
इथियोपिया चुनाव में प्रधानमंत्री की पार्टी को 90 प्रतिशत सीटें, विपक्ष का बहिष्कार और सुरक्षा संकट
अबी अहमद की समृद्धि पार्टी ने 501 में से 438 सीटें जीतीं, लेकिन टाइग्रे, अम्हारा और ओरोमिया क्षेत्रों में हिंसा के कारण मतदान बाधित रहा और विपक्ष ने चुनाव को ‘दिखावा’ बताया।
इथियोपिया के 1 जून के संसदीय चुनावों में प्रधानमंत्री अबी अहमद की समृद्धि पार्टी (पीपी) ने लगभग 90 प्रतिशत सीटों पर कब्जा जमा लिया है। चुनाव आयोग के अनुसार पार्टी को 501 घोषित सीटों में से 438 सीटें मिली हैं। यह जीत उस समय हुई जब 143 मतदान केंद्र सुरक्षा कारणों से नहीं खुल पाए और टाइग्रे क्षेत्र के 38 निर्वाचन क्षेत्रों में बिल्कुल भी मतदान नहीं हो सका। नई संसद अक्टूबर में अबी को अगले पांच साल के लिए प्रधानमंत्री चुनेगी।
सत्तारूढ़ पार्टी ने इस जीत को आर्थिक सुधारों और खाद्य सुरक्षा में हुई प्रगति पर जनमत संग्रह बताया है। लेकिन विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने इसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव नहीं माना। विपक्षी नेता मेरारा गुदिना ने चुनाव को ‘दिखावा’ बताया, जबकि चुनाव लड़ने वाले एक अन्य नेता यितायल अस्सेफा ने कहा कि सत्तारूढ़ दल को भारी बढ़त हासिल थी और विपक्षी उम्मीदवारों को डराया-धमकाया गया। आलोचकों का आरोप है कि अबी के शासन में असहमति और स्वतंत्र प्रेस पर लगातार कार्रवाई हो रही है, जिससे चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। कई सीटों पर पीपी के उम्मीदवारों का कोई प्रतिद्वंद्वी ही नहीं था।
क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह चुनाव परिणाम इथियोपिया के भीतर और पड़ोसी देशों के साथ तनाव को और बढ़ा सकता है। टाइग्रे क्षेत्र, जहाँ 2020-22 के गृहयुद्ध में अनुमानित 6 लाख लोग मारे गए, आज भी संघीय सरकार और स्थानीय बलों के बीच अविश्वास से जूझ रहा है। दोनों पक्षों ने 2022 के शांति समझौते के उल्लंघन का आरोप लगाया है। इसी तरह अम्हारा में फानो मिलिशिया और ओरोमिया में ओरोमो लिबरेशन आर्मी (ओएलए) के साथ संघर्ष जारी है। अफ्रीकी संघ और अन्य क्षेत्रीय पर्यवेक्षकों ने इन क्षेत्रों में हिंसा के कारण चुनाव प्रक्रिया के प्रभावित होने की पुष्टि की है।
अबी अहमद की अंतरराष्ट्रीय छवि भी बदली है—2019 में इरिट्रिया के साथ शांति के लिए नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाले नेता पर अब सत्तावादी होने का आरोप है। इरिट्रिया और इथियोपिया के बीच तनाव फिर बढ़ गया है, और पश्चिमी राजनयिक सूत्रों के अनुसार दोनों देश एक-दूसरे पर विद्रोही समूहों को समर्थन देने का आरोप लगाते हैं। सूडान में जारी गृहयुद्ध में भी दोनों देशों की अप्रत्यक्ष भूमिका की खबरें हैं, जिससे अफ्रीका के सींग में एक व्यापक अस्थिरता का खतरा पैदा हो गया है।
अक्टूबर में अपेक्षित नई सरकार के समक्ष आंतरिक विद्रोहों को शांत करना और टाइग्रे के साथ शांति को पटरी पर लाना बड़ी चुनौती होगी। चुनाव आयोग ने 15 सीटों पर दोबारा मतदान की घोषणा की है, पर तारीख तय नहीं है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें अब इस पर टिकी हैं कि सरकार सुरक्षा संकट से कैसे निपटती है और क्या लोकतांत्रिक सुधारों की राह पर लौटती है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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The report highlights that while Abiy Ahmed's party won a landslide, the election was marred by conflict and repression, with little opposition participation, raising fears of further instability.
The European press varies, with some outlets describing the election as expected and noting the lack of surprises, while others critically highlight the transformation of Abiy from a reformer to a war leader, pointing to the ongoing conflict in Tigray.
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