is no direct reference to the flag episode, but it fits into the broader framework of LGBTQ+ rights. The approach is analytical, focused on health and legal issues, with a neutral tone.
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