
यूरोप की हरित पहल से उत्सर्जन घटा, लेकिन वैश्विक उपभोक्ता और भारतीय किसान अब भी संकट में
यूरोपीय संघ का कार्बन बाज़ार 260 अरब यूरो जुटाकर उत्सर्जन आधा करने में सफल रहा, जबकि एक नए अध्ययन ने दुनिया के सबसे अमीर उपभोक्ताओं से होने वाले भारी पर्यावरणीय नुकसान और भारतीय किसानों के साथ कार्बन लेखांकन के अन्याय को उजागर किया है।
यूरोपीय संघ का उत्सर्जन व्यापार तंत्र (ईटीएस) पिछले बारह वर्षों में जलवायु नीति का एक मूक लेकिन प्रभावशाली स्तंभ बनकर उभरा है। इस दौरान इसने सबसे प्रदूषणकारी उद्योगों से 260 अरब यूरो का राजस्व एकत्र किया और उन क्षेत्रों के कार्बन उत्सर्जन को लगभग आधा कर दिया, जबकि आर्थिक विकास की गति बनी रही। अब यूरोपीय संसद ने एक और कड़ा कदम उठाते हुए सभी नए वाहनों के निर्माण और विघटन में पुनर्चक्रित सामग्री के अनिवार्य उपयोग का प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित किया है। यह कदम ईटीएस के विस्तार के साथ मेल खाता है, जो अब उन क्षेत्रों को भी अपने दायरे में ले रहा है जो पहले इससे बाहर थे, और 2050 तक जलवायु तटस्थता की यूरोपीय महत्वाकांक्षा को मूर्त रूप दे रहा है।
इस हरित प्रगति के बीच, एक वैश्विक अध्ययन ने उपभोग के असमान पर्यावरणीय बोझ को रेखांकित किया है। ‘कम्युनिकेशंस सस्टेनेबिलिटी’ में प्रकाशित शोध के अनुसार, दुनिया के सबसे धनी 10 प्रतिशत उपभोक्ता सामूहिक रूप से हर वर्ष 1.7 से 5.7 ट्रिलियन डॉलर तक का पर्यावरणीय नुकसान पहुँचाते हैं। ब्राज़ील, चीन, मिस्र, जर्मनी, भारत और अमेरिका—ये छह देश हर महाद्वीप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं—पर केंद्रित इस अध्ययन में पाया गया कि प्रति व्यक्ति क्षति 2,300 से 7,500 डॉलर सालाना तक हो सकती है। यह आँकड़ा बताता है कि जहाँ यूरोप अपनी औद्योगिक उत्सर्जन सीमाओं को कस रहा है, वहीं वैश्विक उपभोक्ता वर्ग का पारिस्थितिक पदचिह्न नीतिगत प्रयासों को चुनौती दे रहा है।
इस असमानता का एक और चेहरा भारतीय किसानों के साथ हो रहे कार्बन लेखांकन के अन्याय में दिखता है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल की छठी आकलन रिपोर्ट कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की प्रक्रियाओं को प्राथमिकता देने पर ज़ोर देती है, और पुनर्योजी कृषि को नेट-ज़ीरो लक्ष्यों का एक प्रमुख साधन माना जा रहा है। फसल ऊतक, बायोचार और मृदा कार्बनिक कार्बन के रूप में ऐतिहासिक उत्सर्जन को बड़े पैमाने पर सोखने की क्षमता के बावजूद, एक असंगत ग्रीनहाउस गैस लेखांकन पद्धति इस क्षेत्र को उसकी कार्बन सेवाओं का उचित मूल्य नहीं दिला पा रही है। नतीजतन, भारतीय किसान उस पर्यावरणीय योगदान की कीमत चुका रहे हैं जिसे अंतरराष्ट्रीय कार्बन बही-खातों में गलत तरीके से दर्ज किया जाता है।
इन वृहद पर्यावरणीय और नीतिगत बदलावों के बीच वित्तीय बाज़ार भी मिश्रित संकेत दे रहे हैं। स्वीडिश शेयर बाज़ार में मेडिकल टेक्नोलॉजी कंपनी गेटिंगे को विश्लेषकों ने ‘खरीदें’ श्रेणी में पदोन्नत किया, जिसका कारण पूरे सेक्टर का कम मूल्यांकन और घटती गुणवत्ता लागत बताई गई। दूसरी ओर, चिप निर्माता कंपनियों के शेयरों में तेज़ी आई जब वॉल स्ट्रीट ने पिछली गिरावट से उबरने की कोशिश की। वहीं, सॉफ्टवेयर फर्म कार्नोव को बिक्री की सिफारिश मिलने के बाद भारी गिरावट झेलनी पड़ी, जबकि स्की रिसॉर्ट संचालक स्कीस्टार के शेयर मज़बूत रिपोर्ट के बाद उछल गए। ये उतार-चढ़ाव दर्शाते हैं कि निवेशक अब हरित संक्रमण, नियामक दबाव और उपभोक्ता व्यवहार में आ रहे बदलावों को अपने पोर्टफोलियो निर्णयों में तौल रहे हैं, भले ही वैश्विक कार्बन लेखांकन का ढाँचा अभी भी किसानों जैसे मूक योगदानकर्ताओं के प्रति अन्यायपूर्ण बना हुआ है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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यूरोपीय संसद ने वाहन निर्माण और विघटन में पुनर्नवीनीकरण सामग्री के उपयोग को अनिवार्य करने वाले नए नियमों को मंजूरी दे दी है। यह चक्रीयता की ओर एक व्यावहारिक कदम है, जो यूरोप की नियामक नेतृत्व को मजबूत करता है।
वैश्विक कार्बन लेखा ढाँचे पुनर्योजी कृषि की कार्बन पृथक्करण क्षमता को व्यवस्थित रूप से अनदेखा करते हैं, जिससे भारतीय किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है। यह लेखा अन्याय क्षेत्र को CO₂ हटाने के लिए उचित पुरस्कार प्राप्त करने से रोकता है, गहरी वैश्विक असमानताओं को उजागर करता है।
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