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अमेरिका-ईरान समझौते के बाद भी इज़राइल लेबनान, सीरिया और गाज़ा से सेना नहीं हटाएगा

इज़राइल के रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि अमेरिका-ईरान अंतरिम शांति समझौते के बावजूद सेना 'सुरक्षा क्षेत्रों' में अनिश्चितकाल तक रहेगी, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ने की आशंका है।

अमेरिका और ईरान के बीच एक ऐतिहासिक अंतरिम शांति समझौते की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद इज़राइल ने साफ कर दिया है कि वह लेबनान, सीरिया और गाज़ा पट्टी में अपने कब्ज़े वाले इलाकों से सेना नहीं हटाएगा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने बताया कि दोनों पक्ष 19 जून को जिनेवा में समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले हैं और इसमें लेबनान सहित सभी मोर्चों पर तत्काल और स्थायी युद्धविराम का प्रावधान है। लेकिन इज़राइली रक्षा मंत्री इज़राइल काट्ज़ और राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर ने कड़े शब्दों में कहा कि यह समझौता उनके देश को बाध्य नहीं करता। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत में यही रुख दोहराया, जिससे वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच संभावित कूटनीतिक तनाव के संकेत मिल गए हैं।

इज़राइली नेतृत्व का तर्क है कि दक्षिणी लेबनान, सीरिया और गाज़ा में बनाए गए 'सुरक्षा क्षेत्र' उसकी सीमाओं की रक्षा के लिए अनिश्चितकाल तक ज़रूरी हैं। काट्ज़ ने इन इलाकों को 'जिहादी तत्वों' से मुक्त कराने और स्थानीय आबादी तथा 'आतंकी ढांचे' को हटाने की बात कही। बेन-गवीर ने सोशल मीडिया पर लिखा कि इज़राइल कोई 'केले का गणराज्य' नहीं है जो अमेरिका के अधीन हो; वह एक संप्रभु राष्ट्र है और किसी भी जीते हुए क्षेत्र से पीछे नहीं हटेगा। नेतन्याहू को इस मुद्दे पर अपने मंत्रिमंडल का पूर्ण समर्थन प्राप्त है, और सेना को हिज़्बुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई जारी रखने की छूट दी गई है। साथ ही इज़राइल ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान ने उस पर हमला किया तो वह 'बड़ी ताकत' से जवाबी कार्रवाई करेगा।

ईरान ने इस समझौते को लेबनान में इज़राइली हमलों की समाप्ति से जोड़ा है, जिससे स्थिति और पेचीदा हो गई है। हिज़्बुल्लाह, जिसे अमेरिका और इज़राइल आतंकी संगठन मानते हैं, लेबनान में एक प्रमुख सैन्य और राजनीतिक ताकत बनी हुई है। इज़राइल का कहना है कि अगर हिज़्बुल्लाह युद्धविराम का पालन करेगा तो उस पर हमले नहीं होंगे, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि इज़राइली सेना दक्षिणी लेबनान में घुस चुकी है और वहाँ बुनियादी ढांचे को नष्ट कर रही है। अमेरिका की ओर से अभी तक कोई सार्वजनिक दबाव नहीं दिखा है, लेकिन ट्रंप प्रशासन के सामने यह चुनौती है कि वह अपने मध्यस्थता प्रयासों को कैसे बचाए।

दक्षिण एशिया के लिए यह घटनाक्रम कई मायनों में अहम है। पाकिस्तान ने इस समझौते की घोषणा करके एक कूटनीतिक भूमिका हासिल की है, जिसे भारत अपने पड़ोसी की बढ़ती मध्य-पूर्व सक्रियता के रूप में देख सकता है। भारत के अपने हित इस क्षेत्र में गहरे हैं—खाड़ी देशों से ऊर्जा आपूर्ति, वहाँ बसा विशाल प्रवासी भारतीय समुदाय, और इज़राइल तथा अरब राष्ट्रों दोनों के साथ रणनीतिक साझेदारी। यदि इज़राइल के रुख से तनाव बढ़ता है और ईरान-इज़राइल सीधे टकराव की आशंका गहराती है, तो तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और क्षेत्रीय अस्थिरता का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

