
लेबनान में 6.4 लाख विस्थापित लौटे, लेकिन सीमावर्ती इलाकों में संकट बरकरार
अमेरिका-ईरान समझौते के बाद लागू संघर्षविराम से बड़ी संख्या में लोग घर लौटे, पर इज़रायली सुरक्षा क्षेत्र और हिज़्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण पर अनिश्चितता बनी हुई है।
अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (आईओएम) के अनुसार, लेबनान में 6,46,107 आंतरिक विस्थापित अपने घरों को लौट चुके हैं, जबकि लगभग पाँच लाख लोग अब भी विस्थापित हैं। यह वापसी पिछले महीने अमेरिका और ईरान के बीच मध्य पूर्व में युद्ध समाप्त करने के लिए हुए समझौते के बाद 21 जून से लागू संघर्षविराम के मद्देनज़र हुई है। इससे पहले, फरवरी के अंत में ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई की हत्या के प्रतिशोध में हिज़्बुल्लाह द्वारा इज़रायल पर रॉकेट दागे जाने के बाद शुरू हुए संघर्ष में 4,300 से अधिक लोग मारे गए थे और दस लाख से अधिक विस्थापित हुए थे।
लेबनानी राष्ट्रपति जोसेफ औन ने स्पष्ट किया है कि पिछले सप्ताह अमेरिकी मध्यस्थता में इज़रायल के साथ हस्ताक्षरित रूपरेखा समझौता इज़रायली कब्ज़े को वैधता नहीं देता, बल्कि लेबनानी सेना को समूचे क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि ईरानी-अमेरिकी रास्ते से लेबनान का रास्ता अलग करने का संप्रभु निर्णय उन लोगों के लिए समस्या है जो संरक्षण के आदी रहे हैं। वहीं, इज़रायली प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, इज़रायली सेनाएँ सीमा से दस किलोमीटर भीतर 'सुरक्षा क्षेत्र' में तब तक बनी रहेंगी जब तक हिज़्बुल्लाह से ख़तरा बना रहता है। हिज़्बुल्लाह ने इस समझौते को अस्वीकार कर दिया है, जिसमें उसके निरस्त्रीकरण का प्रावधान है।
विस्थापितों की वापसी मुख्यतः दक्षिण लेबनान और बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में हुई है, लेकिन सीमा से सटे दर्जनों क़स्बे और गाँव अब भी वीरान हैं। भारी तबाही और इज़रायली सैन्य उपस्थिति के कारण वहाँ लौटना संभव नहीं हो पाया है। लेबनानी प्रवासी नेटवर्क की सदस्य कैरिन कहवागी के अनुसार, खाद्यान्न की कमी और हिज़्बुल्लाह द्वारा संसाधनों की लूट के चलते स्थानीय लोग हथियार उठाने को मजबूर हैं। प्रवासी समुदाय गहरे आघात से गुज़र रहा है और पहली बार सार्वजनिक रूप से हिज़्बुल्लाह के प्रभाव को समाप्त करने की उम्मीद जता रहा है।
यह संघर्ष व्यापक अमेरिका-ईरान युद्ध का हिस्सा बना, जिसमें लेबनान एक प्रमुख मोर्चा बन गया। रूपरेखा समझौते के तहत इज़रायली सेना की चरणबद्ध वापसी, हिज़्बुल्लाह का निरस्त्रीकरण और दो 'पायलट' क्षेत्रों में लेबनानी सेना की तैनाती शामिल है। हालाँकि, विश्लेषकों का मानना है कि लेबनानी राज्य के लिए हिज़्बुल्लाह को निरस्त्र करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण होगा, और समझौते में इज़रायली वापसी की कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है। दक्षिण एशिया के लिए, लेबनान में स्थिरता ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत जैसे देशों के वहाँ बड़ी संख्या में प्रवासी रहते हैं और वे संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में योगदान करते हैं।
फ़िलहाल, संघर्षविराम के बावजूद इज़रायल कभी-कभी हवाई हमले करता रहता है, और रूपरेखा समझौते का कार्यान्वयन प्रारंभिक चरण में है। अगले कदम के रूप में, दो पायलट क्षेत्रों में लेबनानी सेना की तैनाती और हिज़्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया पर नज़र रहेगी। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बात पर ध्यान दे रहा है कि क्या यह समझौता स्थायी शांति की ओर ले जाएगा या फिर हिंसा का एक नया दौर शुरू होगा।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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640,000 से अधिक विस्थापित लेबनानी घर लौट आए हैं, लेकिन नाजुक युद्धविराम के कारण लगभग 500,000 अभी भी अधर में हैं। यह संघर्ष तब शुरू हुआ जब हिजबुल्लाह ने इज़राइल पर रॉकेट दागे, जिससे लेबनान अमेरिका-ईरान युद्ध में घिर गया।
यूनिसेफ ने चेतावनी दी है कि इज़राइली शासन के हमलों में 340 स्कूलों के क्षतिग्रस्त होने के बाद 100,000 लेबनानी बच्चों का स्कूल वर्ष छूटने का खतरा है। शिक्षा संकट युद्ध के मानवीय नुकसान को और गहरा कर रहा है।
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