
ट्रंप का ईरान को 300 अरब डॉलर देने से इनकार, परमाणु हथियार न रखने की सहमति का दावा
अमेरिकी राष्ट्रपति ने शांति समझौते के तहत ईरान द्वारा परमाणु हथियार त्यागने की घोषणा की, लेकिन पुनर्निर्माण कोष की रिपोर्टों को फर्जी बताया, जिससे वैश्विक कूटनीति में नई अनिश्चितता पैदा हुई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पर एक साथ दो बड़े दावे किए—ईरान ने कभी परमाणु हथियार नहीं रखने पर सहमति दे दी है, और वाशिंगटन द्वारा तेहरान को 300 अरब डॉलर के भुगतान की खबरें पूरी तरह झूठी हैं। यह बयान अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हस्ताक्षरित एक सहमति ज्ञापन (एमओयू) की पृष्ठभूमि में आया, जिसका उद्देश्य महीनों से जारी शत्रुता को समाप्त कर व्यापक वार्ता का ढांचा तैयार करना है। ट्रंप ने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ बैठक में संकेत दिया कि समझौते का पाठ शुक्रवार को होने वाले औपचारिक हस्ताक्षर समारोह के बाद सार्वजनिक किया जाएगा। उन्होंने इसे “बहुत शक्तिशाली दस्तावेज” बताया, लेकिन धनराशि से जुड़े विवाद ने इस ऐतिहासिक पहल पर तुरंत प्रश्नचिह्न लगा दिया।
विवाद की जड़ फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट है, जिसमें सूत्रों के हवाले से कहा गया था कि ट्रंप प्रशासन ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर का कोष बनाने पर विचार कर रहा है, जिसमें सरकारी धन नहीं बल्कि अमेरिका, यूरोप और जापान-दक्षिण कोरिया जैसी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की निजी कंपनियां निवेश करेंगी। उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने एक साक्षात्कार में कहा कि यदि ईरान अपने दायित्व निभाता है तो उसे ऐसे कोष तक “पहुंच मिल सकती है”, लेकिन ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि “अमेरिका ईरान को 300 अरब डॉलर दे रहा है” वाली कहानी “डमोक्रेट्स” द्वारा फैलाया गया फर्जी समाचार है। इस विरोधाभास ने अमेरिकी कांग्रेस में दोनों दलों के सदस्यों की चिंता बढ़ा दी है, जो समझौते की शर्तों पर पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं।
मध्य पूर्व से आ रही प्रतिक्रियाएं इस समझौते की जटिलता को रेखांकित करती हैं। इजरायली मीडिया ने विश्लेषण प्रकाशित किया है कि ट्रंप ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के प्रति शत्रुतापूर्ण रुख अपनाया है और वे वेंस के इस दृष्टिकोण से सहमत हैं कि इजरायली नेता समझौते को पटरी से उतारने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं, ट्रंप ने बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य आंशिक रूप से खुल गया है और समुद्री सुरंगों की सफाई जारी है, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण इस मार्ग के शुक्रवार तक पूरी तरह खुलने की उम्मीद है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान में नेतृत्व का तीसरा समूह “बहुत बुद्धिमान और शक्तिशाली” निकला, जिसके साथ अंतिम क्षण में सैन्य कार्रवाई टालकर समझौता संभव हुआ।
भारत और दक्षिण एशिया के लिए यह घटनाक्रम बहुआयामी महत्व रखता है। खाड़ी क्षेत्र भारत की ऊर्जा सुरक्षा का प्रमुख स्रोत है और चाबहार बंदरगाह के माध्यम से अफगानिस्तान व मध्य एशिया तक व्यापारिक गलियारे की आकांक्षा जुड़ी है। यदि तनाव स्थायी रूप से कम होता है और प्रतिबंधों में ढील दी जाती है, तो भारतीय कंपनियों के लिए ईरान में निवेश और ऊर्जा आयात के अवसर बढ़ सकते हैं। हालांकि, 300 अरब डॉलर के कोष को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता और अमेरिकी आंतरिक राजनीति में इस मुद्दे के गरमाने से यह स्पष्ट है कि राह आसान नहीं होगी। भारत को ऐसे किसी भी ढांचे का स्वागत होगा जो क्षेत्रीय स्थिरता लाए, लेकिन वह सावधानी से देखेगा कि क्या तेहरान वास्तव में परमाणु महत्वाकांक्षाओं से दूर रहता है और क्या आर्थिक प्रोत्साहनों की रूपरेखा ठोस साबित होती है।
आगे का रास्ता 60 दिनों की तकनीकी वार्ता पर टिका है, जिसमें परमाणु कार्यक्रम की सीमाएं, प्रतिबंध हटाने की प्रक्रिया और पुनर्निर्माण कोष की वास्तविक प्रकृति जैसे कठिन मुद्दे सुलझाए जाने हैं। ट्रंप के इनकार और वेंस के संकेत के बीच का अंतर या तो प्रशासन की आंतरिक रणनीति का हिस्सा है या फिर गंभीर समन्वय की कमी को दर्शाता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं, इस बात पर नजर रखेंगी कि क्या यह समझौता मध्य पूर्व में स्थायी शांति की नींव बनता है या महज एक और अधूरी कूटनीतिक कवायद साबित होता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ट्रम्प इस समझौते को एक व्यक्तिगत जीत के रूप में पेश करते हैं, यह दावा करते हुए कि ईरान ने हमेशा के लिए परमाणु हथियार त्याग दिए हैं। 300 मिलियन डॉलर के भुगतान की खबरों को अक्षम डेमोक्रेट्स द्वारा फैलाई गई फर्जी खबर बताकर खारिज कर दिया जाता है।
ट्रम्प के दावों के बावजूद, इज़राइली सुरक्षा हलके सतर्क हैं, ईरान के धोखे के इतिहास को याद करते हुए। समझौते को नाज़ुक माना जा रहा है और तेहरान के इरादे अस्पष्ट बने हुए हैं।
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