आगे की राह अनिश्चित है। जिनेवा में होने वाली बैठक से पहले इज़राइल का यह सख्त रवैया समझौते की बुनियाद को हिला सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर इज़राइल लेबनान में सैन्य कार्रवाई जारी रखता है, तो ईरान समझौते से पीछे हट सकता है, जिससे व्यापक युद्धविराम की उम्मीद धूमिल हो जाएगी। दूसरी ओर, अमेरिका के लिए यह परीक्षा होगी कि वह अपने सहयोगी इज़राइल पर कितना प्रभाव डाल पाता है। फिलहाल, पश्चिम एशिया में शांति की संभावनाएँ एक बार फिर अनिश्चितता के बादलों में घिर गई हैं।

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 1 भाषाएँ

49%
लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa latinoamericanaStampa europea continentale
Stampa latinoamericana/ bolivariana_progressista
indignazioneallarme

इज़राइल ने अमेरिका-ईरान युद्धविराम समझौते को अस्वीकार कर दिया और घोषणा की कि वह लेबनान, सीरिया और गाज़ा के कुछ हिस्सों पर अनिश्चित काल तक सैन्य कब्ज़ा बनाए रखेगा। इज़राइली अधिकारियों का कहना है कि वे इस समझौते से बंधे नहीं हैं और कब्ज़े वाले इलाकों को निवासियों और आतंकी बुनियादी ढांचे से 'साफ़' करने की बात करते हैं। इस कदम को क्षेत्रीय शांति प्रयासों के लिए एक झटका और एकतरफावाद का प्रदर्शन माना जा रहा है।

Stampa europea continentale/ mediterranea
ironiascetticismo

इज़राइल अमेरिका-ईरान समझौते पर गुस्से से प्रतिक्रिया करता है, यह घोषणा करते हुए कि वह लेबनान से सेना नहीं हटाएगा और वाशिंगटन के अधीन नहीं है। यह समझौता प्रधानमंत्री नेतन्याहू के लिए राजनीतिक मुश्किलें पैदा करता है, जबकि मंत्री इज़राइल के बने रहने के संप्रभु अधिकार पर ज़ोर देते हैं। लहज़ा बाहरी बाधाओं के प्रति अवज्ञा और चिढ़ का है।

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अमेरिका-ईरान समझौते के बाद भी इज़राइल लेबनान, सीरिया और गाज़ा से सेना नहीं हटाएगा

इज़राइल के रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि अमेरिका-ईरान अंतरिम शांति समझौते के बावजूद सेना 'सुरक्षा क्षेत्रों' में अनिश्चितकाल तक रहेगी, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ने की आशंका है।

अमेरिका और ईरान के बीच एक ऐतिहासिक अंतरिम शांति समझौते की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद इज़राइल ने साफ कर दिया है कि वह लेबनान, सीरिया और गाज़ा पट्टी में अपने कब्ज़े वाले इलाकों से सेना नहीं हटाएगा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने बताया कि दोनों पक्ष 19 जून को जिनेवा में समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले हैं और इसमें लेबनान सहित सभी मोर्चों पर तत्काल और स्थायी युद्धविराम का प्रावधान है। लेकिन इज़राइली रक्षा मंत्री इज़राइल काट्ज़ और राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर ने कड़े शब्दों में कहा कि यह समझौता उनके देश को बाध्य नहीं करता। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत में यही रुख दोहराया, जिससे वाशिंगटन और तेल अवीव के बीच संभावित कूटनीतिक तनाव के संकेत मिल गए हैं।

इज़राइली नेतृत्व का तर्क है कि दक्षिणी लेबनान, सीरिया और गाज़ा में बनाए गए 'सुरक्षा क्षेत्र' उसकी सीमाओं की रक्षा के लिए अनिश्चितकाल तक ज़रूरी हैं। काट्ज़ ने इन इलाकों को 'जिहादी तत्वों' से मुक्त कराने और स्थानीय आबादी तथा 'आतंकी ढांचे' को हटाने की बात कही। बेन-गवीर ने सोशल मीडिया पर लिखा कि इज़राइल कोई 'केले का गणराज्य' नहीं है जो अमेरिका के अधीन हो; वह एक संप्रभु राष्ट्र है और किसी भी जीते हुए क्षेत्र से पीछे नहीं हटेगा। नेतन्याहू को इस मुद्दे पर अपने मंत्रिमंडल का पूर्ण समर्थन प्राप्त है, और सेना को हिज़्बुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई जारी रखने की छूट दी गई है। साथ ही इज़राइल ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान ने उस पर हमला किया तो वह 'बड़ी ताकत' से जवाबी कार्रवाई करेगा।

