
ईरान-अमेरिका समझौते पर क्षेत्रीय हलचल: अराकची ने सऊदी, तुर्की, इराक और मिस्र से साझा की रणनीति
इस्लामाबाद में हुए ईरान-अमेरिका ढांचागत समझौते के बाद विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने क्षेत्रीय शक्तियों को विश्वास में लेते हुए लेबनान पर इज़रायली हमले रोकने और वाशिंगटन की ज़िम्मेदारी तय करने पर ज़ोर दिया।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने सोमवार को एक के बाद एक कई क्षेत्रीय नेताओं से फ़ोन पर बात कर इस्लामाबाद में हुए उस नए सुरक्षा ढांचे की रूपरेखा साझा की, जिसे पाकिस्तान की मध्यस्थता में ईरान और अमेरिका के बीच अंतिम रूप दिया गया है। तुर्की के हाकान फ़िदान, इराक़ के फ़ुआद हुसैन और मिस्र के बद्र अब्दुलआती से अलग-अलग बातचीत में अराकची ने स्पष्ट किया कि वाशिंगटन की ज़िम्मेदारी है कि वह समझौते की हर शर्त का पालन सुनिश्चित करे, ख़ासकर लेबनान पर इज़रायली ‘आक्रामकता’ को तुरंत और पूरी तरह रोका जाए। यह कूटनीतिक पहल ऐसे समय में सामने आई है जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने एक्स पर बयान जारी कर बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो गया है, जिससे मध्य पूर्व में सभी सैन्य कार्रवाइयां तत्काल प्रभाव से समाप्त हो जाएंगी।
अराकची ने तीनों विदेश मंत्रियों के साथ बातचीत में इस बात पर ज़ोर दिया कि लेबनान में स्थिरता लाने के लिए इज़रायली हमलों का पूर्ण विराम पहली शर्त है। उन्होंने तुर्की, इराक़ और मिस्र की सरकारों द्वारा युद्धविराम के प्रयासों, तनाव कम करने और क्षेत्रीय सुरक्षा को मज़बूत करने की दिशा में उठाए गए कूटनीतिक क़दमों की सराहना की। तीनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि क्षेत्रीय घटनाक्रम पर लगातार नज़र रखने और शांति बनाए रखने के लिए राजनयिक प्रयासों को और तेज़ करने की ज़रूरत है। यह सहमति इस बात का संकेत है कि पश्चिम एशिया के सुन्नी बहुल देश अब ईरान के साथ मिलकर एक स्थायी सुरक्षा ढांचे की तरफ़ बढ़ना चाहते हैं, जो केवल अमेरिकी गारंटी पर निर्भर न रहे।
अराकची ने सऊदी अरब के विदेश मंत्री फ़ैसल बिन फ़रहान से भी अलग से विस्तृत बातचीत की। इस कॉल में उन्होंने इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन के प्रावधानों की जानकारी दी और रियाद की उस भूमिका के प्रति आभार जताया जो ईरान के ख़िलाफ़ ‘अमेरिकी और ज़ायोनी आक्रामक युद्ध’ को समाप्त करने और क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करने की चल रही राजनयिक प्रक्रिया में निभाई जा रही है। दोनों पक्षों ने तेहरान और रियाद के बीच निकट परामर्श और कूटनीतिक सहयोग जारी रखने पर सहमति जताई। यह संवाद इस मायने में अहम है कि हाल के वर्षों में ईरान-सऊदी संबंधों में आए सुधार ने पूरे खाड़ी क्षेत्र के सुरक्षा समीकरण बदल दिए हैं, और अब दोनों देश अमेरिकी नेतृत्व वाले किसी भी समझौते को अपने हितों के अनुकूल ढालने की कोशिश कर रहे हैं।
यह घटनाक्रम साढ़े तीन महीने पहले ईरान पर अमेरिकी-इज़रायली हमले के बाद शुरू हुए उस युद्ध की पृष्ठभूमि में आया है जो लेबनान समेत कई देशों तक फैल गया। पाकिस्तान ने एक मध्यस्थ की भूमिका निभाई, जो दक्षिण एशिया के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत की नज़र से देखें तो यह समझौता हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता लाने और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों को सुरक्षित रखने की दिशा में सकारात्मक क़दम हो सकता है, लेकिन इसके साथ ही पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक हैसियत क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
आने वाले दिनों में असली परीक्षा इस बात की होगी कि अमेरिका लेबनान में इज़रायली कार्रवाइयों पर लगाम लगाने और समझौते की बाक़ी शर्तों को कितनी गंभीरता से लागू करता है। ईरान ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर एक स्पष्ट संदेश दिया है कि वह अब किसी भी ढीले कार्यान्वयन को स्वीकार नहीं करेगा। तुर्की, इराक़, मिस्र और सऊदी अरब के साथ समन्वय यह दर्शाता है कि तेहरान एक व्यापक क्षेत्रीय सहमति बनाना चाहता है, ताकि वाशिंगटन पर कूटनीतिक दबाव बना रहे। यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है, तो यह पश्चिम एशिया में एक नए शांति युग की शुरुआत कर सकता है, लेकिन इज़रायल की प्रतिक्रिया और अमेरिकी घरेलू राजनीति इस राह की सबसे बड़ी बाधाएं बनी रहेंगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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ईरान के विदेश मंत्री ने सऊदी अरब, तुर्की, इराक और मिस्र को अमेरिका के साथ इस्लामाबाद समझौते की जानकारी दी, इस बात पर जोर देते हुए कि वाशिंगटन को कार्यान्वयन सुनिश्चित करना होगा और लेबनान के खिलाफ सभी ज़ायोनी आक्रमण तुरंत बंद होने चाहिए। तेहरान इन क्षेत्रीय शक्तियों के राजनयिक समर्थन की सराहना करता है और क्षेत्रीय स्थिरता मजबूत करने के लिए निकट परामर्श जारी रखता है।
ईरान के शीर्ष राजनयिक ने तुर्की, इराकी और मिस्र के समकक्षों के साथ फोन पर बातचीत की, जिसमें अमेरिका-ईरान ढांचा समझौते पर चर्चा की गई और लेबनान पर इजरायली हमलों को पूरी तरह रोकने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। उन्होंने कहा कि समझौते को लागू करने की जिम्मेदारी अमेरिका की है और युद्धविराम व तनाव कम करने के क्षेत्रीय देशों के प्रयासों के लिए आभार व्यक्त किया।
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