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यूरोपीय रक्षा सहयोग में गहराती दरार: लड़ाकू विमान से लेकर ड्रोन तक, संयुक्त कार्यक्रम संकट में

फ्रांस और जर्मनी के बीच बढ़ते मतभेदों के चलते FCAS जैसी परियोजनाएं रद्द हो रही हैं, जबकि यूरोप पैट्रियट के विकल्प और रूसी ड्रोन-रोधी तकनीक की नकल की ओर बढ़ रहा है।

यूरोपीय संघ की सामूहिक रक्षा क्षमता निर्माण की राह में फ्रांस और जर्मनी के बीच बढ़ता तनाव एक बड़ी बाधा बनता जा रहा है। बर्लिन एयर शो में मिसाइल निर्माता एमबीडीए के प्रमुख एरिक बेरांजे ने स्वीकार किया कि असफल जर्मन-फ्रांसीसी लड़ाकू विमान परियोजना एफसीएएस अब इतिहास बन चुकी है, और उन्होंने अनिश्चित विश्व व्यवस्था के सामने और अधिक सहयोग की पैरवी की। इसी बीच पेरिस की यूरोसैटरी सैन्य प्रदर्शनी में जर्मनी ने लेपर्ड 2 के उत्तराधिकारी ‘एमबीटी विजन 2032’ की अवधारणा प्रस्तुत की, लेकिन जमीनी लड़ाई के भविष्य को लेकर दोनों देशों की सोच में बुनियादी मतभेद साफ नजर आए। यह विवाद महज तकनीकी नहीं है, बल्कि यूरोप की रणनीतिक स्वायत्तता की चाहत और राष्ट्रीय औद्योगिक हितों के बीच गहरे खिंचाव को दर्शाता है।

इस खिंचाव का एक प्रतीकात्मक उदाहरण फ्रांस का लेक्लर्क XLR टैंक है, जिसमें अब रूसी ‘मंगाल’ जैसी जालीदार संरचना लगाई जा रही है। 2022 में यूक्रेन युद्ध के दौरान रूसी टैंकों पर पहली बार दिखी यह संरचना सोशल मीडिया पर उपहास का पात्र बनी थी, लेकिन ड्रोन हमलों के खिलाफ इसकी प्रभावशीलता ने फ्रांसीसी सेना को इसे अपनाने पर मजबूर कर दिया। केएनडीएस फ्रांस अब इसका सीरियल उत्पादन कर रहा है। यह घटनाक्रम दिखाता है कि यूरोपीय सेनाएं युद्धक्षेत्र की नई वास्तविकताओं से सबक ले रही हैं, लेकिन साझा समाधान विकसित करने के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर पुरानी प्रणालियों में जुगाड़ कर रही हैं।

आसमान में सहयोग की तस्वीर और भी धुंधली है। एफसीएएस के रद्द होने के बाद अब यूरोड्रोन कार्यक्रम पर भी खतरा मंडरा रहा है। अमेरिकी थिंक टैंक द नेशनल इंटरेस्ट के अनुसार, डसॉल्ट और एयरबस के बीच निवेश लागत को लेकर विवाद ने इस महत्वाकांक्षी मध्यम-ऊंचाई वाले लंबी अवधि के ड्रोन को संकट में डाल दिया है। 2017 में अमेरिकी एमक्यू-9 रीपर पर निर्भरता घटाने के लिए शुरू हुई इस परियोजना की पहली उड़ान 2025 से खिसककर 2027 तक पहुंच गई है, और आगे की राह अनिश्चित है।

जमीनी और हवाई कार्यक्रमों की उलझनों के बीच, यूरोप वायु रक्षा में आत्मनिर्भरता की एक किरण तलाश रहा है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी पैट्रियट सिस्टम की सीमित उपलब्धता और ऊंची मांग के चलते यूरोपीय और मध्य-पूर्व के देश अब यूरोसैम कंसोर्टियम के सैम्प/टी एनजी सिस्टम को विकल्प के रूप में देख रहे हैं। कुवैत, हंगरी, स्विट्जरलैंड और एस्टोनिया समेत करीब 15 देशों ने रुचि दिखाई है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इस प्रणाली का तेजी से बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव नहीं है और पहली डिलीवरी 2029 से पहले नहीं होगी। यह समय-सीमा यूरोप की तात्कालिक सुरक्षा जरूरतों के लिहाज से एक गंभीर सीमा है।

