
जब एक मूंगफली का छिलका बन गया डर का प्रतीक
देखभाल के वादों और संस्थागत उपेक्षा के बीच फंसे लोगों की कहानियां, जहां एक बच्चे की तलाशी से लेकर प्रसव कक्ष तक, भरोसा बार-बार टूटता है।
ग्यारह साल का मार्दोश येम्बी अपनी चाची के लंदन स्थित घर के एक कोने में घंटों तक एक मूंगफली का छिलका ढूंढता रहता था। पादरी ने कहा था कि वह रात में इसी छिलके पर सवार होकर जादू-टोना करने जाता है, और हर दौरे पर वे उसे यह खोजने को मजबूर करते, जबकि सब जानते थे कि वहां कुछ भी नहीं है। बच्चा रोता-चिल्लाता, और परिवार के लोग उसे ऐसे घूरते जैसे वह कोई राक्षस हो। यह दृश्य किसी लोककथा का नहीं, बल्कि 1999 के उत्तरी लंदन का है, जहां एक अनाथ बच्चे को ‘किंडोकी’ यानी शैतान का सेवक घोषित कर दिया गया था।
येम्बी की कहानी अकेली नहीं है। ब्रिटेन में 2024 में आध्यात्मिक कब्जे या जादू-टोने से जुड़े दुर्व्यवहार के 2,180 ज्ञात मामले सामने आए, लेकिन पुलिस तक केवल सात रिपोर्ट पहुंचीं। पीड़ित बच्चों में ऑटिज्म या मिर्गी जैसी स्थितियों को बुरी आत्मा का प्रमाण मान लिया जाता है, और परिवार की विपत्तियों का ठीकरा उन्हीं के सिर फोड़ दिया जाता है। येम्बी को स्कूल में सामाजिक सेवाओं ने तब निकाला जब चाची ने उसे ‘डिलीवरेंस’ के लिए अफ्रीका भेजने की बात कही। इसके बाद ही पहली बार किसी ने उसे एक बच्चे की तरह देखा।
यह भरोसे का वह संकट है जो सीमाओं और संस्कृतियों के पार फैला है। स्वीडन में वार्षिक गर्मियों की छुट्टियों के दौरान प्रसव कक्षों में 94 प्रतिशत दाइयां मानती हैं कि स्टाफिंग अपर्याप्त है और मरीजों की सुरक्षा खतरे में है। नॉरबोटेन के सुंदरबाय अस्पताल में दाइयां 12.5 घंटे की शिफ्टें कर रही हैं, और गर्भवती करोलिना इकोनेन को अपने नियोजित सीजेरियन के लिए तीन घंटे दूर गैलिवारे जाना पड़ रहा है, जबकि उनका घर अस्पताल से मात्र बीस मिनट की दूरी पर है। बुजुर्गों की देखभाल में तैनात कर्मचारी बिना ब्रेक के काम करते हैं, क्योंकि अलार्म लगातार बजते रहते हैं, और उन्हें डर है कि अगर वे साथ बैठे तो ‘अकुशल’ दिखेंगे।
स्पेन के आपातकालीन कक्ष में एक विदेशी डॉक्टर का ‘ब्यूनास नोचेस’ कहने का लहजा ही मरीज और उसकी पत्नी के मन में संदेह बो देता है—क्या इनका शीर्षक मान्यता प्राप्त है? क्या ये सिर्फ छुट्टियों की भर्ती हैं? कोलंबिया में महिला नेतृत्व की राह में यह धारणा आड़े आती है कि सहानुभूति और परिवार की बात करना व्यावसायिकता की कमी है, जबकि पुरुषों में वही गुण निकटता का प्रतीक बन जाते हैं। स्वीडन की राजनीति में महिलाएं उपेक्षा और हर्षक तकनीकों से तंग आकर मंच छोड़ रही हैं, और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, धमकियों के बाद वे सार्वजनिक बहसों से हट जाती हैं, जिससे लोकतांत्रिक संवाद संकुचित होता है।
इन सबके बीच, अरबी भाषा की एक टिप्पणी में नस्लवाद को एक ऐसी महामारी बताया गया है जिससे पीड़ित व्यक्ति स्वयं को इनकार में रखता है—वह दूसरों पर अत्याचार करता है और साथ ही स्वयं को पीड़ित मानता है। लेखक एक ‘दर्पण’ का सुझाव देता है: पीड़ित से पूछो, “जब तुम्हें कहीं बुरा व्यवहार सहना पड़ा तो दुख हुआ न? क्या तुम्हारे अपने देश में जिस समूह को सताया जाता है, उसे भी वैसा ही दर्द होता होगा?” यह प्रश्न बिना आरोप लगाए आत्म-निरीक्षण का मार्ग खोलता है।
येम्बी ने बाद में ‘किंडोकी विचबॉय’ नामक एक लघु फिल्म बनाई, जो उसी अनुभव पर आधारित थी। फिल्म का प्रदर्शन विक्टोरिया क्लिम्बी की पुण्यतिथि पर हुआ—वह आठ वर्षीय लड़की जिसे 2000 में जादू-टोने के आरोप में मार डाला गया था। आज येम्बी संसद में जाकर कानूनी सुरक्षा की मांग कर रहा है। और वह मूंगफली का छिलका, जो कभी मिला ही नहीं, एक खालीपन की तरह बचा हुआ है—उस देखभाल का प्रतीक जो कागजों पर तो लिखी है, पर हकीकत में कभी हाथ नहीं आती।
| अटलांटिक / अंग्रेज़ी-भाषी प्रेस | −0.80 | critical |
|---|---|---|
| अरब खाड़ी प्रेस | −0.60 | critical |
| महाद्वीपीय यूरोपीय प्रेस | −0.70 | critical |
We expose the hidden abuse of children accused of witchcraft and demand protection for the most vulnerable.
By focusing on a single harrowing personal story and then generalizing to thousands, the narrative creates an emotional urgency that makes the systemic failure feel immediate and personal.
The article does not discuss the cultural or religious roots of witchcraft beliefs in immigrant communities, which might complicate the narrative of pure victimhood.
We diagnose racism as a disease that must be treated, and we expose the hypocrisy of those who deny it.
By using the metaphor of a pandemic, the article reframes a moral issue as a medical one, making it seem objective and requiring intervention.
The article does not address specific historical or economic factors that fuel racism, focusing instead on a universal psychological condition.
We document the suffering caused by underfunded healthcare and demand that politicians stop ignoring the crisis.
By stacking multiple personal testimonies and survey data, the narrative creates a cumulative impression of a broken system that is beyond isolated incidents.
The articles do not mention any successful reforms or positive outcomes in other regions, which might balance the picture.
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