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खेलबुधवार, 1 जुलाई 2026

जर्मनी की विश्व कप से बाहर: पेनल्टी से इनकार और आंतरिक कलह ने चौंकाया

पराग्वे के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट में खिलाड़ियों के जिम्मेदारी से भागने और परिवारों को लेकर विवाद ने चार बार की चैंपियन जर्मनी की 2026 विश्व कप से शर्मनाक विदाई की असली कहानी उजागर की।

जर्मनी के लिए 2026 विश्व कप का अंत एक ऐसे दृश्य के साथ हुआ जो आने वाले वर्षों तक याद रखा जाएगा: पेनल्टी शूटआउट के छठे प्रयास में डिफेंडर जोनाथन ताह का कमजोर शॉट गोलकीपर ने रोक लिया और चार बार की विश्व विजेता टीम 32वें दौर में ही बाहर हो गई। यह वही ताह थे जिन्होंने अपने पेशेवर करियर में कभी पेनल्टी नहीं ली थी, लेकिन इस निर्णायक क्षण में उन्हें इसलिए आगे आना पड़ा क्योंकि लियोन गोरेत्ज़का, वाल्डेमर एंटोन और मालिक थियाव जैसे अनुभवी खिलाड़ी दबाव में जिम्मेदारी लेने से कतरा गए। कप्तान जोशुआ किमिच ने दो बार गोरेत्ज़का से अनुरोध किया, लेकिन बायर्न म्यूनिख का यह मिडफील्डर तैयार नहीं हुआ। इससे पहले, काई हैवर्ट्ज़ और निक वोल्टेमाडे भी अपने प्रयास चूक चुके थे, जबकि मैनुअल नॉयर ने एक पेनल्टी बचाकर उम्मीद जगाई थी।

यह नाटकीय निकास अचानक नहीं आई। जर्मनी ने टूर्नामेंट की शुरुआत कुराकाओ को 7-1 से रौंदकर की थी, लेकिन इसके बाद आइवरी कोस्ट के खिलाफ 2-1 की मामूली जीत और फिर इक्वाडोर से 1-2 की हार ने कमजोरियों को उजागर कर दिया। पैराग्वे के खिलाफ 120 मिनट तक टीम सिर्फ दो शॉट गोल पर लगा सकी, जो पूर्व खिलाड़ी पेर मेर्टेसैकर के अनुसार जर्मन मानकों के लिए शर्मनाक था। कोच जूलियन नागेल्समान ने हार के बाद एक टीवी साक्षात्कार में पत्रकार लिली एंगेल्स के सवालों पर रक्षात्मक रुख अपनाया और आत्म-आलोचना से इनकार किया, जिसकी जर्मन और स्पेनिश मीडिया में व्यापक आलोचना हुई।

हार के बाद जो आंतरिक कलह सामने आई, उसने संकट को और गहरा कर दिया। जर्मनी के दिग्गज लोथर मथाउस ने खुलासा किया कि खिलाड़ियों के परिवारों (पत्नियों और गर्लफ्रेंड्स) की मौजूदगी और उन्हें मिले विशेषाधिकारों ने ड्रेसिंग रूम में ईर्ष्या और तनाव पैदा कर दिया था। उन्होंने 1994 के विश्व कप की विफलता से तुलना करते हुए कहा कि टीम का ध्यान पूरी तरह फुटबॉल से हटकर लॉजिस्टिक्स और निजी उड़ानों की बहस में उलझ गया। इंडोनेशियाई और दक्षिण अमेरिकी मीडिया ने इस आंतरिक कलह को जर्मनी की रणनीतिक विफलता से जोड़कर देखा, जबकि इतालवी अखबारों ने इस मनोवैज्ञानिक नाटक की तुलना अपने देश की फुटबॉल गिरावट से की।

कोचिंग भविष्य पर बहस ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ ने हार के बाद एक सांत्वना भरा पोस्ट किया, जिसकी इतनी आलोचना हुई कि उन्हें तुरंत सुधार करना पड़ा। जर्मन अखबार बिल्ड की संपादक मारियन हॉर्न ने तो यहां तक लिख दिया कि टीम का प्रदर्शन देश की आर्थिक गिरावट का आईना है। इस बीच, नागेल्समान ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया, लेकिन डीएफबी अध्यक्ष बर्नड न्यूएनडोर्फ ने कहा कि आने वाले दिनों में शांतिपूर्वक कारणों का विश्लेषण किया जाएगा। रूसी सट्टेबाजों और ब्राजीलियाई मीडिया के अनुसार, जुर्गन क्लॉप सबसे प्रबल दावेदार हैं, जो रेड बुल में अपनी भूमिका के बावजूद इस चुनौती के लिए तैयार बताए जा रहे हैं।

यह लगातार तीसरा विश्व कप है जहां जर्मनी अंतिम-16 में भी नहीं पहुंच पाया—2018 और 2022 में तो वह ग्रुप चरण से ही बाहर हो गया था। पूर्व गोलकीपर ओलिवर कान ने कहा कि तीन अलग-अलग कोचों का एक ही मुकाम पर असफल होना बताता है कि समस्या खिलाड़ियों की जिम्मेदारी लेने की क्षमता में है, न कि सिर्फ रणनीति में। अगली बड़ी परीक्षा 2028 की यूरोपीय चैंपियनशिप होगी, जिसके लिए जर्मन फुटबॉल को अपनी खोई हुई पहचान और आक्रामकता को फिर से खोजना होगा।