कुल मिलाकर, यूरोपीय रक्षा उद्योग एक अजीब दोराहे पर खड़ा है: एक ओर वह अमेरिकी प्रणालियों पर निर्भरता कम करना चाहता है, दूसरी ओर आंतरिक प्रतिद्वंद्विता और राजनीतिक मतभेद संयुक्त परियोजनाओं को बार-बार पटरी से उतार रहे हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह एक सबक है कि बहुराष्ट्रीय रक्षा सहयोग में औद्योगिक आधार साझा करने से पहले रणनीतिक सहमति और समयबद्ध कार्यान्वयन की गारंटी जरूरी है। यूरोप की यह आंतरिक कशमकश वैश्विक हथियार बाजार में रूस और अमेरिका के दबदबे को और मजबूत कर सकती है।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 3 भाषाएँ

44%
लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa russa e CSIStampa europea continentale
Stampa russa e CSI/ stato
scetticismoschadenfreudeironia

यूरोपीय रक्षा सहयोग में गहरी दरारें दिख रही हैं: फ्रांस-जर्मन विवादों के कारण संयुक्त लड़ाकू विमान और ड्रोन कार्यक्रम संकट में हैं। पैट्रियट की कमी का सामना करते हुए, यूरोप SAMP/T NG जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है, जबकि फ्रांस ने लेक्लर्क टैंकों पर रूसी 'पिंजरे' की नकल की है। अमेरिका ने यूरोड्रोन की विफलता की भविष्यवाणी की है, जो यूरोप की स्वतंत्र रूप से कार्य करने में असमर्थता की पुष्टि करता है।

Stampa europea continentale/ dach_plus
pragmatismourgenza

फ्रांस-जर्मन लड़ाकू विमान की विफलता और भविष्य के टैंक पर मतभेदों के बावजूद, यूरोपीय उद्योग जगत के नेता इस बात पर जोर देते हैं कि संप्रभुता केवल संयुक्त परियोजनाओं के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है। एमबीडीए प्रमुख ने अनिश्चित दुनिया का जवाब देने के लिए अधिक सहयोग का आह्वान किया, जबकि एमजीसीएस विवाद अलग-अलग अवधारणाओं को दर्शाता है लेकिन फिर भी एक सहयोगी ढांचे के भीतर है।

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यूरोपीय रक्षा सहयोग में गहराती दरार: लड़ाकू विमान से लेकर ड्रोन तक, संयुक्त कार्यक्रम संकट में

फ्रांस और जर्मनी के बीच बढ़ते मतभेदों के चलते FCAS जैसी परियोजनाएं रद्द हो रही हैं, जबकि यूरोप पैट्रियट के विकल्प और रूसी ड्रोन-रोधी तकनीक की नकल की ओर बढ़ रहा है।

यूरोपीय संघ की सामूहिक रक्षा क्षमता निर्माण की राह में फ्रांस और जर्मनी के बीच बढ़ता तनाव एक बड़ी बाधा बनता जा रहा है। बर्लिन एयर शो में मिसाइल निर्माता एमबीडीए के प्रमुख एरिक बेरांजे ने स्वीकार किया कि असफल जर्मन-फ्रांसीसी लड़ाकू विमान परियोजना एफसीएएस अब इतिहास बन चुकी है, और उन्होंने अनिश्चित विश्व व्यवस्था के सामने और अधिक सहयोग की पैरवी की। इसी बीच पेरिस की यूरोसैटरी सैन्य प्रदर्शनी में जर्मनी ने लेपर्ड 2 के उत्तराधिकारी ‘एमबीटी विजन 2032’ की अवधारणा प्रस्तुत की, लेकिन जमीनी लड़ाई के भविष्य को लेकर दोनों देशों की सोच में बुनियादी मतभेद साफ नजर आए। यह विवाद महज तकनीकी नहीं है, बल्कि यूरोप की रणनीतिक स्वायत्तता की चाहत और राष्ट्रीय औद्योगिक हितों के बीच गहरे खिंचाव को दर्शाता है।

इस खिंचाव का एक प्रतीकात्मक उदाहरण फ्रांस का लेक्लर्क XLR टैंक है, जिसमें अब रूसी ‘मंगाल’ जैसी जालीदार संरचना लगाई जा रही है। 2022 में यूक्रेन युद्ध के दौरान रूसी टैंकों पर पहली बार दिखी यह संरचना सोशल मीडिया पर उपहास का पात्र बनी थी, लेकिन ड्रोन हमलों के खिलाफ इसकी प्रभावशीलता ने फ्रांसीसी सेना को इसे अपनाने पर मजबूर कर दिया। केएनडीएस फ्रांस अब इसका सीरियल उत्पादन कर रहा है। यह घटनाक्रम दिखाता है कि यूरोपीय सेनाएं युद्धक्षेत्र की नई वास्तविकताओं से सबक ले रही हैं, लेकिन साझा समाधान विकसित करने के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर पुरानी प्रणालियों में जुगाड़ कर रही हैं।

