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ओबामा ने ट्रंप के संभावित ईरान समझौते पर उठाए सवाल, कहा- 2015 की डील से बेहतर नहीं होगा कोई नया करार

पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने माना कि कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है और युद्ध से आम नागरिकों की पीड़ा रोकने की अपील की।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने उत्तराधिकारी डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच संभावित परमाणु समझौते पर गहरा संदेह जताया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी नया करार 2015 की ऐतिहासिक संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) से बुनियादी तौर पर भिन्न या बेहतर होने की संभावना नहीं है। एबीसी न्यूज़ को दिए एक साक्षात्कार में ओबामा ने कहा, 'यह संदेहास्पद है कि जो भी समझौता अब होगा, वह उस मूल करार से भिन्न या उससे अधिक सशक्त होगा जिस पर हमने वर्षों मेहनत की थी, लेकिन अमेरिका ने उससे किनारा कर लिया।' उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ नई वार्ता की संभावनाएं तलाश रहा है।

2015 का परमाणु समझौता एक बहुपक्षीय कूटनीतिक उपलब्धि थी, जिसमें ईरान ने अपने यूरेनियम संवर्धन को सीमित करने और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के निरीक्षकों को अपनी साइटों तक पहुंच देने का वादा किया था। इसके बदले तेल निर्यात पर लगे कई प्रतिबंध हटाए गए और अरबों डॉलर की जब्त संपत्तियां अनफ्रीज की गईं थीं। हालांकि, ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को इस समझौते से बाहर कर लिया और ईरान पर 'अधिकतम दबाव' की नीति अपनाई। अब एक बार फिर वार्ता की चर्चा है, लेकिन ओबामा ने आगाह किया कि केवल दबाव या सैन्य बल के ज़रिये समाधान थोपना आकर्षक तो लग सकता है, पर इससे दीर्घकालिक शांति नहीं आएगी। उन्होंने कहा कि 'एक ऐसा समझौता जो 80-90 फ़ीसदी समस्याएं सुलझा दे, वह युद्ध से बेहतर है।'

विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों से इस बयान पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। ईरानी मीडिया ने ओबामा के कूटनीति पर जोर को प्रमुखता से उठाया और उम्मीद जताई कि बमबारी रुकेगी और आम लोग युद्ध की विभीषिका से बचेंगे। अरब मीडिया में ओबामा के संदेह को रेखांकित करते हुए यह सवाल उठाया गया कि क्या ट्रंप वास्तव में 2015 से बेहतर डील ला सकते हैं। इज़राइल के एक पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने तो यहां तक चेतावनी दी है कि ट्रंप का समझौता ओबामा के करार से भी खराब हो सकता है, खासकर यदि उसमें गुप्त पार्श्व समझौते या अनदेखे प्रावधान शामिल हों। यह बहस केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर व्यापक चिंताओं से जुड़ी है।

दक्षिण एशिया और खासतौर पर भारत के लिए इस वार्ता के दूरगामी निहितार्थ हैं। ईरान भारत के लिए एक प्रमुख ऊर्जा साझेदार रहा है और किसी भी नए प्रतिबंध या सैन्य तनाव से तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है। साथ ही, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया में स्थिरता के लिए भी ईरान की भूमिका अहम है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि ट्रंप वास्तव में कोई समझौता करते हैं, तो उसके अंतरराष्ट्रीय समर्थन और पारदर्शिता पर संदेह बना रहेगा। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या नया करार केवल एक अस्थायी राहत होगा या लंबे समय से चले आ रहे तनाव का टिकाऊ समाधान। ओबामा का संदेश एक चेतावनी भी है कि अगर इतिहास से सबक नहीं लिया गया तो कूटनीति के नाम पर महज़ प्रतीकात्मक जीत हासिल हो सकती है, जबकि असली शांति दूर रह जाएगी।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

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56%
लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa iraniana e affiniStampa israeliana
Stampa iraniana e affini/ regime
scetticismovittimismopragmatismo

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति मानते हैं कि तेहरान के साथ कोई भी नया समझौता 2015 के परमाणु समझौते से बेहतर होने की संभावना नहीं है, जिसे उनके देश ने बाद में छोड़ दिया। ईरानी रिपोर्टें इस बात पर जोर देती हैं कि आंशिक समाधान भी सैन्य संघर्ष से बेहतर है, जो मूल समझौते का व्यावहारिक बचाव दर्शाता है।

Stampa israeliana/ sicurezza
allarmescetticismoindignazione

इज़राइली सुरक्षा टिप्पणीकार चेतावनी देते हैं कि ईरान के साथ ट्रम्प का उभरता समझौता 2015 के समझौते से भी अधिक खतरनाक हो सकता है, जो संभावित रूप से इज़राइल की कार्रवाई की स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है। उनका तर्क है कि एक मात्र ज्ञापन को एक आपदा के रूप में देखा जा सकता है जो तेहरान की सच्ची परमाणु महत्वाकांक्षाओं को संबोधित नहीं करता।

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ओबामा ने ट्रंप के संभावित ईरान समझौते पर उठाए सवाल, कहा- 2015 की डील से बेहतर नहीं होगा कोई नया करार

पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने माना कि कूटनीति ही एकमात्र रास्ता है और युद्ध से आम नागरिकों की पीड़ा रोकने की अपील की।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने उत्तराधिकारी डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच संभावित परमाणु समझौते पर गहरा संदेह जताया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी नया करार 2015 की ऐतिहासिक संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) से बुनियादी तौर पर भिन्न या बेहतर होने की संभावना नहीं है। एबीसी न्यूज़ को दिए एक साक्षात्कार में ओबामा ने कहा, 'यह संदेहास्पद है कि जो भी समझौता अब होगा, वह उस मूल करार से भिन्न या उससे अधिक सशक्त होगा जिस पर हमने वर्षों मेहनत की थी, लेकिन अमेरिका ने उससे किनारा कर लिया।' उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ नई वार्ता की संभावनाएं तलाश रहा है।

2015 का परमाणु समझौता एक बहुपक्षीय कूटनीतिक उपलब्धि थी, जिसमें ईरान ने अपने यूरेनियम संवर्धन को सीमित करने और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के निरीक्षकों को अपनी साइटों तक पहुंच देने का वादा किया था। इसके बदले तेल निर्यात पर लगे कई प्रतिबंध हटाए गए और अरबों डॉलर की जब्त संपत्तियां अनफ्रीज की गईं थीं। हालांकि, ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को इस समझौते से बाहर कर लिया और ईरान पर 'अधिकतम दबाव' की नीति अपनाई। अब एक बार फिर वार्ता की चर्चा है, लेकिन ओबामा ने आगाह किया कि केवल दबाव या सैन्य बल के ज़रिये समाधान थोपना आकर्षक तो लग सकता है, पर इससे दीर्घकालिक शांति नहीं आएगी। उन्होंने कहा कि 'एक ऐसा समझौता जो 80-90 फ़ीसदी समस्याएं सुलझा दे, वह युद्ध से बेहतर है।'

विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों से इस बयान पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। ईरानी मीडिया ने ओबामा के कूटनीति पर जोर को प्रमुखता से उठाया और उम्मीद जताई कि बमबारी रुकेगी और आम लोग युद्ध की विभीषिका से बचेंगे। अरब मीडिया में ओबामा के संदेह को रेखांकित करते हुए यह सवाल उठाया गया कि क्या ट्रंप वास्तव में 2015 से बेहतर डील ला सकते हैं। इज़राइल के एक पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने तो यहां तक चेतावनी दी है कि ट्रंप का समझौता ओबामा के करार से भी खराब हो सकता है, खासकर यदि उसमें गुप्त पार्श्व समझौते या अनदेखे प्रावधान शामिल हों। यह बहस केवल परमाणु मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर व्यापक चिंताओं से जुड़ी है।

दक्षिण एशिया और खासतौर पर भारत के लिए इस वार्ता के दूरगामी निहितार्थ हैं। ईरान भारत के लिए एक प्रमुख ऊर्जा साझेदार रहा है और किसी भी नए प्रतिबंध या सैन्य तनाव से तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है। साथ ही, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया में स्थिरता के लिए भी ईरान की भूमिका अहम है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि ट्रंप वास्तव में कोई समझौता करते हैं, तो उसके अंतरराष्ट्रीय समर्थन और पारदर्शिता पर संदेह बना रहेगा। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या नया करार केवल एक अस्थायी राहत होगा या लंबे समय से चले आ रहे तनाव का टिकाऊ समाधान। ओबामा का संदेश एक चेतावनी भी है कि अगर इतिहास से सबक नहीं लिया गया तो कूटनीति के नाम पर महज़ प्रतीकात्मक जीत हासिल हो सकती है, जबकि असली शांति दूर रह जाएगी।

स्रोतों में मतभेद

— · 3 स्रोत · 3 भाषाएँ

56%उच्च

स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

समर्थक60%
न्यूनत्र20%
निंदक20%

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 3 भाषाएँ

लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa iraniana e affiniStampa israeliana
Stampa iraniana e affini/ regime
scetticismovittimismopragmatismo

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति मानते हैं कि तेहरान के साथ कोई भी नया समझौता 2015 के परमाणु समझौते से बेहतर होने की संभावना नहीं है, जिसे उनके देश ने बाद में छोड़ दिया। ईरानी रिपोर्टें इस बात पर जोर देती हैं कि आंशिक समाधान भी सैन्य संघर्ष से बेहतर है, जो मूल समझौते का व्यावहारिक बचाव दर्शाता है।

Stampa israeliana/ sicurezza
allarmescetticismoindignazione

इज़राइली सुरक्षा टिप्पणीकार चेतावनी देते हैं कि ईरान के साथ ट्रम्प का उभरता समझौता 2015 के समझौते से भी अधिक खतरनाक हो सकता है, जो संभावित रूप से इज़राइल की कार्रवाई की स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है। उनका तर्क है कि एक मात्र ज्ञापन को एक आपदा के रूप में देखा जा सकता है जो तेहरान की सच्ची परमाणु महत्वाकांक्षाओं को संबोधित नहीं करता।

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