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जर्मनी की विश्व कप से बाहर: पेनल्टी से इनकार और आंतरिक कलह ने चौंकाया

पराग्वे के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट में खिलाड़ियों के जिम्मेदारी से भागने और परिवारों को लेकर विवाद ने चार बार की चैंपियन जर्मनी की 2026 विश्व कप से शर्मनाक विदाई की असली कहानी उजागर की।

जर्मनी के लिए 2026 विश्व कप का अंत एक ऐसे दृश्य के साथ हुआ जो आने वाले वर्षों तक याद रखा जाएगा: पेनल्टी शूटआउट के छठे प्रयास में डिफेंडर जोनाथन ताह का कमजोर शॉट गोलकीपर ने रोक लिया और चार बार की विश्व विजेता टीम 32वें दौर में ही बाहर हो गई। यह वही ताह थे जिन्होंने अपने पेशेवर करियर में कभी पेनल्टी नहीं ली थी, लेकिन इस निर्णायक क्षण में उन्हें इसलिए आगे आना पड़ा क्योंकि लियोन गोरेत्ज़का, वाल्डेमर एंटोन और मालिक थियाव जैसे अनुभवी खिलाड़ी दबाव में जिम्मेदारी लेने से कतरा गए। कप्तान जोशुआ किमिच ने दो बार गोरेत्ज़का से अनुरोध किया, लेकिन बायर्न म्यूनिख का यह मिडफील्डर तैयार नहीं हुआ। इससे पहले, काई हैवर्ट्ज़ और निक वोल्टेमाडे भी अपने प्रयास चूक चुके थे, जबकि मैनुअल नॉयर ने एक पेनल्टी बचाकर उम्मीद जगाई थी।

यह नाटकीय निकास अचानक नहीं आई। जर्मनी ने टूर्नामेंट की शुरुआत कुराकाओ को 7-1 से रौंदकर की थी, लेकिन इसके बाद आइवरी कोस्ट के खिलाफ 2-1 की मामूली जीत और फिर इक्वाडोर से 1-2 की हार ने कमजोरियों को उजागर कर दिया। पैराग्वे के खिलाफ 120 मिनट तक टीम सिर्फ दो शॉट गोल पर लगा सकी, जो पूर्व खिलाड़ी पेर मेर्टेसैकर के अनुसार जर्मन मानकों के लिए शर्मनाक था। कोच जूलियन नागेल्समान ने हार के बाद एक टीवी साक्षात्कार में पत्रकार लिली एंगेल्स के सवालों पर रक्षात्मक रुख अपनाया और आत्म-आलोचना से इनकार किया, जिसकी जर्मन और स्पेनिश मीडिया में व्यापक आलोचना हुई।

हार के बाद जो आंतरिक कलह सामने आई, उसने संकट को और गहरा कर दिया। जर्मनी के दिग्गज लोथर मथाउस ने खुलासा किया कि खिलाड़ियों के परिवारों (पत्नियों और गर्लफ्रेंड्स) की मौजूदगी और उन्हें मिले विशेषाधिकारों ने ड्रेसिंग रूम में ईर्ष्या और तनाव पैदा कर दिया था। उन्होंने 1994 के विश्व कप की विफलता से तुलना करते हुए कहा कि टीम का ध्यान पूरी तरह फुटबॉल से हटकर लॉजिस्टिक्स और निजी उड़ानों की बहस में उलझ गया। इंडोनेशियाई और दक्षिण अमेरिकी मीडिया ने इस आंतरिक कलह को जर्मनी की रणनीतिक विफलता से जोड़कर देखा, जबकि इतालवी अखबारों ने इस मनोवैज्ञानिक नाटक की तुलना अपने देश की फुटबॉल गिरावट से की।

कोचिंग भविष्य पर बहस ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ ने हार के बाद एक सांत्वना भरा पोस्ट किया, जिसकी इतनी आलोचना हुई कि उन्हें तुरंत सुधार करना पड़ा। जर्मन अखबार बिल्ड की संपादक मारियन हॉर्न ने तो यहां तक लिख दिया कि टीम का प्रदर्शन देश की आर्थिक गिरावट का आईना है। इस बीच, नागेल्समान ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया, लेकिन डीएफबी अध्यक्ष बर्नड न्यूएनडोर्फ ने कहा कि आने वाले दिनों में शांतिपूर्वक कारणों का विश्लेषण किया जाएगा। रूसी सट्टेबाजों और ब्राजीलियाई मीडिया के अनुसार, जुर्गन क्लॉप सबसे प्रबल दावेदार हैं, जो रेड बुल में अपनी भूमिका के बावजूद इस चुनौती के लिए तैयार बताए जा रहे हैं।

यह लगातार तीसरा विश्व कप है जहां जर्मनी अंतिम-16 में भी नहीं पहुंच पाया—2018 और 2022 में तो वह ग्रुप चरण से ही बाहर हो गया था। पूर्व गोलकीपर ओलिवर कान ने कहा कि तीन अलग-अलग कोचों का एक ही मुकाम पर असफल होना बताता है कि समस्या खिलाड़ियों की जिम्मेदारी लेने की क्षमता में है, न कि सिर्फ रणनीति में। अगली बड़ी परीक्षा 2028 की यूरोपीय चैंपियनशिप होगी, जिसके लिए जर्मन फुटबॉल को अपनी खोई हुई पहचान और आक्रामकता को फिर से खोजना होगा।

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