आसमान में सहयोग की तस्वीर और भी धुंधली है। एफसीएएस के रद्द होने के बाद अब यूरोड्रोन कार्यक्रम पर भी खतरा मंडरा रहा है। अमेरिकी थिंक टैंक द नेशनल इंटरेस्ट के अनुसार, डसॉल्ट और एयरबस के बीच निवेश लागत को लेकर विवाद ने इस महत्वाकांक्षी मध्यम-ऊंचाई वाले लंबी अवधि के ड्रोन को संकट में डाल दिया है। 2017 में अमेरिकी एमक्यू-9 रीपर पर निर्भरता घटाने के लिए शुरू हुई इस परियोजना की पहली उड़ान 2025 से खिसककर 2027 तक पहुंच गई है, और आगे की राह अनिश्चित है।

जमीनी और हवाई कार्यक्रमों की उलझनों के बीच, यूरोप वायु रक्षा में आत्मनिर्भरता की एक किरण तलाश रहा है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी पैट्रियट सिस्टम की सीमित उपलब्धता और ऊंची मांग के चलते यूरोपीय और मध्य-पूर्व के देश अब यूरोसैम कंसोर्टियम के सैम्प/टी एनजी सिस्टम को विकल्प के रूप में देख रहे हैं। कुवैत, हंगरी, स्विट्जरलैंड और एस्टोनिया समेत करीब 15 देशों ने रुचि दिखाई है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इस प्रणाली का तेजी से बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव नहीं है और पहली डिलीवरी 2029 से पहले नहीं होगी। यह समय-सीमा यूरोप की तात्कालिक सुरक्षा जरूरतों के लिहाज से एक गंभीर सीमा है।

कुल मिलाकर, यूरोपीय रक्षा उद्योग एक अजीब दोराहे पर खड़ा है: एक ओर वह अमेरिकी प्रणालियों पर निर्भरता कम करना चाहता है, दूसरी ओर आंतरिक प्रतिद्वंद्विता और राजनीतिक मतभेद संयुक्त परियोजनाओं को बार-बार पटरी से उतार रहे हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह एक सबक है कि बहुराष्ट्रीय रक्षा सहयोग में औद्योगिक आधार साझा करने से पहले रणनीतिक सहमति और समयबद्ध कार्यान्वयन की गारंटी जरूरी है। यूरोप की यह आंतरिक कशमकश वैश्विक हथियार बाजार में रूस और अमेरिका के दबदबे को और मजबूत कर सकती है।

स्रोतों में मतभेद

— · 4 स्रोत · 3 भाषाएँ

44%मध्यम

स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

समर्थक67%
निंदक33%

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 3 भाषाएँ

लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa russa e CSIStampa europea continentale
Stampa russa e CSI/ stato
scetticismoschadenfreudeironia

यूरोपीय रक्षा सहयोग में गहरी दरारें दिख रही हैं: फ्रांस-जर्मन विवादों के कारण संयुक्त लड़ाकू विमान और ड्रोन कार्यक्रम संकट में हैं। पैट्रियट की कमी का सामना करते हुए, यूरोप SAMP/T NG जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है, जबकि फ्रांस ने लेक्लर्क टैंकों पर रूसी 'पिंजरे' की नकल की है। अमेरिका ने यूरोड्रोन की विफलता की भविष्यवाणी की है, जो यूरोप की स्वतंत्र रूप से कार्य करने में असमर्थता की पुष्टि करता है।

Stampa europea continentale/ dach_plus
pragmatismourgenza

फ्रांस-जर्मन लड़ाकू विमान की विफलता और भविष्य के टैंक पर मतभेदों के बावजूद, यूरोपीय उद्योग जगत के नेता इस बात पर जोर देते हैं कि संप्रभुता केवल संयुक्त परियोजनाओं के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है। एमबीडीए प्रमुख ने अनिश्चित दुनिया का जवाब देने के लिए अधिक सहयोग का आह्वान किया, जबकि एमजीसीएस विवाद अलग-अलग अवधारणाओं को दर्शाता है लेकिन फिर भी एक सहयोगी ढांचे के भीतर है।

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