
जब दिमाग ने सोचना छोड़ दिया: जनरेटिव एआई के साथ हमारा बदलता संज्ञानात्मक रिश्ता
हाल के अध्ययन और विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि सोचने-समझने का काम लगातार एआई को सौंपने से याददाश्त, निर्णय-क्षमता और आलोचनात्मक सोच पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।
विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में देर रात तक जगता एक छात्र अपने लैपटॉप पर कुछ टाइप करता है: “फ्रांसीसी क्रांति के कारणों पर एक निबंध लिखो।” चंद सेकंड में स्क्रीन पर एक सुव्यवस्थित उत्तर चमकने लगता है। यह दृश्य अब दुनिया भर के शिक्षण संस्थानों, दफ़्तरों और घरों में आम है, जहाँ चैटजीपीटी जैसे जनरेटिव एआई चैटबॉट हर बौद्धिक कार्य में सहायक बन चुके हैं। लेकिन इसी सहजता के साए में एक बेचैन करने वाला सवाल उभर रहा है: क्या इतनी अधिक एआई का उपयोग हमें मानसिक रूप से कमज़ोर बना रहा है?
अप्रैल में सामने आए एक ब्रिटिश-अमेरिकी अध्ययन, जो अभी समीक्षाधीन है, ने 1,222 लोगों पर प्रयोग कर यह पाया कि अंकगणित या पठन-बोध के सवाल हल करने में एआई की मदद से प्रतिभागियों का तात्कालिक प्रदर्शन तो सुधरा, लेकिन लंबी अवधि में उनकी क्षमता और बिना सहायता के प्रयास जारी रखने की इच्छा दोनों घट गईं। कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय की ग्रेस लियू के अनुसार, एआई लोगों को तुरंत उत्तर पाने की आदत डालकर “सीखने के अवसर छीन लेती है।” फ्रांसीसी राष्ट्रीय वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (सीएनआरएस) के शोधकर्ता जोहान शेवालेर इसे मस्तिष्क की “ऊर्जा बचाने” की स्वाभाविक प्रवृत्ति से जोड़ते हैं—यदि कोई गतिविधि बार-बार न की जाए, तो दिमाग उससे जुड़े तंत्रिकीय संपर्कों को बनाए रखने का कष्ट नहीं करता।
इन चिंताओं के बीच, प्रौद्योगिकी कंपनियों ने ‘सुकराती’ तरीकों को अपनाना शुरू किया है। ओपनएआई के चैटजीपीटी का ‘अध्ययन मोड’ और गूगल के जेमिनी का ‘निर्देशित शिक्षण’ सीधे उत्तर देने के बजाय संकेत और प्रश्न पूछकर उपयोगकर्ता को सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। माइक्रोसॉफ्ट ने कॉपायलट में त्रुटि की चेतावनियाँ और जानकारी की पुष्टि के लिए अनुस्मारक जोड़े हैं। वहीं दूसरी ओर, एंथ्रोपिक जैसी कंपनियाँ कॉरपोरेट जगत को एआई का उपयोग बंद न करने की सलाह दे रही हैं—उनका तर्क है कि लागत की चिंता में नवाचार को रोकना “गलत कदम” होगा। संयुक्त अरब अमीरात में तो सरकार ने अगले दो वर्षों में 50 प्रतिशत सरकारी सेवाओं को स्वायत्त एआई पर स्थानांतरित करने की घोषणा कर दी है, जो इस तकनीक को संस्थागत विश्वसनीयता और शासन की कसौटी पर खड़ा करता है।
लेकिन भरोसे का संकट कहीं अधिक गहरा है। 47 देशों के 48,000 लोगों पर किए गए एक सर्वेक्षण में मेलबर्न विश्वविद्यालय की निकोल गिलेस्पी ने पाया कि चार-पाँचवें ऑस्ट्रेलियाई एआई के सामाजिक जोखिमों को लेकर “बहुत चिंतित” हैं, और 70 प्रतिशत मानते हैं कि मौजूदा नियमन सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है। इंडोनेशिया में ‘डीपफेक’ और ‘इन्फोकैलिप्स’ जैसे शब्द आम बहस का हिस्सा बन चुके हैं—विशेषज्ञ ‘झूठे का लाभांश’ (लायर्स डिविडेंड) की चेतावनी देते हैं, जहाँ कोई भी सार्वजनिक हस्ती किसी वास्तविक रिकॉर्डिंग को “एआई द्वारा बनाया गया नकली” कहकर खारिज कर सकती है।
इन विरोधाभासों के बीच, एक स्थायी छवि उभरती है: वही छात्र, जो अब एक ‘सुकराती’ चैटबॉट के सामने बैठा है। स्क्रीन पर तैयार उत्तर नहीं, बल्कि एक उलटा सवाल चमक रहा है—“तुम्हारे विचार में इस क्रांति का सबसे बड़ा कारण क्या रहा होगा?” और छात्र, शायद पहली बार उस रात, कुंजीपटल से हाथ हटाकर सोचने लगता है।
| लैटिन अमेरिकी प्रेस | −0.60 | critical |
|---|---|---|
| अरब खाड़ी प्रेस | +0.20 | neutral |
जनरेटिव एआई का अत्यधिक उपयोग हमारी मानसिक क्षमताओं को क्षीण कर रहा है; हमें बहुत देर होने से पहले रुकना चाहिए।
यह ब्लॉक वैज्ञानिक अध्ययनों (सीमित होते हुए भी) का हवाला देकर और जोखिम को पूरी आबादी पर सामान्यीकृत करके विश्वसनीयता बनाता है, जिससे नैतिक तात्कालिकता की भावना पैदा होती है।
यह एआई के आर्थिक या दक्षता लाभों का उल्लेख नहीं करता, न ही प्रशिक्षण या विनियमन जैसे उपायों का।
एआई एक बड़ा आर्थिक अवसर है; हमें पीछे न छूटने के लिए विश्वास और शासन के साथ तैयारी करनी चाहिए।
यह ब्लॉक ठोस आंकड़ों (45-115 अरब डॉलर, 50% सेवाओं) और एक संस्थागत लहजे का उपयोग करके एआई को एक अपरिहार्य आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत करता है, संज्ञानात्मक भय से ध्यान हटाकर तैयारी पर केंद्रित करता है।
यह व्यक्तिगत संज्ञानात्मक जोखिमों या बौद्धिक दरिद्रता की आलोचनाओं को संबोधित नहीं करता, केवल स्केलेबिलिटी और विश्वास पर ध्यान केंद्रित करता है।
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