
वैश्विक मरुस्थलीकरण दिवस: चरागाहों की पुकार और समुद्री संरक्षण का संगम
इटली से लेकर केन्या तक, विश्व ने चरागाहों के क्षरण और सूखे के विरुद्ध एकजुटता दिखाई, वहीं हिंद महासागर में समुद्री पारिस्थितिकी की रक्षा का संकल्प भी दोहराया गया।
विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा रोकथाम दिवस पर इस वर्ष एक स्पष्ट संदेश गूंजा: चरागाहों को पहचानें, सम्मान दें और पुनर्स्थापित करें। संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (यूएनसीसीडी) द्वारा चुनी गई यह थीम केवल एक नारा नहीं, बल्कि भूमध्यसागर से लेकर हिंद महासागर तक फैले उन विशाल घासस्थलों के लिए वैश्विक चेतना का आह्वान है, जो जैवविविधता, खाद्य सुरक्षा और करोड़ों पशुपालकों की आजीविका का आधार हैं। इटली में राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद (सीएनआर) के शोधकर्ता इमानुएल रोमानो ने चेतावनी दी कि जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग के दबाव से भूमध्य क्षेत्र के जलीय व स्थलीय पारिस्थितिक तंत्रों में जैवविविधता तेजी से घट रही है, और मरुस्थलीकरण अब केवल शुष्क प्रदेशों तक सीमित नहीं, बल्कि इटली जैसे समशीतोष्ण देशों के लिए भी वास्तविक खतरा बन चुका है।
इसी चिंता को ईरान में आयोजित एक उच्चस्तरीय समारोह में संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के प्रतिनिधि फारुख तोइरोव ने दोहराया। उन्होंने रेखांकित किया कि चरागाह पृथ्वी की सतह के विशाल हिस्से को आच्छादित करते हैं और जल सुरक्षा, कार्बन भंडारण तथा सांस्कृतिक पहचान के लिए अनिवार्य हैं, फिर भी नीतिगत उपेक्षा और अतिदोहन के कारण इनका क्षरण चिंताजनक गति से हो रहा है। अल्जीरिया में वानिकी महानिदेशालय ने कृषि मंत्री यासीन मेहदी वालिद के संरक्षण में राष्ट्रव्यापी गतिविधियों का आयोजन किया, जिनका केंद्र भी चरागाहों की पारिस्थितिकीय एवं आर्थिक भूमिका को रेखांकित करना था। यह भूमध्यसागरीय और शुष्क क्षेत्रों की साझा पीड़ा को दर्शाता है, जहाँ मरुस्थलीकरण और जलवायु विस्थापन एक-दूसरे को गति दे रहे हैं।
अफ्रीका की ओर रुख करें तो केन्या ने एक साथ दो मोर्चों पर पर्यावरणीय नेतृत्व का प्रदर्शन किया। उपराष्ट्रपति किथुरे किंडिकी ने विश्व मरुस्थलीकरण दिवस के अवसर पर क्षरित चरागाहों की बहाली के लिए वैश्विक कार्रवाई का आह्वान करते हुए 2032 तक 15 अरब वृक्ष लगाने की केन्या की महत्वाकांक्षी योजना की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि वर्तमान पीढ़ी का यह दायित्व है कि वह आने वाली पीढ़ियों को अधिक स्वच्छ, समृद्ध और प्रतिरोधी पारिस्थितिक तंत्र सौंपे। इसी सप्ताह मोम्बासा में आयोजित 11वें “हमारा महासागर” सम्मेलन में भी किंडिकी और राष्ट्रपति विलियम रूटो ने समुद्री संरक्षण को आर्थिक विकास और खाद्य सुरक्षा से जोड़ते हुए जलवायु परिवर्तन तथा विनाशकारी मानवीय गतिविधियों से महासागरों की रक्षा का संकल्प दोहराया। यह दोहरा फोकस — स्थलीय चरागाह और समुद्री पारिस्थितिकी — केन्या की उस समझ को रेखांकित करता है कि जलवायु संकट के समाधान के लिए सीमाओं और पारिस्थितिक तंत्रों की खंडित सोच से ऊपर उठना अनिवार्य है।
दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत के लिए यह वैश्विक चर्चा अत्यंत प्रासंगिक है। भारत का विशाल चरागाह क्षेत्र — राजस्थान के मरुस्थल से लेकर हिमालय की अल्पाइन घासभूमियों तक — अतिचारण, भूमि उपयोग परिवर्तन और अनियमित वर्षा के कारण क्षरण का सामना कर रहा है। इस्केम सेवाएं, जिनका उल्लेख इतालवी शोधकर्ता ने किया, भारतीय संदर्भ में पशुधन आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जलपुनर्भरण के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि चरागाहों की पुनर्स्थापना और सामुदायिक भागीदारी के वैश्विक मॉडलों को अपनाया जाए, तो भारत न केवल मरुस्थलीकरण की गति को धीमा कर सकता है, बल्कि कार्बन पृथक्करण और जैवविविधता लक्ष्यों में भी योगदान दे सकता है।
निष्कर्षतः, इस वर्ष के आयोजनों ने एक स्पष्ट मार्गरेखा खींची है: चरागाहों और महासागरों जैसे उपेक्षित पारिस्थितिक तंत्रों की बहाली अब नैतिक दायित्व के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक अनिवार्यता भी है। इटली, ईरान, अल्जीरिया और केन्या के अनुभव बताते हैं कि स्थानीय कार्रवाई और वैश्विक एकजुटता के मेल से ही मरुस्थलीकरण और जलवायु व्याघातों के विरुद्ध टिकाऊ प्रतिरोधक क्षमता विकसित की जा सकती है। आने वाले वर्षों में इस संकल्प को नीतिगत प्राथमिकता और पर्याप्त निवेश में बदलना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी।
वही कहानी कहीं और कैसे बताई जाती है।
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एक इतालवी शोधकर्ता ने चेतावनी दी है कि मरुस्थलीकरण पूरे भूमध्यसागरीय क्षेत्र, इटली सहित, को खतरे में डाल रहा है और जैव विविधता में स्पष्ट गिरावट आ रही है। भूमि क्षरण और सूखे से निपटने के लिए पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की रक्षा करना आवश्यक है।
अल्जीरिया का कृषि मंत्रालय राष्ट्रीय कार्यक्रमों के साथ विश्व मरुस्थलीकरण दिवस मना रहा है, जिसमें जलवायु अनुकूलन, खाद्य और जल सुरक्षा तथा चरवाहा समुदायों की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण में चरागाहों की केंद्रीय भूमिका पर प्रकाश डाला गया है।
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