
वैश्विक बहस: एकता बनाम असहमति का लोकतांत्रिक अधिकार और नागरिकों की भूमिका
ईरान, कोलंबिया, स्वीडन और नाइजीरिया से आई टिप्पणियाँ दिखाती हैं कि लोकतंत्र में ‘एकता’ के आह्वान और असहमति के बचाव के बीच तनाव किस तरह राष्ट्रीय पहचान और जवाबदेही को नया आकार दे रहा है।
ईरानी सांसदों के अनुसार, सद्भावना से किया गया कोई भी धरना या प्रदर्शन दुश्मन को दुरुपयोग का अवसर दे सकता है, इसलिए राष्ट्रीय और धार्मिक आयोजनों में जनभागीदारी ही एकमात्र प्रभावी एकजुटता है। इसके विपरीत, कोलंबिया के सार्वजनिक विमर्श में यह तर्क सामने आया है कि लोकतंत्र का सर्वोच्च मूल्य विभाजन को संरक्षित करना है, न कि एकता को थोपना। कोलंबियाई विश्लेषकों का कहना है कि एकता की अपील अक्सर अपने ही पक्षों के प्रति अधीनता का गुप्त आह्वान होती है, जबकि लोकतंत्र का नैतिक औचित्य ही इस बात में है कि वह अपूरणीय मतभेदों को संस्थागत रूप से संभाले, न कि समाप्त करे।
स्वीडन की दो टिप्पणियाँ इस बहस को नागरिक पहचान और राजनीतिक भागीदारी के धरातल पर ले जाती हैं। स्वीडिश लेखकों का मानना है कि लोकतंत्र तब सर्वोत्तम काम करता है जब उसका प्रतिनिधित्व विविध पृष्ठभूमि के ‘सामान्य, समझदार लोग’ करें, लेकिन घृणा और धमकियों के शोर ने ऐसे लोगों को चुप करा दिया है। दूसरी ओर, स्वीडन में ही ‘प्रवासी’ जैसे शब्दों की कई पीढ़ियों तक इस्तेमाल किए जाने की आलोचना हो रही है, जिसे ‘हम और वे’ की मानसिकता पैदा करने वाला बताया गया है। स्वीडिश विश्लेषक इस बात पर जोर देते हैं कि नागरिकता को ही पहचान का आधार बनाया जाए और सांख्यिकीय आवश्यकता हो तो ‘पहली या दूसरी पीढ़ी के स्वीडिश’ जैसे शब्द अपनाए जाएँ।
पश्चिम अफ़्रीकी देश नाइजीरिया से आया दृष्टिकोण जवाबदेही को एकतरफ़ा नहीं मानता। नाइजीरियाई टिप्पणीकारों के अनुसार, देश की अनेक समस्याएँ सरकार की विफलताओं के साथ-साथ नागरिकों की रोज़मर्रा की आदतों और चुनावों से भी पोषित होती हैं। वे तर्क देते हैं कि परिवार से शुरू होकर सार्वजनिक अनुशासन तक, नागरिकों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी और नागरिक चेतना के बिना कोई भी राष्ट्र स्थायी परिणाम नहीं प्राप्त कर सकता। यह सोच सरकारी जवाबदेही को नकारती नहीं, बल्कि शासन और नागरिक आचरण के बीच एक साझा जिम्मेदारी की माँग करती है।
ये वैश्विक स्वर दक्षिण एशिया के लिए भी प्रासंगिक हैं, जहाँ राष्ट्रीय एकता, नागरिकता की भाषा और असहमति की सीमाओं पर बहस जारी है। भारत जैसे लोकतंत्रों में ‘राष्ट्रविरोधी’ और ‘देशभक्ति’ के बीच खिंची रेखाएँ, तथा नागरिकता संशोधन कानून जैसे मुद्दों पर हुआ ध्रुवीकरण, इसी वैश्विक तनाव का स्थानीय प्रतिबिंब हैं। विश्लेषक मानते हैं कि जब राज्य एकता के नाम पर असहमति को दुश्मन का औजार बता देता है, या जब नागरिक अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटते हैं, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर होती है।
फ़िलहाल यह बहस किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुँची है। ईरान में संसद अपने विधायी और निगरानी कार्यों पर लौटने की इच्छा जता रही है, जबकि कोलंबिया में हालिया चुनाव परिणामों के बाद प्रगतिशील खेमा विपक्ष की भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है। स्वीडन और नाइजीरिया में यह चर्चा नीतिगत बदलाव के बजाय सामाजिक आत्मचिंतन का हिस्सा बनी हुई है। आने वाले महीनों में विभिन्न देशों में होने वाले चुनाव और विधायी सत्र इस बात की परीक्षा लेंगे कि एकता और असहमति के बीच संतुलन किस करवट बैठता है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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लोकतंत्र तब सबसे अच्छा काम करता है जब उसका प्रतिनिधित्व सामान्य, समझदार लोगों का एक व्यापक मिश्रण करता है, न कि शोर मचाने वाले असंतुष्टों द्वारा। फिर भी सार्वजनिक बहस कठोर हो गई है, विदेशी मूल के लोगों के प्रति भाषा और नीतियाँ तेजी से सख्त हो रही हैं, जिसका अब पारंपरिक रूप से प्रगतिशील ताकतें भी समर्थन कर रही हैं, जो एक बहिष्कारकारी प्रवृत्ति की चिंता पैदा करती है।
बाहरी दबाव और आर्थिक कठिनाई के समय में, राष्ट्रीय एकता एक परम अनिवार्यता है। किसी भी प्रकार का विरोध या धरना, चाहे सांसदों द्वारा भी हो, दुश्मन को विभाजन बोने का अवसर देने का जोखिम उठाता है। केवल धार्मिक और राष्ट्रीय सभाएँ देश को मजबूत करती हैं, और सामाजिक सामंजस्य बनाए रखने के लिए हर सार्वजनिक शब्द जिम्मेदारी और निष्पक्षता से चिह्नित होना चाहिए।
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