
यूएई ने 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया, वैश्विक बहस तेज
संयुक्त अरब अमीरात ने बाल मस्तिष्क विकास पर शोध के आधार पर न्यूनतम आयु 15 वर्ष तय की, जबकि ऑस्ट्रेलिया का अनुभव और मेक्सिको की योजना इस कदम की चुनौतियों को रेखांकित करती है।
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के मंत्रिमंडल ने जून 2026 में एक प्रस्ताव पारित कर 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया खाते रखने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस निर्णय के तहत प्लेटफॉर्मों को एक वर्ष के भीतर डिजिटल सरकारी पहचान, बायोमेट्रिक सत्यापन या कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित आयु अनुमान जैसी मजबूत आयु जांच प्रणाली लागू करनी होगी। यूएई के दूरसंचार एवं डिजिटल सरकार नियामक प्राधिकरण (टीडीआरए) के महानिदेशक इंजी. माजिद सुल्तान अल-मसमार ने स्पष्ट किया कि प्लेटफॉर्म नाबालिगों का न्यूनतम डेटा एकत्र करेंगे और उसे केवल आयु सत्यापन तक सीमित रखा जाएगा, संग्रहीत या अन्य उपयोग नहीं किया जाएगा।
यूएई के परिवार मंत्री और बाल डिजिटल सुरक्षा परिषद की अध्यक्ष सना बिन्त मोहम्मद सुहैल के अनुसार, यह आयु सीमा बाल संज्ञानात्मक विकास पर व्यापक शोध के बाद चुनी गई। विशेषज्ञों ने 15 वर्ष की उम्र को एक संवेदनशील पड़ाव बताया जब बच्चों की तर्क क्षमता और मस्तिष्क विकास को सबसे अधिक सुरक्षा की आवश्यकता होती है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया का अनुभव इस दिशा में एक चेतावनी प्रस्तुत करता है। 2025 में लागू सोशल मीडिया न्यूनतम आयु अधिनियम के बाद लाखों खाते निष्क्रिय किए गए, लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 70 प्रतिशत अभिभावकों ने बताया कि उनके बच्चों के खाते अब भी सक्रिय हैं। ऑस्ट्रेलियाई युवाओं ने भेष बदलकर या अन्य तरीकों से प्रतिबंध को दरकिनार कर दिया, जिससे विधायी हस्तक्षेप की सीमाएं उजागर हुईं।
वैश्विक स्तर पर यह कदम एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है। मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम ने जुलाई में फीफा विश्व कप के बाद नाबालिगों द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया के उपयोग पर व्यापक सार्वजनिक चर्चा शुरू करने की घोषणा की है, जिसमें स्वास्थ्य विशेषज्ञ, अभिभावक और नागरिक समाज शामिल होंगे। उन्होंने स्क्रीन टाइम के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों, विशेषकर लड़कियों और युवाओं में तनाव व चिंता, का हवाला दिया। ऑस्ट्रेलियाई आंकड़े भी इस चिंता को बल देते हैं: बच्चे प्रतिदिन चार घंटे से अधिक स्क्रीन पर बिता रहे हैं, और किशोर 11 घंटे तक डिवाइस से चिपके रहते हैं, जिसके चलते पाँच में से एक से भी कम बच्चे एक घंटे का व्यायाम कर पाते हैं।
यूएई में यह प्रतिबंध एक ऐसे समय आया है जब पुलिस अधिकारी सोशल मीडिया और गेमिंग प्लेटफॉर्मों के जरिये युवाओं को नशीले पदार्थों की ओर खींचने वाले गिरोहों के प्रति आगाह कर रहे हैं। अबू धाबी पुलिस के नशारोधी निदेशालय के निदेशक ब्रिगेडियर ताहिर ग़रीब अल-धाहेरी ने रोकथाम को पहली पंक्ति बताया, जबकि दुबई पुलिस के अंतरराष्ट्रीय हेमाया केंद्र के निदेशक ब्रिगेडियर डॉ. अब्दुलरहमान शरफ अल-मामरी ने कहा कि छात्रों में नशे के मामले सीमित और अलग-थलग हैं, और संस्थागत आंकड़े किसी व्यापक प्रवृत्ति की पुष्टि नहीं करते। यूएई का दृष्टिकोण दंड के बजाय पुनर्वास पर जोर देता है, जिसके तहत स्वैच्छिक उपचार चाहने वालों को आपराधिक दंड से छूट दी जाती है।
फिलहाल, यूएई में प्लेटफॉर्मों को अनुपालन के लिए 12 महीने का समय दिया गया है, और उल्लंघन पर प्रशासनिक दंड या आंशिक/पूर्ण अवरोधन का प्रावधान है। मेक्सिको में सार्वजनिक विमर्श जुलाई के बाद शुरू होने की उम्मीद है, जबकि ऑस्ट्रेलिया में विफलता के बावजूद कानून को और सख्त करने की चर्चा है। यह वैश्विक बहस अब इस बात पर केंद्रित होती जा रही है कि क्या विधायी प्रतिबंध वास्तव में बच्चों की सुरक्षा कर सकते हैं, या वे उन्हें कम विनियमित डिजिटल स्थानों की ओर धकेल देते हैं।
| रूसी और सीआईएस प्रेस | 0.00 | neutral |
|---|---|---|
| अरब खाड़ी प्रेस | +0.70 | aligned |
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.30 | critical |
Russia observes that the UAE measure fits into an international framework, but stresses that without effective state control any restriction is futile.
It normalizes the measure as part of a global trend, but introduces a caveat about the need for state control, leveraging a concrete example (Australia) to reinforce Russia's cautious stance toward liberal solutions.
It omits the internal UAE debate on the impact on digital freedoms and criticism from child rights organizations.
The UAE acts as a wise, protective guide, imposing limits that other nations, like Australia, have been unable to enforce due to lack of social cohesion.
It attributes a paternal figure to the state, knowing what is best for youth, contrasting with Australia's failure due to a fragmented society. National pride is reinforced through contrast.
It omits the possibility that the measure may limit minors' freedom of expression, and does not cite studies questioning the effectiveness of age restrictions.
The pragmatic West warns: restrictions without proper enforcement infrastructure and without involving platforms are doomed to fail, as the Australian case shows.
It uses the Australian failure as a legal and practical precedent to question the effectiveness of the UAE measure, shifting the debate to implementation and rights issues.
It does not acknowledge the cultural and social context of the UAE, where state control is more accepted, and overlooks local consensus on the measure.
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