ईरान ने इस समझौते को लेबनान में इज़राइली हमलों की समाप्ति से जोड़ा है, जिससे स्थिति और पेचीदा हो गई है। हिज़्बुल्लाह, जिसे अमेरिका और इज़राइल आतंकी संगठन मानते हैं, लेबनान में एक प्रमुख सैन्य और राजनीतिक ताकत बनी हुई है। इज़राइल का कहना है कि अगर हिज़्बुल्लाह युद्धविराम का पालन करेगा तो उस पर हमले नहीं होंगे, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि इज़राइली सेना दक्षिणी लेबनान में घुस चुकी है और वहाँ बुनियादी ढांचे को नष्ट कर रही है। अमेरिका की ओर से अभी तक कोई सार्वजनिक दबाव नहीं दिखा है, लेकिन ट्रंप प्रशासन के सामने यह चुनौती है कि वह अपने मध्यस्थता प्रयासों को कैसे बचाए।

दक्षिण एशिया के लिए यह घटनाक्रम कई मायनों में अहम है। पाकिस्तान ने इस समझौते की घोषणा करके एक कूटनीतिक भूमिका हासिल की है, जिसे भारत अपने पड़ोसी की बढ़ती मध्य-पूर्व सक्रियता के रूप में देख सकता है। भारत के अपने हित इस क्षेत्र में गहरे हैं—खाड़ी देशों से ऊर्जा आपूर्ति, वहाँ बसा विशाल प्रवासी भारतीय समुदाय, और इज़राइल तथा अरब राष्ट्रों दोनों के साथ रणनीतिक साझेदारी। यदि इज़राइल के रुख से तनाव बढ़ता है और ईरान-इज़राइल सीधे टकराव की आशंका गहराती है, तो तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और क्षेत्रीय अस्थिरता का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

आगे की राह अनिश्चित है। जिनेवा में होने वाली बैठक से पहले इज़राइल का यह सख्त रवैया समझौते की बुनियाद को हिला सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर इज़राइल लेबनान में सैन्य कार्रवाई जारी रखता है, तो ईरान समझौते से पीछे हट सकता है, जिससे व्यापक युद्धविराम की उम्मीद धूमिल हो जाएगी। दूसरी ओर, अमेरिका के लिए यह परीक्षा होगी कि वह अपने सहयोगी इज़राइल पर कितना प्रभाव डाल पाता है। फिलहाल, पश्चिम एशिया में शांति की संभावनाएँ एक बार फिर अनिश्चितता के बादलों में घिर गई हैं।

स्रोतों में मतभेद

— · 3 स्रोत · 1 भाषा

49%मध्यम

स्रोत कैसे एक ही तथ्यों को अलग-अलग तरीके से बयाँ करते हैं।

विभाजन कैसे है

न्यूनत्र58%
निंदक42%

वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।

2 संपादकीय समूह · 1 भाषाएँ

लहज़ातापमानफ़ोकसस्थितिक्षितिज
Stampa latinoamericanaStampa europea continentale
Stampa latinoamericana/ bolivariana_progressista
indignazioneallarme

इज़राइल ने अमेरिका-ईरान युद्धविराम समझौते को अस्वीकार कर दिया और घोषणा की कि वह लेबनान, सीरिया और गाज़ा के कुछ हिस्सों पर अनिश्चित काल तक सैन्य कब्ज़ा बनाए रखेगा। इज़राइली अधिकारियों का कहना है कि वे इस समझौते से बंधे नहीं हैं और कब्ज़े वाले इलाकों को निवासियों और आतंकी बुनियादी ढांचे से 'साफ़' करने की बात करते हैं। इस कदम को क्षेत्रीय शांति प्रयासों के लिए एक झटका और एकतरफावाद का प्रदर्शन माना जा रहा है।

Stampa europea continentale/ mediterranea
ironiascetticismo

इज़राइल अमेरिका-ईरान समझौते पर गुस्से से प्रतिक्रिया करता है, यह घोषणा करते हुए कि वह लेबनान से सेना नहीं हटाएगा और वाशिंगटन के अधीन नहीं है। यह समझौता प्रधानमंत्री नेतन्याहू के लिए राजनीतिक मुश्किलें पैदा करता है, जबकि मंत्री इज़राइल के बने रहने के संप्रभु अधिकार पर ज़ोर देते हैं। लहज़ा बाहरी बाधाओं के प्रति अवज्ञा और चिढ़ का है।

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