
ऑस्ट्रेलिया-मिस्र भिड़ंत: एशिया की आखिरी उम्मीद और सलाह की फिटनेस पर टिका इतिहास
डलास स्टेडियम में शुक्रवार को होने वाले इस मुक़ाबले में दोनों टीमें पहली बार विश्व कप नॉकआउट जीत दर्ज करने उतरेंगी, जबकि मोहम्मद सलाह की हैमस्ट्रिंग चोट सबसे बड़ा सवाल बनी हुई है।
टेक्सस के एटीएंडटी स्टेडियम में जब रेफ़री की सीटी बजेगी, तो सिर्फ़ एक फ़ुटबॉल मैच नहीं, बल्कि दो महाद्वीपों की आकांक्षाओं का टकराव शुरू होगा। ऑस्ट्रेलिया, एशिया का अकेला बचा प्रतिनिधि, और मिस्र, जो नब्बे साल बाद पहली बार नॉकआउट चरण में पहुँचा है, दोनों के सामने एक जैसा सूखा ख़त्म करने का मौक़ा है—विश्व कप के नॉकआउट मुक़ाबले में पहली जीत। सॉकरूज़ के कोच टोनी पोपोविक ने इसे ‘इतिहास रचने’ का मौक़ा बताया, जबकि मिस्र के हुसाम हसन ने कहा कि उनकी टीम ‘अफ़्रीका और अरब जगत को ख़ुशी देने’ के लिए तैयार है।
ग्रुप चरण में दोनों टीमों का सफ़र एक जैसा रहा—दोनों उपविजेता बनकर आगे बढ़ीं, लेकिन रास्ते अलग थे। ऑस्ट्रेलिया ने तुर्की को 2-0 से हराकर शुरुआत की, मेज़बान अमेरिका से 0-2 से हारी और फिर पैराग्वे के साथ गोलरहित ड्रॉ खेलकर चार अंकों के साथ ग्रुप डी से क्वालीफ़ाई किया। टीम की पहचान उसकी रक्षात्मक मज़बूती रही—ऑप्टा के अनुसार ग्रुप चरण में उनके ख़िलाफ़ लिए गए शॉट्स की औसत xG वैल्यू सिर्फ़ 0.06 रही, जो स्पेन के बाद दूसरी सबसे कम है। दूसरी ओर, मिस्र ने ग्रुप जी में न्यूज़ीलैंड को 3-1 से हराकर अपनी पहली विश्व कप जीत दर्ज की, और बेल्जियम व ईरान से 1-1 की बराबरी करते हुए पाँच अंक लिए। मिस्र का आक्रमण मोहम्मद सलाह के इर्द-गिर्द घूमता रहा, जिन्होंने टीम के पाँच में से तीन गोलों में प्रत्यक्ष भूमिका निभाई।
लेकिन ईरान के ख़िलाफ़ मैच के 57वें मिनट में बाईं जाँघ पर आइस पैक लगाकर मैदान छोड़ने वाले सलाह की फिटनेस अब तक तय नहीं है। मिस्र के कोच हसन ने कहा, ‘मैं तब तक कोई जोखिम नहीं लूँगा जब तक सौ फ़ीसदी आश्वस्त न हो जाऊँ कि वह पूरी तरह फ़िट हैं।’ सलाह ने हल्के अभ्यास में हिस्सा लिया, लेकिन शुरुआती लाइन-अप में उनकी मौजूदगी पर संशय बना हुआ है। एशियाई मीडिया में इसे ऑस्ट्रेलिया के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, जबकि अरब और अफ़्रीकी सूत्रों का मानना है कि सलाह के बिना भी ओमर मारमूश और ट्रेज़ेगेट जैसे खिलाड़ी अंतर पैदा कर सकते हैं।
रणनीतिक रूप से यह मुक़ाबला दो विपरीत शैलियों का होगा। ऑस्ट्रेलिया ने ग्रुप चरण में औसतन 34% गेंद पर क़ब्ज़ा रखा, लेकिन उसकी जवाबी हमलों की गति और सेट-पीस पर दक्षता ने उसे ख़तरनाक बनाया। नेस्टोरी इरानकुंडा जैसे युवा खिलाड़ी तेज़ी से पलटवार करने की क्षमता रखते हैं। मिस्र के कोच हसन ने ऑस्ट्रेलिया की ऊँचाई और शारीरिक क्षमता को लेकर सतर्कता बरती, लेकिन यह भी कहा कि ‘हम रग्बी नहीं, फ़ुटबॉल खेल रहे हैं।’ दूसरी तरफ़, पोपोविक ने संकेत दिया कि उनकी टीम दोनों परिदृश्यों—सलाह के खेलने या न खेलने—के लिए तैयार है।
इस मैच का नतीजा सिर्फ़ एक टीम को अगले दौर में नहीं पहुँचाएगा, बल्कि एशियाई फ़ुटबॉल के लिए प्रतिष्ठा का सवाल भी है। जापान, दक्षिण कोरिया और सऊदी अरब के बाहर होने के बाद ऑस्ट्रेलिया ही एकमात्र एएफ़सी टीम बची है। अगर सॉकरूज़ जीतते हैं, तो वे 2006 और 2022 के बाद तीसरी बार अंतिम 16 में पहुँचेंगे, और पहली बार कोई नॉकआउट मैच जीतेंगे। हार की सूरत में भी, एशियाई मीडिया के अनुसार, टीम ने उम्मीदों पर खरा उतरकर अपना अभियान समाप्त किया होगा। विजेता का सामना अगले दौर में अर्जेंटीना और केप वर्डे के बीच होने वाले मुक़ाबले के विजेता से 7 जुलाई को अटलांटा में होगा।
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