
स्क्रीन की चकाचौंध में खोया आत्मविश्वास और एकांत की सीख
जब माता-पिता का फोन बच्चों की उपलब्धियों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाए और सोशल मीडिया हर पल तुलना कराए, तो मनोविज्ञान कहता है—खुद से जुड़ना ही सच्ची ताकत है।
एक किशोर मंच पर अपनी प्रस्तुति दे रहा है—कोई खेल प्रतियोगिता या नाटक का मंचन। उत्साह से भरी आँखें दर्शकों पर टिकी हैं, लेकिन वहाँ उसके माता-पिता की नज़रें उस पर नहीं, बल्कि स्मार्टफोन की स्क्रीन पर गड़ी हैं। अमेरिकी शोधकर्ताओं के 600 किशोरों पर किए गए अध्ययन के अनुसार, यह दृश्य अब आम होता जा रहा है और इसका सीधा असर बच्चों के आत्मविश्वास पर पड़ रहा है। अभिभावकों का डिजिटल ध्यान-विचलन बच्चों में उपेक्षा का भाव पैदा कर रहा है, जो आगे चलकर कम आत्म-सम्मान और सामाजिक जुड़ाव की कठिनाइयों में बदल रहा है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, जब माता-पिता बच्चे की उपलब्धियों के बजाय केवल परिणामों पर ध्यान देते हैं, तो बच्चा असफलता से डरने लगता है और नई चीज़ें आज़माने से कतराता है।
यह व्यक्तिगत घटना भर नहीं है, बल्कि पूरी संस्कृति में फैली ‘पूर्णता की दौड़’ का एक लक्षण है। घाना की एक लेखिका स्वीकार करती हैं कि सोशल मीडिया पर हर पोस्ट यह बताती है कि कैसे और बेहतर दिखना है, जिसके चक्कर में वे यादगार पलों की तस्वीरें लेने से भी बचने लगीं—क्योंकि कहीं तस्वीर ‘परफेक्ट’ न आए और लोग क्या कहेंगे। बांग्लादेश के एक इस्लामिक विद्वान इसी प्रवृत्ति को ‘प्राचुर्य की प्रतिस्पर्धा’ बताते हैं, जो इंसान को उसके असल मकसद से भटका देती है। इंडोनेशियाई मीडिया में मनोवैज्ञानिक चेताते हैं कि ईर्ष्या की यह आग दिखती नहीं, पर दूसरों की नकल करने, उनसे आगे निकलने की होड़ और पीठ पीछे बुराई करने के रूप में सामने आती है।
इसके विपरीत, दुनिया भर के शोध अब एक अलग ही तस्वीर पेश कर रहे हैं। इंडोनेशिया और अमेरिकी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, असली आत्मविश्वास किसी से मान्यता मांगने में नहीं, बल्कि अपने स्वभाव को स्वीकारने में है। वे महिलाएँ जो दूसरों को खुश करने की बजाय खुद के प्रति ईमानदार रहती हैं, वे अधिक आकर्षक और प्रभावशाली होती हैं। यही बात इंट्रोवर्ट लोगों पर भी लागू होती है, जो अकेले खरीदारी करते हुए या सुई-धागे की कढ़ाई करते हुए गहरी शांति का अनुभव करते हैं। एक अरबी लेखिका एकांत को ‘नअमत’ कहती हैं—जहाँ सुनने, देखने और महसूस करने की सारी इंद्रियाँ जाग जाती हैं। उनके लिए अकेलापन वीरानी नहीं, बल्कि खुद से मिलने का उत्सव है।
मेटलाइफ के एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार, जो बच्चे कम उम्र में खेलों और सही मार्गदर्शन से जुड़ते हैं, उनका आत्मविश्वास 56 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। तो उत्तर स्क्रीन से दूर जाने में ही है—खेल के मैदानों, रचनात्मक हॉबी और सच्चे संवाद में। घाना की वही लेखिका अब लिखती हैं, ‘परफेक्ट जैसा कुछ होता नहीं, लेकिन खुशी असली है।’ और यही खुशी उस पल में है जब एक पिता फोन रखकर बच्चे की आँखों में देखता है, या जब एक किशोरी अपनी खामियों के साथ फोटो खिंचवाने का साहस करती है। अकेलेपन का वह सन्नाटा डरावना नहीं, बल्कि एक ऐसा दर्पण है जिसमें हम अपना असली चेहरा देख सकते हैं।
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