
अमेरिका-ईरान समझौते के बाद भी लेबनानी सेना की चेतावनी: सीमावर्ती गांवों में लौटना अभी ख़तरनाक
वाशिंगटन और तेहरान के बीच युद्धविराम की घोषणा के बावजूद, इज़रायली सेना की मौजूदगी और बिना फटे हथियारों के कारण दक्षिण लेबनान में विस्थापितों की वापसी जोखिम भरी बनी हुई है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ की मध्यस्थता में सोमवार को अमेरिका और ईरान के बीच पश्चिम एशिया युद्ध समाप्त करने का समझौता घोषित हुआ, लेकिन इसके कुछ ही घंटों बाद लेबनानी सेना ने दक्षिणी सीमावर्ती गांवों के विस्थापित निवासियों को तत्काल वापसी से रोक दिया। सेना की ओर से जारी बयान में स्पष्ट किया गया कि इज़रायली उल्लंघनों और बिना फटे विस्फोटक सामग्री के ख़तरे को देखते हुए नागरिकों को फ़िलहाल अपने घरों की ओर नहीं लौटना चाहिए। यह चेतावनी उस उम्मीद पर पहला व्यावहारिक ब्रेक है जो क्षेत्रीय युद्धविराम से जुड़ी थी।
यह संघर्ष मार्च 2026 की शुरुआत में तब भड़का जब ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह ने तेहरान के समर्थन में इज़रायल पर गोलीबारी शुरू की, जिसके जवाब में इज़रायल ने दक्षिण लेबनान में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान छेड़ दिया। तीन महीने की इस लड़ाई में हज़ारों लोग मारे गए और लगभग 12 लाख लोग विस्थापित हुए। हालाँकि अमेरिका-ईरान समझौते ने व्यापक युद्धविराम की संभावना जगाई है, इज़रायली मंत्रियों ने स्पष्ट कहा कि वे हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ अपनी कार्रवाई को इस समझौते से बाध्य नहीं मानते। यही कारण है कि लेबनानी सेना ने सुरक्षा स्थिति स्पष्ट होने तक नागरिकों को सैन्य इकाइयों के निर्देशों का पालन करने की हिदायत दी है।
ज़मीनी हक़ीक़त इस चेतावनी और आम लोगों की बेचैनी के बीच झूल रही है। सोमवार सुबह से ही एएफ़पी संवाददाताओं ने दक्षिण लेबनान के कई इलाक़ों में, जहाँ इज़रायली सेना तैनात नहीं है, सतर्क वापसी की लहर देखी। क़ासमियेह पुल पर, जो बुरी तरह बमबारी झेल चुके तैर क्षेत्र का प्रवेश द्वार है, गद्दों और सूटकेसों से लदी दर्जनों कारें लेबनानी सेना की चौकियों से गुज़रीं, और सवारियाँ विजय चिह्न दिखा रही थीं। फिर भी, सेना ने हाल ही में हमलों की चपेट में आए इलाकों में विशेष सावधानी बरतने और बिना फटे हथियारों के ख़तरे को गंभीरता से लेने की अपील की है।
दक्षिण एशिया के लिए इस घटनाक्रम के कई आयाम हैं। पाकिस्तान की मध्यस्थता ने उसे कूटनीतिक केंद्र में ला खड़ा किया, जबकि भारत के लिए पश्चिम एशिया की स्थिरता ऊर्जा आपूर्ति और खाड़ी देशों में बसे लाखों प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा से सीधे जुड़ी है। लेबनान में भी भारतीय शांति सेना की टुकड़ी यूएनआईएफ़आईएल के तहत तैनात है, जिसके लिए यह तनावपूर्ण माहौल एक संवेदनशील परिचालन चुनौती बन गया है। यदि यह समझौता टिकता है तो क्षेत्रीय तेल मार्गों पर दबाव कम होगा और पुनर्निर्माण के रास्ते खुलेंगे।
आगे की राह अनिश्चितताओं से भरी है। असली शांति तभी संभव होगी जब इज़रायली सेना दक्षिण लेबनान से हटे और बिना फटे विस्फोटकों की सफ़ाई का व्यापक अभियान चले। लेबनानी सेना की मौजूदगी और नागरिकों का अनुशासन इस प्रक्रिया की पहली कड़ी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह सुनिश्चित करना होगा कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच बनी सहमति ज़मीन पर उतरे, वरना विस्थापितों की घर वापसी एक नई त्रासदी में बदल सकती है।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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लेबनानी अधिकारियों ने विस्थापितों को चेतावनी दी कि वे अमेरिका-ईरान युद्ध समाप्ति समझौते के बावजूद दक्षिणी सीमावर्ती गांवों में जल्दबाजी में न लौटें, क्योंकि इज़राइल ने कहा कि वह सेना नहीं हटाएगा। संघर्ष में हज़ारों लोग मारे गए और 12 लाख लोग विस्थापित हुए, जो व्यापक युद्ध का सबसे घातक प्रभाव है। सेना ने इज़राइली उल्लंघनों और हमलों के जोखिम का हवाला दिया।
लेबनानी सेना ने विस्थापितों से दक्षिण लौटने में देरी करने का आग्रह किया, इज़राइली उल्लंघनों और बिना फटे विस्फोटकों के तात्कालिक ख़तरों का हवाला देते हुए। अमेरिका-ईरान समझौते का स्वागत आशा और संदेह के मिश्रण से हुआ; कुछ परिवार लौटने की तैयारी कर रहे थे, जबकि इज़राइली मंत्रियों ने कहा कि वे समझौते से बंधे नहीं हैं। वापसी अब सैन्य निर्देशों, ज़मीनी निरीक्षणों और घोषित समझौते के वास्तविक विकास पर निर्भर करती है।
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