
लेबनान-इज़राइल समझौता: अमेरिकी कूटनीति के दोहरे मानक और बेरूत में आंतरिक टकराव की आशंका
अमेरिका की मध्यस्थता में हुए इज़राइल-लेबनान ढाँचा समझौते ने हिज़्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण को इज़रायली वापसी से जोड़ दिया है, जिसे लेबनानी संसद अध्यक्ष और हिज़्बुल्लाह ने अस्वीकार कर दिया है।
संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता में शुक्रवार को इज़राइल और लेबनान के बीच एक ढाँचा समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जो दक्षिणी लेबनान से इज़रायली सैनिकों की वापसी को हिज़्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण से जोड़ता है। यह समझौता अमेरिका और ईरान के बीच पहले हुए उस युद्धविराम करार से भिन्न है, जिसमें सभी मोर्चों पर तत्काल लड़ाई रोकने और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान की शर्त रखी गई थी। लेबनानी संसद अध्यक्ष नबीह बेरी ने इस समझौते को “मई 17, 1983 के समझौते से भी बदतर” बताया और प्रधानमंत्री नवाफ़ सलाम से इसे वापस लेने का आग्रह किया, जबकि हिज़्बुल्लाह ने इसे “मृत पैदा” और “अमान्य” घोषित कर दिया।
लेबनानी सरकारी पक्ष ने इस समझौते को राष्ट्रीय संप्रभुता की बहाली की दिशा में “पहला कदम” बताया है। राष्ट्रपति जोसेफ़ आऊन ने सेना की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि यह समझौता लेबनानी नागरिकों को पूर्णतः मुक्त भूमि पर लौटने का अवसर देगा। दूसरी ओर, इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे “बड़ी उपलब्धि” करार देते हुए कहा कि जब तक हिज़्बुल्लाह और अन्य आतंकी संगठन निहत्थे नहीं होते, इज़रायली सेना दक्षिणी लेबनान के “सुरक्षा क्षेत्र” में बनी रहेगी। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, वाशिंगटन में चार दिनों तक चली वार्ता के दौरान दोनों पक्षों के बीच “ईरान और हिज़्बुल्लाह के प्रभाव को कमज़ोर करने” की साझा रुचि ने समझौते को गति दी।
विश्लेषकों के अनुसार, यह समझौता लेबनानी राज्य पर ऐसी ज़िम्मेदारी डालता है जिसे पूरा करना व्यवहारिक रूप से असंभव है। लंदन स्कूल ऑफ़ इकनॉमिक्स के विद्वान फ़वाज़ गेर्गेस ने कहा कि हिज़्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण की शर्त “संरचनात्मक रूप से दोषपूर्ण” है और इससे इज़रायल को दक्षिणी लेबनान में अनिश्चितकालीन सैन्य उपस्थिति का राजनीतिक कवच मिल गया है। बेरूत स्थित विश्लेषक माइकल यंग ने कहा कि समझौते ने “सारा बोझ लेबनान पर डाल दिया है” और यह ऐसी संरचना बनाता है जो इज़रायल को अनिश्चितकाल तक वहाँ रहने देती है। हिज़्बुल्लाह के राजनीतिक परिषद के उपप्रमुख महमूद क़माती ने चेतावनी दी कि समूह “सभी संभव साधनों और तरीक़ों से इसका मुक़ाबला करेगा”, हालाँकि उन्होंने सरकार से इस्तीफ़ा देने या सड़कों पर उतरने की संभावना को फ़िलहाल ख़ारिज किया।
यह समझौता अमेरिकी कूटनीति के दो अलग-अलग रास्तों को उजागर करता है। स्विट्ज़रलैंड में अमेरिका-ईरान वार्ता के तहत लेबनान में युद्धविराम सुनिश्चित करने के लिए एक “डी-कॉन्फ़्लिक्शन सेल” बनाने पर सहमति बनी थी, जिसे इज़रायल और लेबनानी वार्ताकारों ने ईरान की भूमिका को वैधता देने वाला क़दम माना। इसके जवाब में वाशिंगटन ने इज़रायल-लेबनान समझौते को तेज़ी से अंतिम रूप दिया। लेबनानी संसद अध्यक्ष बेरी ने आरोप लगाया कि यह समझौता अमेरिका-ईरान समझौता ज्ञापन को कमज़ोर करने के लिए रचा गया है और इससे क्षेत्र को “अमेरिकी आंतरिक प्रतिस्पर्धा और अमेरिकी-इज़रायली तनाव” की क़ीमत चुकानी पड़ सकती है। समझौते को लेबनान की संवैधानिक संस्थाओं से पारित कराने की प्रक्रिया अभी आरंभ नहीं हुई है और न ही इज़रायली वापसी के लिए कोई समय-सीमा तय की गई है।
| अरब लेवांत-मगरिब प्रेस | −0.80 | critical |
|---|---|---|
| ईरानी और संबद्ध प्रेस | −0.90 | critical |
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.20 | neutral |
The Israeli government systematically violates the framework agreement, continuing to strike southern Lebanon and establish checkpoints, showing that the pact is merely a cover for occupation.
Instead of presenting the agreement as a step toward peace, it highlights Israeli violations to delegitimize the initiative and question Israel's good faith.
The attack on the Dena is a war crime that will be recorded in history, and Iran will pursue those responsible without hesitation.
Iran is portrayed as an innocent victim and the enemy's action is labeled a war crime, delegitimizing any pretext for the attack.
The Gulf states view the new regional order with anxiety, aware that the war has permanently changed power dynamics.
It emphasizes instability and the transitory nature of the current peace, questioning the long-term stability of the agreement.
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